मजदूर किसे अपना संगठन मानें?
देशभर में कुकुरमुत्ते की तरह तमाम संगठन उग आये हैं, जिन्हें देखकर किसी भी मजदूर का सिर चकराने लगता है। उसके सामने सवाल उठता है कि हम किस संगठन को अपना मानें? हम किस संगठन की मदद करें और किससे हमारा फायदा होगा? ऐसे कुछ महत्त्वपूर्ण सवालों के जवाब यहाँ देने की कोशिश की जा रही है।
यह एक सच्चाई है कि जो संगठन मालिकों ने अपने लिए बनाया है, उससे मजदूरों का भला नहीं हो सकता। जैसे–– व्यापार संघ, जिसमें शहर के सभी छोटे–बड़े दुकानदार शामिल होते हैं, लेकिन व्यापार संघ केवल दुकानदारों के फायदे की बात करता है, मजदूरों के फायदे की नहीं। इसी तरह स्कूल–कॉलेजों के मालिकों ने जो संगठन बना रखा है, उससे न तो स्कूल में काम करने वाले मजदूरों–कर्मचारियों और न ही छात्रों का भला होता है। फैक्ट्री के मालिक भी आपस में मिलकर संगठन बनाते हैं और उससे अपना काम निकालते हैं। भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मण्डल यएसोचैमद्ध भारत के बड़े उद्योगपतियों और व्यापारियों के लिए काम करता है। ऑल इण्डिया आर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एण्ड ड्रगिस्ट्स दवा दुकानदारों का संगठन है। इण्डियन शुगर मिल्स एसोसिएशन यइस्माद्ध निजी चीनी मिल मालिकों का संगठन है।
ये सभी मालिकों के आर्थिक संगठन हैं। वे अपने संगठन की मीटिंगों में बैठकर फैसला लेते हैं कि फैक्ट्री, कॉलेज या हॉस्पिटल को किस तरह चलाया जाये। वे मीटिंग में ही फैसला करते हैं कि मजदूूरों को कम से कम कितनी सेलरी दी जाये, ताकि वे काम छोड़कर भाग न जायें। उन्हें कोई सुविधा दी जाये या नहीं। अगर मजदूरों का अपना संगठन नहीं है और मजदूर लड़ने के लिए तैयार नहीं रहते तो वे मजदूरों की सेलरी कम करते चले जाते हैं और इतनी कम कर देते हैं कि मजदूर अपना पेट भी न भर पाये। क्या आज ऐसी हालत देशभर के मजदूरों की नहीं है? यह सब बातें मजदूर भी समझते हैं। इसलिए वे मालिकों के संगठन को अपना नहीं मानते। ऐसा कोई भी संगठन जो मजदूर वर्ग के हक में नहीं है, उसे मजदूरों को अपना संगठन मानना भी नहीं चाहिए।
मजदूर अपने मालिकों के संगठन को अपना नहीं मानते, इसके पीछे कहीं और भी गहरे कारण हैं। हमारा समाज दो विरोधी वर्गों–– मालिक पूँजीपति और मजदूर में बँटा हुआ है। हालाँकि समाज में अलग–अलग तरह के काम करने वाले लोग शामिल हैं, लेकिन उनके बीच अमीर–गरीब और छुआछूत का भेदभाव बना हुआ है जो किसी भी अच्छे इनसान को दुख देता है। इतनी असमानता, अन्याय और भेदभाव के बावजूद समाज कैसे चल रहा है? दरअसल, समाज उत्पादन से चल रहा है जैसे–– अनाज का उत्पादन जो भोजन के लिए जरूरी है। जीवन के लिए दूसरे जरूरी सामान फैक्ट्रियों में बनाये जाते हैं। यह सभी उत्पादन मेहनतकश लोग यानी मजदूर करते हैं। उनमें से कुछ लोग