मजदूर जागरूक कैसे हों?

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

पिछले लेख में हमने देखा कि अगर मजदूर वर्ग अपनी गुलामी से छुटकारा पाना चाहता है तो इस अन्यायपूर्ण पूँजीवादी व्यवस्था को बदलकर एक न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना करना लाजिमी है। इस काम के लिए हर मजदूर का जागरूक होना जरूरी है और उसे अपने कर्त्तव्य की पहचान करनी चाहिए। इस लेख में हम इसी बात का जिक्र करेंगे कि मजदूर जागरूक कैसे हों?

किसी भी इनसान के जागरूक होने का मतलब है कि वह शोषण पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था के काम करने के तौर–तरीके के बारे में जानता है। वह जानता है कि पूँजीपति और मजदूर वर्ग के बीच चलनेवाले वर्ग–संघर्ष की असलियत क्या है। वह पूँजीवादी अन्याय के खिलाफ मजदूर वर्ग की लड़ाई के साथ खड़ा होता है। वह पूँजीवादी व्यवस्था की जगह एक न्यायपूर्ण व्यवस्था को लाने के लिए काम करता है। वह अपने इस काम में जी–जान से लगा होता है।

कोई भी जागरूक इनसान चुप नहीं बैठ सकता। अगर वह जागरूक है, तो दूसरों को भी जागरूक करेगा। जिस तरह जलता दीया सभी जगह रोशनी फैलाकर अँधेरों को दूर भगाता है, उसी तरह एक जागरूक आदमी सभी को सही रास्ता दिखाता है। हम जानते हैं कि मजदूरों का बहुत बड़ा हिस्सा जागरूक नहीं है। उनमें से बहुत सारे लोग पढ़े–लिखे नहीं हैं। जागरूकता के लिए पढ़ना–लिखना भी बहुत जरूरी है। लेकिन बहुत सारे ऐसे लोग भी मिल जायेंगे, जो पढ़े–लिखे होने के बाद भी जागरूक नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे बहुत जानते हैं। लेकिन अगर उनसे पूछो कि यह व्यवस्था कैसे चल रही है? मजदूर एकजुट कैसे होंगे? मजदूरों को उनका हक कैसे मिलेगा? गरीबी–बेरोजगारी से छुटकारा कैसे मिलेगा? इसका जवाब वे नहीं बता पायेंगे। उनके पास कोई रास्ता नहीं है। फिर भी वे घमंड से कहेंगे कि वे बहुत जानते हैं। कम जानना गलत नहीं है। कम जानते हुए भी अधिक जानने का दिखावा करना गलत है। एक सच्चा और अच्छा आदमी अगर कोई बात नहीं जानता तो उसे जानने का ढोंग नहीं करता। वह सीधे–सीधे मान लेता है कि वह नहीं जानता। तभी वह कोई भी नयी बात सीख सकता है। सबकुछ जानने का ढोंग करने वाला आदमी खुद को धोखा देता है और दूसरों को भी धोखे में रखता है।

हर मजदूर साथी को कम से कम इतना जरूर पढ़ना सीख लेना चाहिए, जिससे वह किताब, पर्चा, पोस्टर पढ़कर समझ सके। मजदूरों में कुछ बड़े लोग और कुछ बच्चे भी पढ़ना–लिखना नहीं जानते, उन सबके लिए पढ़ने का इंतजाम करना जरूरी है। लेकिन बड़े लोगों को अलग से पढ़ाया जाये और बच्चों को अलग से। यह काम मजदूरों की बस्ती में से उन साथियों को करना चाहिए, जो पढ़ना जानते हैं।

जो साथी पढ़ना जानते हैं, उन्हें खाली समय में कोई अच्छी किताब पढ़ते रहना चाहिए। जिन साथियों के पास अच्छी किताबें हों, उन्हें अपने साथी को पढ़ने के लिए दे देना चाहिए। सबके लिए अच्छी किताबों की एक लाइब्रेरी खोलनी चाहिए।

हफ्ते में कम से कम एक बार मीटिंग करके देश–दुनिया के बारे में बातचीत करनी चाहिए। ऐसी बातचीत से हमें सही बात जानने का मौका मिलता है। नहीं तो हम नेताओं और पूँजीपतियों की लूट को समझ नहीं पाएँगे और उनके झाँसे में आते रहेंगे। समय–समय पर हमें ऐसे मुद्दों पर बातचीत करनी चाहिए जो जागरूकता बढ़ाने के लिए जरूरी हैं जैसे––

––मजदूर और पूँजीपति के बीच टकराव की वजह

––मजदूरों के अधिकार और कर्तव्य क्या हैं?

––बेहतर जिन्दगी का रास्ता संघर्षों से होकर गुजरता है।

––मजदूर–संगठन बनाने के उपाय और तौर–तरीके

––शोषण और लूट का राज कैसे खत्म हो?

––मजदूरों के बीच एकता कैसे कायम हो?

––मजदूर एकता में बाधा डालने वाली बातें–– जाति–धर्म की दीवारें, गलत सोच और आदतें

––मजदूर वर्ग में मौजूद पूँजीवादी सोच, खुदगर्जी, जातिवाद, फिरकापरस्ती, आपसी भेदभाव

––मजदूर वर्ग की असली पहचान का सवाल यानी मजदूर केवल और केवल मजदूर होता है।

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