मजदूरों के लिए निशुल्क मेडिकल कैम्प का आयोजन

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

आज शहरों में बड़े प्राइवेट अस्पताल हैं जिसमें हजारों की फीस देकर इलाज करा पाना मजदूरों के लिये सम्भव नहीं है। आज प्राइवेट मॉडल पर आधारित चिकित्सा मजदूरों की पहुँच से दूर होती जा रही है। कई शहरों में सरकारी अस्पताल की हालत खराब है और कुछ शहरों में यह उपलब्ध है तो वहाँ लम्बी लाइन लगाकर दवा हासिल करने के लिए किसी मजदूर को दिन भर की अपनी दिहाड़ी गँवानी पड़ती है। वैसे तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने सभी नागरिकों के लिए निशुल्क इलाज और शिक्षा की व्यवस्था करे। लेकिन सवाल यह है कि जब कोई सरकार अपनी इस जिम्मेदारी से मुँह मोड़ ले तो क्या किया जाये? ऐसे में केवल सरकार का विरोध करना ही जरूरी नहीं, बल्कि यह भी जरूरी है कि जहाँ तक सम्भव हो समाज के लिए काम करनेवाले संगठनों को यह जिम्मेदारी उठानी चाहिए। इससे न केवल कुछ जरूरतमंद लोगों की मदद हो सकेगी, बल्कि सरकार को भी उसके कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का एहसास कराया जा सकेगा।

इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए ‘मजदूर सहायक समिति’ ने मेरठ के एक गाँव में निशुल्क मेडिकल कैम्प का आयोजन किया। यह कार्यक्रम भगतसिंह के जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित किया गया था। विशेष आग्रह पर लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज, सुभारती मेडिकल कॉलेज और कैलाशी अस्पताल के 5 अनुभवी डॉक्टरों ने इसमें अपना सहयोग दिया। गाँव के लगभग 350 लोगों ने इस कैम्प में आकर उचित दवाई और चिकित्सक की सलाह ली। इस काम में सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिली। साथियों और गाँव के आम लोगों के सहयोग से ही यह कार्य सम्भव हो पाया।

इस गाँव में अधिकतर संख्या दिहाड़ी मजदूरों की है। जो सब्जी बेचने, बढ़ई और पुताई का काम करते हैं। मेडिकल कैम्प के आयोजन से 3 दिन पहले प्रचार का काम शुरू कर दिया गया। घर–घर जाकर पर्चे के माध्यम से लोगों को इसकी जानकारी दी गयी और लोगों में कौन–कौन सी आम बीमारियाँ हैं, इसका पता लगाया गया। पर्चे में आयोजन की जानकारी के साथ ही भगतसिंह के विचारों, उनके सपनों के बारें में भी बताया गया। साथ ही रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा के संकट पर भी बात रखी गयी। जगह–जगह पर पोस्टर भी चिपकाये गये। आयोजन वाले दिन सुबह प्रभातफेरी निकाली गयी, जिसमे क्रान्तिकारियों के गीत और हिन्दू–मुस्लिम एकता के नारे लगाये गये। सुबह 10 बजे एक प्राइवेट स्कूल में कार्यक्रम की शुरुआत हुई। देखते ही देखते इलाज के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। गाँव के ही कुछ नौजवानों ने उन्हें व्यवस्थित करने में पूरा सहयोग किया। फोड़े, फुंसी, हाथों–पैरों में खुजली, सामान्य बुखार की समस्या से अधिकतर लोग पीड़ित नजर आये। छोटे–छोटे बच्चांे के हाथ, पैर और सिर में मोटे–मोटे फोड़े निकले हुए थे। दिन–प्रतिदिन दूषित होते पानी की वजह से यह समस्या गावों में बढ़ती जा रही है। लेकिन सरकार इससे मुँह मोड़े बैठी है। लोग कैंसर जैसी कई अन्य बीमारियों से भी पीड़ित नजर आये।

मेडिकल कैम्प के साथ ही मजदूर परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का पता लगाने के लिये सर्वे भी किया गया। लगभग 150 लोगों ने इस सर्वे में हिस्सा लिया। सर्वे से पता चला कि सुबह से शाम तक जीतोड़ मेहनत करने के बाद अधिकतर परिवारों की आय बेहद कम है। अधिकतर दिहाड़ी पर काम करते है जिसमें पूरे महीने काम मिलना भी मुश्किल होता है। अधिकतर परिवार कर्ज के जाल में बहुत अन्दर तक धँसे हुए हैं। मजबूरी में गाँव के ही धनी लोगों से कर्ज लेने से उन्हें सामान्य से बहुत ज्यादा ब्याज दर 40 से 120 प्रतिशत सालाना चुकाना पड़ता है। सरकार की किसी भी योजना का लाभ उन्हें नहीं मिल पाता। अधिकतर मजदूरों के पास अपना घर भी नहीं है, वे किराये पर रहते हैं। 

गाँव में इससे पहले भी कई बार सरकारी अस्पतालों की तरफ से मेडिकल कैम्प लगाये गये थे। लेकिन लोगों में उन्हें लेकर गुस्सा साफ नजर आ रहा था। गाँव वालों ने बताया कि सरकारी डॉक्टर उनकी बात तक नहीं सुनते, केवल दिखावे के लिए आते हैं। लेकिन हमारे कैम्प के सफल आयोजन और साथियों तथा डॉक्टरों के दोस्ताना व्यवहार से मजदूर संतुष्ट नजर आये। सोचिये, जब थोड़े साधनों और जनता की मदद से एक गाँव में सफल मेडिकल कैम्प लगाकर लोगों का इलाज किया जा सकता है तो ऐसा मॉडल पूरे देश के लिए लागू क्यों नहीं किया जा सकता।

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