रिलायंस मार्ट, बिग बाजार, मेट्रो जैसे बड़े–बड़े स्टोरों में काम करते हैं। कुछ लोग दुकानों में भी काम करते हैं। कुछ लोग घर, सड़क और पुल बनाते हैं। एक तरफ वे थोड़े से लोग हैं जो फैक्ट्रियों, दुकानदारों, मशीनों आदि के मालिक हैं। मालिक पैसे लगाने और अÕयासी करने के अलावा कुछ भी नहीं करते। वहीं दूसरी तरफ वे मजदूर हैं जो अपना खून–पसीना बहाकर और अपनी हड्डियाँ गलाकर उनमें काम करते हैं। मालिक और मजदूर में किसी भी तरह का मेल नहीं है, सिवाय इसके कि वे दोनों एक ही फैक्ट्री या कॉलेज पर निर्भर हैं।
यह बात आइने की तरह साफ है कि हमारा समाज दो बिलकुल विरोधी वर्गों में बँटा हुआ है। दोनों वर्गों के हित में कोई मेल नहीं है। एक पूरब है तो दूसरा पश्चिम। एक धरती है तो दूसरा आसमान। एक सुखी है तो दूसरा दुखी। एक मालिक है तो दूसरा मजदूर। मालिक पूँजीपति मजदूरों का हिस्सा हड़प लेता है। नयी–नयी कोठी और बँगले खरीदता है। जबकि मजदूरों की हालत खराब हो जाती है। वे ढंग से किराये के मकान में भी नहीं रह पाते। या अपना घर हो तो उसमें भी रोज–रोज नयी–नयी मुसीबतें आती रहती हैं। इस तरह मालिक और मजदूर में कोई मेल नहीं। मालिक और मजदूरों के संगठन भी अलग–अलग होते हैं, उसमें भी किसी तरह का मेल–मिलाप नहीं हो सकता है।
अगर इस बात को कोई मजदूर ध्यान में नहीं रखता तो वह भ्रम का शिकार बना रहता है और बार–बार धोखा खाता है। मालिक उससे अपने संगठन का काम मुफ्त में करवा लेता है और उसे मूर्ख बनाता रहता है। जब उस मजदूर को सही बात का पता चलता है, वह बरबाद हो चुका होता है और खुद की मूर्खता पर पछताता है।
जाति और धर्म के आधार पर जो संगठन बनाये गये हैं क्या वे मजदूरों के भले के लिए काम करते हैं या मालिकों के भले के लिए? अब हम इस बात पर चर्चा करेंगे। हमने देखा कि मजदूरों की खराब हालत के लिए मालिक पूँजीपति ही जिम्मेदार होता है। पूँजीपति के लिए मुनाफा सबकुछ है। वही उसका पीर–पैगम्बर, खुदा–भगवान या देवी–देवता है। वह उसी की माला जपता रहता है। मुनाफा बढ़ाने के लिए ही वह मजदूरों का खून निचोड़ता है, उनका हाड़–मांस गलाता है और मजदूरों के ऊपर बेइन्तहा जुल्म और जोर–जबरदस्ती करता है। मालिक यह भी समझता है कि मजदूर अगर इस सच्चाई को समझ गये और उसके खिलाफ लड़ने के लिए एकजुट हो गये तो अन्याय, शोषण और उत्पीड़न पर टिका उसका सारा महल ढह जायेगा। उसके सपने चूर–चूर हो जायेंगे और उसकी अÕयासी खत्म हो जायेगी। उसे भी रोटी खाने के लिए एक मजदूर की तरह मेहनत करनी होगी। इसलिए वह मजदूरों को भरमाता है, उनमें फूट डालता है और इस काम के लिए जाति और धर्म आधारित संगठन को खूब चन्दा देता है।
