मजदूरों का बेइंतहा शोषण करनेवाली ब्रांडेड कम्पनियाँ

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

ब्रांडेड कपड़ों, जूतों आदि के दाम हमें चैंका देते हैं। हमारा मकसद इन ब्रांडेड चीजों के दामों की लिस्ट बताना नहीं है। फिर भी क्या आपने कभी 5 लाख 24 हजार रुपये की जिन्स या 2 लाख 19 हजार रुपये की जैकेट या 2 लाख 50 हजार रुपये के बैग के बारे में सोचा है? जी हाँ, इन बड़े ब्रांडों–– जारा जिन्स, राल्फ लारेन जैकेट और हरमेस बैग जैसी चीजों की कीमत इतनी ही होती है जिनका इस्तेमाल पैसेवाले लोग करते हैं, लेकिन इन्हें बनानेवाले मजदूरों को न के बराबर मजदूरी मिलता है।

अंग्रेजी दौर में असेम्बली बम काण्ड पर चल रहे मुकदमें के दौरान भगत सिंह और वटुेकेश्वर दत्त ने बयान दिया था कि फ्समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके बुनियादी अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं।–––– दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने और अपने बच्चों के तन ढँकने–भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार और बढ़ई खुद गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन–लीला समाप्त कर जाते हैं।” ये बातें उन्होंने 90 साल पहले कही थी, लेकिन आज हालात उससे भी खराब हो गये हैं।

इण्टरनेशनल ब्रांड के कपड़े बनाने वाले मजदूरों के बारे में––एक्शन एड की रिपोर्ट बताती है कि इन कपड़ों को तैयार करने के लिए भारत में डेढ़ करोड़ लोग फैक्ट्रियों और लाखों लोग घरों में काम करते हैं। यह काम अधिकतर महिलाएँ करती हैं, जो दिन भर बच्चों को पालती हैं और घर का काम भी करती हैं। कढ़ाई करना, सिलाई करना, टाँका लगाना, मोती पिरोना आदि तरह–तरह के काम होते हैं। महिलाएँ छोटे–छोटे अंधेरे और सीलन भरे कमरों में इन कामों को करती हैं, जिससे वे अन्धेपन और साँस की बीमारी से ग्रस्त हो जाती हैं। अच्छा और पौष्टिक खाना न मिलने के चलते वे उम्र से पहले ही बूढ़ी हो जाती हैं। यही हाल ऐसा काम करनेवाले पुरुष मजदूर और बच्चों के भी हैं।

गाँव में रोजगार न होने के चलते गरीब महिलाएँ लेबर ठेकेदारों के साथ शहर आ जाती हैं। वहाँ उन्हें दड़बे नुमा घरों में रखा जाता है। ओवर टाइम दिये बिना ही उन्हें देर रात तक काम कराया जाता है और बहुत ही कम मजदूरी दी जाती है।

देश की राजधानी दिल्ली में इन महँगे ब्रांड के कपड़े बनानेवालों को आठ घण्टे की औसतन मजदूरी 80 रुपये मिलती है। जयपुर में यह 78 रुपये, शाहजहाँपुर में 73 रुपये और मेरठ में सबसे कम 51 रुपये है। सोचने वाली बात है कि लाखों का सामान बनानेवाले मजदूरों को कितना कम मिलता है! इन महिला मजदूरों की भर्ती करते समय ठेकेदार इस बात का ध्यान रखते हैं कि महिला का परिवार कर्ज में डूबा होना चाहिए और उस महिला के पास रोजगार का कोई दूसरा साधन न हो। ठेकेदारों ने ऐसा जाल बिछा रखा है कि अगर कोई भी महिला मजदूर अपने उफपर हो रहे अन्याय का विरोध करेगी तो उसे इस क्षेत्र में कहीं भी काम नहीं मिलेगा।

इन सारे मामले में ब्रांडेड कम्पनी का मालिक बिलकुल अलग होता है क्योंकि इन महँगे उत्पादों को जिन नामों से बेचा जाता है, उस नाम से उनकी कोई फैक्ट्री होती ही नहीं। इनकी सप्लाई चेन में कुछ फैक्ट्री मालिक और ठेकेदार का ही रोल होता है। अधिकतर मजदूरों को पता ही नहीं होता है कि वे किस ब्रांड के लिए काम कर रहे हैं और उनके बनाये सामान की बाजार में क्या कीमत है।

इन सबके चलते ब्रांड के मालिक हर तरह की कानूनी कार्रवाई से बचे रहते हैं और अकूत मुनाफा कमाते हैं। मजदूरों की मेहनत की लूट के चलते ही एक ओर हर रोज नये–नये अरबपति पैदा हो रहे हैं और दूसरी ओर करोड़ों मजदूर कंगाल होते जा रहे हैं।

भगत सिंह ने सवाल किया था कि यह भेदभाव आखिर कब तक चलेगा? यह सवाल आज भी जिन्दा है।

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