मालिक जाति–धर्म के संगठन बनानेे में खुलकर मदद करता है। इसके बदले में जाति और धर्म के आधार पर बने संगठन मालिकों को फायदा पहुँचाते हैं। तमाम हिन्दुत्ववादी संगठन, मुस्लिम संगठन और विभिन्न जातियों के संगठन मजदूरों को अलग–अलग खाँचों में बाँटते हैं और उनकी एकता को कमजोर करते हैं। कभी हिन्दू राष्ट्र और संस्कृति के नाम पर, तो कभी अल्लाह हू अकबर के नाम पर, तो कभी जातीय गौरव के नाम पर ये संगठन लगातार मजदूरों को भ्रम में डालते रहते हैं। ये संगठन मजदूर–वर्ग को दंगे की आग में झोंकने का काम भी करते हैं। अलग–अलग जातियों और धर्मों से आये हुए मजदूरों को आपस में लड़ाने के लिए ऐसे संगठन दिन–रात काम करते रहते हैं। मजदूर वर्ग की एकता तोड़कर, उन्हें कमजोर बनाकर ये संगठन मालिक पूँजीपति की सेवा करते हैं। इन संगठनों की एक विशेषता है कि वे कभी भूलकर भी मालिकों द्वारा मजदूरों के साथ किये जा रहे अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठाते। वे मजदूरों को स्वर्ग–नरक का सपना दिखाकर उनका सबकुछ लूट लेते हैं। मजदूरों के बच्चों को नकारा बना देते हैं। मजदूर अगर ऐसे किसी संगठन से जुड़ता है तो उसे सिवाय बरबादी के कुछ भी हासिल नहीं होता और लुट–पिट कर तथा खुद को दोषी मानकर वह घर बैठ जाता है। बाबा, मौलवी, पादरी और जातियों के छुटभैये नेता न केवल मजदूरों को लूटते हैं, बल्कि उनकी बहू–बेटियों पर गन्दी नजर गड़ाते हैं। ऐसे तमाम नेता जेल की कोठरियों में होने चाहिए, लेकिन आज ऐसे लोग विधान सभा और लोक सभा की शोभा बढ़ा रहे हैं।
भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सपा आदि सभी चुनावी राजनीतिक पार्टियाँ भी मालिक पूँजीपति की ही सेवा कर रही हैं। 1990 में हमारे देश में मजदूरों के खिलाफ नवउदारवादी आर्थिक नीतियाँ लागू की गयी थी, जो आज भी जारी हैं। ये नीतियाँ पूरी तरह से मेहनतकश वर्ग के खिलाफ हैं और मालिकों को फायदा पहुँचाती हैं। इनके चलते दिन–ब–दिन मजदूरों और किसानों की हालत खराब होती जा रही है। लाखों मजदूरों और किसानों की आत्महत्याएँ इसका सबूत है। तब से लेकर अब तक इनमें से जिन पार्टियों की सरकारें बनी, उन सबने इन नीतियों को बढ़–चढ़ कर लागू किया। नोटबन्दी के दौरान सबसे ज्यादा तकलीफ उठाने वाला मजदूर वर्ग ही था। कोरोना लॉकडाउन के दौरान देश और राज्य की सत्ताधारी पार्टियों ने मजदूरों को किस हालत में छोड़ दिया था यह किसी से छुपा हुआ नहीं हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों ने मजदूरों को उनके घर तक सुरक्षित पहुँचाने में किसी भी तरह की मदद नहीं की। लॉकडाउन के बीच महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश लौट रहे 16 मजदूरों की ट्रेन से कटकर मौत, औरैया में सड़क हादसे में 24 मजदूरों की दर्दनाक मौत–– ऐसी अनगिनत दर्दनाक घटनाएँ इसका सबूत हैं। क्या किसी पार्टी ने उनकी मदद की? क्या इस तरह की राजनीतिक पार्टियाँ मजदूर वर्ग की सच्ची पार्टियाँ हो सकती हैं?
गैर सरकारी संगठन यएनजीओद्ध भी मालिकों की ही सेवा करते हैं। ज्यादातर एनजीओ अमरीका द्वारा संचालित विश्व बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पैसे से चलाये जाते हैं। ये विदेशी संस्थाएँ एक तरफ तो देश को लूट कर कंगाल बना रही हैं, तो दूसरी तरफ लूट के खजाने से थोड़ा पैसा निकाल कर एनजीओ के जरिये दान–पुण्य का काम करके अपनी लूट पर पर्दा भी डाल रही हैं। अगर पूछा जाये कि एनजीओ के पास पैसा कहाँ से आ रहा है तो ये चुप हो जाती हैं। वे सब हराम की कमाई से चल रही हैं।
मजदूरों को उसी संगठन को अपना मानना चाहिए जो मजदूरों के द्वारा, मजदूरों के लिए और मजदूरों के पैसे तथा उनकी मदद से चलता हो जिसे मजदूरों ने खुद बनाया हो। मजदूरों की ट्रेड यूनियन उनका संगठन होती हैं। इसी तरह के दूसरे संगठन जो इन कसौटियों पर खरे उतरते हों, वे ही मजदूरों के सच्चे संगठन हैं–– (1) उद्देश्य, कार्यक्रम और माँग (2) संगठन के सिद्धान्त और काम करने के तरीके (3) नेताओं की स्थिति (4) समर्थक और जनाधार (5) खर्चे का जरिया (6) विचारधारा और राजनीति।
(1) उद्देश्य, कार्यक्रम और माँग
प्रत्येक संगठन का अपना साफ उद्देश्य होता है। उस उद्देश्य को पूरा करने के लिए कार्यक्रम और माँगें होती हैं। जैसा कि पहले बताया गया है कि हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जो वर्गों में बँटा है। इसलिए कोई भी संगठन किसी न किसी वर्ग के हित की पूर्ति के लिए होता है। उसकी माँगें और कार्यक्रम भी उसी के हिसाब से होते हैं। हाल ही में देश के पूँजीपतियों के संगठनों ने सरकार के सामने श्रम कानूनों में बदलाव की माँग रखी थी। इन श्रम कानूनों में बदलाव का सीधा मकसद है, ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना। इसके जरिये मजदूरों से तमाम अधिकार छीन लिये गये हैं। श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर काम के 8 घण्टे बढ़ाकर 12 घण्टे कर दिये गये हैं। पूँजीपति इन सभी पर कानून बनाने के लिए सरकार को राजी कर लेता है। आज की सरकारें तथा पुलिस–प्रशासन सभी इन पूँजीपतियों के लिए ही काम कर रहे हैं। जाहिर है इस तरह के ये सुधार मजदूरों के हित में नहीं हैं।
जाति और धर्म आधारित संगठन मजदूरों को गुमराह करने के लिए बनाये जाते हैं। मजदूर वर्ग को अशिक्षित बनाये रखना इनका असली मकसद होता है। जनता के बीच अन्धविश्वास और अज्ञानता को बनाये रखना इनके कार्यक्रम में हमेशा शामिल रहता है। क्या मजदूरों का बेतहासा शोषण करके अकूत मुनाफा बटोरने वाले पूँजीपतियों के संगठन मजदूर वर्ग के कभी हितैषी हो सकते हैं? पूँजीपती वर्ग के हित साधने वाली राजनीतिक पार्टियाँ मजदूर वर्ग के हितों को कैसे पूरा कर सकती हैं?
राम नाम का कीर्तन करानेवाला संगठन या तमाम ढकोसलेबाज बाबाओं के प्रवचन का कार्यक्रम आयोजित करनेवाला संगठन या रोजा–नमाज को बढ़ावा देनेवाला संगठन मजदूरों का संगठन नहीं हो सकता। ऐसा संगठन ही मजदूरों का सच्चा संगठन हो सकता है जिसका कार्यक्रम ऐसा हो, जिसमें मालिकों की लूट का खुलासा हो। मजदूरों के हितों की बात हो। मजदूरों को वर्ग के रूप में संगठित होने के लिए शिक्षित किया जाये। उसे संघर्ष के उसके इतिहास से परिचित कराया जाये। उसे इस बात का एहसास कराया जाये कि सारी दुनिया की दौलत उसके वर्ग के लोगों ने पैदा की है। इसलिए सबसे पहले इस पर उन्हीं का हक है। उनके हाथों की मेहनत से ही समाज की सारी चीजें पैदा हुई हैं, जिस पर आज पूँजीपति कब्जा जमाये बैठे हैं। अपना हक वापस लेने का संघर्ष मजदूरों के लिए आज सबसे जरूरी काम है। इसके लिए जो भी आन्दोलन, हड़ताल, आदि संघर्षं हो रहे हैं, उनमें कन्धे से कन्धा मिलाकर मजदूरों के साथ चलनेवाला संगठन ही सच्चे मायने में मजदूरों का संगठन है।
मजदूरों के संगठन का उद्देश्य यह होना चाहिए कि उन्हंे हर तरह के शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति मिले तथा एक ऐसी न्यायप्रिय व्यवस्था बने जिसमें उनके हक सुरक्षित रहें। उन्हें भी देश के सम्मानजनक नागरिक का दर्जा मिले। देश की नीतियों को बनाने और उसे लागू करने में उनका भी योगदान हो। सबसे बढ़कर उन्हें इनसान समझा जाये। लेकिन मालिकों की लूट के रहते ऐसा सम्भव नहीं है। मजदूर वर्ग का संगठन न केवल मजदूरों के फौरी हित जैसे–– मजदूरी बढ़वाने, मुफ्त इलाज, मुफ्त शिक्षा के लिए काम करता है, बल्कि वह मजदूरों के दूरगामी हित जैसे–– पूरी समाज व्यवस्था को बदलकर मजदूरों के हित में बनाने के लिए भी काम करता है।
जहाँ तक मजदूर संगठन की माँगों का सवाल है, तो वे मजदूरों के काम पर निर्भर करते हैं कि उनकी माँगें क्या होंगी। जैसे–– केमिकल फैक्ट्री में काम करनेवाले मजदूर की माँग होगी कि उसे ऐसे सुरक्षा के उपकरण दिये जायें जो उसे खतरनाक रसायनों के प्रभाव से बचा सकें। दुर्घटना होने पर तुरन्त मुफ्त इलाज की सुविधा दी जाये और वेतन सहित छुट्टी दी जाये। ऐसी ही कुछ माँगें उन मजदूरों की होंगी जो सफाई के लिए गटर या गन्दे नाले में उतरते हैं और अपनी जान को जोखिम में डालते हैं। हर तरह के पेशे में लगी महिला मजदूरों की कुछ खास माँगें होती हैं जो पुरुष मजदूरों की नहीं होती जैसे–– गर्भवती होने और माँ बनने पर वेतन सहित कम से कम छ: महीने की छुट्टी और जच्चा–बच्चा के लिए इलाज और पौष्टिक खाने की मुफ्त व्यवस्था आदि। अलग–अलग पेशों में लगे हुए मजदूरों की अलग–अलग माँगें हो सकती हैं, लेकिन सभी तरह के मजदूरों की कुछ एक जैसी माँगें भी होती हैं। जैसे–– आज की महँगाई को देखते हुए सभी मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी 25 हजार रुपये होनी ही चाहिए, जिससे वे सम्मानजनक जिन्दगी गुजार सकें। काम के दौरान मालिक या ठेकेदार द्वारा किये जा रहे उत्पीड़न से मुक्ति मिलनी चाहिए। इसके साथ मजदूरों के हक में बने श्रम कानूनों को लागू करने की माँग हो सकती है। जो संगठन इन माँगों को उठाता है, उसके लिए संघर्ष करता है, वही मजदूरों का सच्चा संगठन माना जा सकता है। इस लेख में मजदूरों की सभी माँगों को सामने नहीं रखा जा रहा है, बल्कि उनमें से कुछ को उदाहरण के रूप में यहाँ पेश किया गया है।
(2) संगठन के सिद्धान्त और काम करने के तरीके
जिस तरह कोई भी आदमी रीढ़ की हड्डी के बिना खड़ा नहीं हो सकता, उसी तरह कोई भी संगठन सिद्धान्त के बिना नहीं चल सकता। पूँजीपति वर्ग के सभी संगठनों का एक ही सिद्धान्त है–– मजदूरों और मेहनतकश आवाम को भ्रम में रखकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कामना और इस शोषणकारी व्यवस्था को बनाये रखना। मालिकों का संगठन मालिकों के फायदे के लिए अपनी मीटिंगों में नीतियाँ बनाता है। नीतियाँ बनाते समय मजदूरों की राय नहीं ली जाती। इन नीतियों में मजदूरों के फायदे की कोई चीज नहीं होती है। मालिकों के संगठन में केवल मुनाफा बढ़ाने के बारे में बात होती है, मजदूरों की हालत को बढ़िया बनाने के बारे में कोई बात नहीं होती। गलती से अगर कोई मजदूरों के फायदे की बात कर दे तो सभी मालिक उसे फाड़ खाने के लिए दौड़ते हैं। इसलिए मुनाफे की हवस में चलनेवाले मालिकों के संगठन से मजदूरों का कोई भला नहीं हो सकता। शोषण की इस व्यवस्था को बनाये रखने के लिए मालिकों के दूसरे संगठन भी हैं–– जैसे राजनीतिक पार्टियाँ और जाति एवं धर्म आधारित संगठन। ये संगठन भी किसी न किसी सिद्धान्त पर काम करते हैं।
सही सिद्धान्त के बिना मजदूरों का संगठन एक भीड़ बनकर रह जाता है और कोई भी ऐसा काम करने में सफल नहीं होता, जो मजदूरों के हित में हो। सही सिद्धान्त के अभाव में मजदूर एक–दूसरे पर विश्वास नहीं करते और उनकी एकता कमजोर बनी रहती है। इसलिए मजदूर संगठन के पास सही सिद्धान्त होने चाहिए जिसकी रोशनी में वे रोजमर्रे के अपने सांगठनिक कामों को पूरा करें। सही सिद्धान्त में शामिल हैं–– मजदूरों की ऊँचे स्तर की एकता का सिद्धान्त जो सही विचारधारा के आधार पर ही हासिल की जा सकती है, अनुशासन का सिद्धान्त, संगठन में शामिल करने और निष्कासित करने का पैमाना यानी सदस्यता का मानदण्ड, मजदूरों के हक में संगठन को चलाने के लिए जनवादी सिद्धान्त और जन–संघर्ष को आगे बढ़ाने का सिद्धान्त, मानसिक श्रम पर शारीरिक श्रम को वरीयता देने वाला सिद्धान्त आदि।
मजदूर संगठन के काम करने का तरीका ‘जनवादी’ होना चाहिए। जनवादी होने का मतलब है–– सबकी राय लेना, सबको बात रखने का मौका देना, नेता अपनी बात न थोपे, बल्कि नेताओं को चाहिए कि वह अपनी बात से सबको सहमत करे, मिल–जुलकर फैसला लेना, अगर फैसला सबकी सहमति से नहीं हो पा रहा है तो अल्पमत–बहुमत के आधार पर फैसला लेना, बहुमत की राय के हिसाब से काम आगे बढ़ाना, लेकिन अल्पमत की बात को दर्ज करना तथा उसे सवाल पूछने की अनुमति देना। तय नीति और लिये गये फैसले के हिसाब से व्यवहारिक काम करना, नियमित मीटिंग करके कामों को सही तरीके से संचालित करना तथा गलतियों–कमियों को सुधारते रहना, संगठन और मजदूर वर्ग के विरोध में काम करनेवालों या संगठन के अनुशासन को तोड़नेवालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना आदि।
(3) नेताओं की स्थिति
आम मजदूरों के लिए संगठन उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं के रूप में ही सबसे पहले दिखायी देता है। अगर किसी संगठन के कार्यकर्ता अनुशासित, मेहनती, मजदूर वर्ग से प्रेम करनेवाले, श्रम की गरिमा को महत्त्व देनेवाले, जुझारू और वैज्ञानिक नजरिये से लैस होते हैं तो वे तमाम मजदूर विरोधी संगठनों के कार्यकर्ताओं से अलग नजर आते हैं। मजदूर उन्हें पसन्द करते हैं और उनका स्वागत करते हैं। नेता और कार्यकर्ता का मजदूरों के साथ मछली–पानी का सम्बन्ध होता है। वे दुहरी जिन्दगी नहीं जी सकते कि अपने लिए सुख–सुविधा और अÕयासी भरी एक अलग जिन्दगी जीयें और मजदूरों के बीच जाकर मसीहा बनने का ढोंग करें। जब मजदूर किसी संगठन से जुड़ते हैं तो वे सबसे पहले उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं को बड़ी बारीकी से परखते हैं। अगर वे इस परीक्षा में फेल हो गये तो मजदूर उन पर विश्वास नहीं करते और उन्हें उन पर विश्वास करना भी नहीं चाहिए।
वर्गीय पृष्ठभूमि की बात करें तो यह सामान्य सी बात है कि मजदूर वर्ग के नेता और कार्यकर्ता अधिक संख्या में मजदूरों के बीच से ही आते हैं। मध्यम वर्ग या दूसरे सम्पत्तिशाली वर्ग से आये नेता और कार्यकर्ता भले ही संख्या में कम हो, लेकिन वे संगठन में अच्छी भूमिका निभा सकते हैं, अगर वे खुद को मजदूर वर्ग की विचारधारा से जोड़ लें, मजदूरों के बीच रहें और समर्पित होकर मजदूरों के लिए काम करते रहें। ऐसा करते हुए उनका वर्गीय रूपान्तरण बेहद जरूरी है, जो त्याग और समर्पण की भावना के चलते ही सम्भव होता है। अगर वे रूपान्तरण के लिए दिल से तैयार नहीं होते या वे खुद को बदल नहीं पाते तो उन्हें पग–पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और परेशान होकर वे इस काम से दूर हट जाते हैं। मजदूर वर्ग से आये कार्यकर्ताओं को भी कठिन मेहनत करके खुद को तैयार करना पड़ता है, जिससे वे संगठन के विभिन्न तरह के कामों को सही तरीके से कर पायें और पूरे मजदूर वर्ग को कदम–दर–कदम आगे बढ़ाते हुए संघर्षों में शामिल कर सकें तथा उन्हें भावी क्रान्ति के लिए भी तैयार कर सकें।
(4) समर्थक और जनाधार
किसी भी संगठन के समर्थक वही लोग होते हैं जिनके हितों के लिए वह काम करता है। उसका जनाधार उन्हीं लोगों के बीच होता है। उसको चलाने के लिए समर्थक अपने संसाधन मुहैया करते हैं। उसके बदले ये संगठन उनकी समस्याओं का हल निकालते हैं। मजदूर वर्ग का संगठन वही हो सकता है जो मजदूरों के बीच काम करे और मजदूरों की समस्याओं को हल करे। उनकी रोजमर्रा की जिन्दगी के संघर्षों में उनका साथ दे।
मजदूर वर्ग को संगठित करने, उसमें जनाधार तैयार करने और उसे संघर्षों में शामिल करने के लिए समय–समय पर मजदूरों के बीच में कई कार्यक्रम आयोजित करने पड़ते हैं। उनमें से कुछ इस तरह हैं–– मेडिकल कैम्प, स्कूल और शिक्षण संस्था, नुक्कड़ नाटक और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम, विचार गोष्ठी, धरना–प्रदर्शन आदि। किसी भी संगठन के लिए अपना जनाधार तैयार करना बहुत मेहनत का काम है। संंगठन के नेता और कार्यकर्ता बिना थके लगातार काम करके ही जनाधर तैयार कर पाते हैं। समर्थक और जनाधार के बिना कोई भी मजदूर संगठन किसी भी तरह का बदलाव नहीं ला सकता।
(5) खर्चे का जरिया
किसी भी संगठन के लिए आर्थिक मदद का सवाल इसलिए भी एक जरूरी सवाल है कि आर्थिक मदद के बिना किसी भी काम को पूरा कर पाना मुश्किल है। हमारे समाज में अलग–अलग वर्गों की पार्टियाँ और संगठन हैं। जो संगठन जिनके लिए काम करते हैं, उन्हीं से चन्दा लेते हैं। किसी भी संगठन के मददगार उसे चन्दा तभी देते हैं, जब उन्हें उसके उद्देश्य और कार्यक्रम सही लगें। संगठन भी अपने सहयोगियों के प्रति जवाबदेह होते हैं। संगठनों के सहयोगी उसकी गतिविधियों पर नजर रखते हैं और यदि सन्तुष्ट न हों तो वे संगठन को मदद करना बन्द कर देते हैं। चुनाव लड़ने वाली पार्टियाँ पूँजीपतियों से चन्दा लेती हैं और उनके लिए काम करती हैं। यह एक खुली सच्चाई है। किसी भी मजदूर को इस बात का पता होना बेहद जरूरी है कि किसी संगठन की जरूरतों के लिए पैसा कहाँ से आ रहा है। मजदूर वर्ग का संगठन मजदूरों के चन्दे से चलता है। सही मायने में वही संगठन मजदूर वर्ग का संगठन होगा जो उसकी मदद के भरोसे खड़ा होगा।
(5) विचारधारा और राजनीति
मजदूरों को किसी भी संगठन में शामिल होने से पहले उसकी विचारधारा को जानने की कोशिश करनी चाहिए। विचारधारा का सम्बन्ध उन विचारों से है जो समाज के किसी वर्ग के हितों को पूरा करते हैं। मजदूर वर्ग की एक ही सच्ची विचारधारा है जो मेहनत के सिद्धान्त पर टिकी है, जिसके मूल में है–– मेहनत की कमाई पर मेहनत करनेवाले, यानी मजदूर का अधिकार होना चाहिए, न कि शोषक पूँजीपतियों का। मजदूरों की मेहनत को चुराना, उनकी पूरी मजदूरी न देना, सबसे बड़ा अपराध है, अगर कोई समाज इसे अपराध नहीं कहता, तो वह समाज भी अपराधी है और मेहनत की चोरी करनेवाले पूँजीपतियों के साथ है। संगठन की विचारधारा सच्ची है या झूठी वह इसी बात से पता चलता कि संगठन मेहनत के सिद्धान्त पर विश्वास करता है या नहीं।
तमाम एनजीओ, धार्मिक संगठन, चुनावी पार्टियाँ आदि सभी मेहनत के सिद्धान्त को नहीं मानतीं। उन्हें समाज की नंगी सच्चाई दिखायी नहीं देती। वे यह नहीं देखना चाहतीं कि पूरे समाज के लिए कपड़ा बनाने वाले मजदूरों के तन पर ठीक ढंग का कपड़ा नहीं है। खेतों में अनाज पैदा करने वाला खेतिहर मजदूर खुद अपने और अपने बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाता। सीमेण्ट की बोरियाँ ढोने वाला मजदूर सड़कों की डिवाइडर पर सोने को मजबूर है। घर बनाने वाला कारीगर और उनके सहयोगी मजदूरों के पास खुद का कोई घर नहीं है। इन सभी मजदूरों की मेहनत के शोषण पर जिन्दा हरामखोर मालिक और ठेकेदार जोंक की तरह दिन–रात मजदूरों का खून चूसते रहते हैं, फिरभी इज्जतदार बने रहते हैं।
इन संगठनों की इतनी हिम्मत नहीं है कि वे पूँजीपतियों को चोर कह सकें जो दिन–रात मजदूरों का हक मारते रहते हैं। अगर उन्होंने ऐसा कहने की हिम्मत की तो पूँजीपतियों के पास से आनेवाली उनकी खैरात बन्द हो जायेगी और पूँजीपतियों के ये पालतू भूखों मर जायंेगे। वे धोबी के कुत्ते की तरह न घर के रहेंगे न घाट के। इसलिए उनकी भलाई इसी में है कि वे पूँजीपतियों के आगे दुम हिलायें और मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दें। मजदूरों की भलाई इसी में है कि वे इनके झाँसे में न आयें।
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इन सभी पैमानों पर परखने के बाद कोई भी मजदूर आसानी से समझ सकता है कि कौन सा संगठन मजदूर वर्ग की भलाई के लिए काम कर रहा है और वह कितना सच्चा संगठन है। अगर कोई मजदूर इन बातों पर ध्यान नहीं देता और किसी भी संगठन के करीब चला जाता है या उसके लिए काम करता है या उससे जुड़ता है तो वह खुद को भुलावे में डालता है। वह आँख मूँदकर एक ऐसे रास्ते पर बढ़ता है जिस ओर गहरी खार्इं मौजूद है। देर–सवेर वह उसमें गिर जायेगा और खुद को कोसेगा। लोग उसका मजाक उड़ायेंगे।
अगर मजदूर ठोक–बजाकर किसी संगठन से जुड़ता है, जिसे वह सच्चा संगठन मानता है तो इसका मतलब यह नहीं कि जुड़ने के बाद वह अपनी जाँच–पड़ताल और निगरानी में कमी आ जाने दे। नहीं, ऐसा करना ठीक नहीं। उसे चाहिए कि संगठन में शामिल होने के बाद न केवल वह संगठन के लिए अनुशासित होकर लगन से काम करे, बल्कि वह हमेशा इस बात का ध्यान रखे कि उसका संगठन सही दिशा में जा रहा है या नहीं। सभी काम ठीक से हो रहे हैं या नहीं। अगर उसे कहीं गड़बड़ी दिखायी दे तो उसे फौरन उसमें सुधार लाने के लिए कदम उठाने चाहिए। गलत रास्ते पर जाने से लोगों को रोकना चाहिए। इस तरह सही निगहबानी में ही मजदूरों का कोई भी संगठन हमेशा सही रास्ते पर चलता रहेगा। मजदूर संगठन का इतिहास हमें बताता है कि जब कभी मजदूरों की निगरानी में ढील हुई, संगठन को बर्बाद होने से नहीं बचाया जा सका।