मजदूरों को मालिकों की नकल क्यों नहीं करनी चाहिए?
मजदूरों की खराब हालत उन्हें प्रेरित करती है कि वे अपनी जिन्दगी को बेहतर बनायें। कुछ मजदूर अधिक मेहनत करके ज्यादा पैसे कमाकर अपनी जिन्दगी सुधारना चाहते हैं। वहीं, कुछ मजदूर अपने मालिक से लड़–झगड़कर अपना हक पाना चाहते हैं। इन सबसे अलग कुछ मजदूर ऐसे भी हैं, जो खुद मालिक बनने का सपना देखते हैं। वे समाज में देखते हैं कि जो मालिक है, पैसे वाला है, उसकी सभी जरूरतें पूरी होती हंै। उसके बच्चे अच्छी पढ़ाई कर पाते हैं और बड़ी नौकरियाँ करके या बड़े बिजनेस से मोटी कमाई करके और अधिक अमीर बन जाते हैं। मजदूर यह भी देखते हैं कि बीमारी हो जाने पर अमीर मालिक का अच्छा इलाज हो जाता है, जबकि मजदूर परिवार के बीमार लोग महँगा इलाज नहीं करा पाते और तड़प–तड़प कर मरते रहते हैं। यही सब समाज में चल रहा है। जो अमीर हंै, वे सारी खुशियाँ लूटते हैं, खूब मजा मारते हैं और गरीब मजदूरों के हिस्से में दु:ख ही दु:ख है। ऐसे में अगर कोई मजदूर खुद को मालिक बनाने का सपना देखे और इसके लिए काम करे, तो इसमें क्या बुराई है?
अब इस पर विचार करें कि मालिक बनने का सपना देखने वाला मजदूर क्या करे कि उसके सपने पूरे हो जायें। हमारे मजदूर के दिमाग में जो–जो आइडिया आते गये, उन्हें वह आजमाता गया। वह दो–दो शिफ्रटों में काम करके अधिक पैसे कमाने लगा। परिवार के दूसरे सदस्य भी काम पर लग गये। छोटे–छोटे बच्चे भी काम पर जाने लगे। अधिक से अधिक पैसे की बचत होती गयी और कम से कम खर्च करके उसके हाथ में कुछ पैसे जुटने लगे। लेकिन हाड़–तोड़ मेहनत करके पैसे बचाने के बाद वह क्या देखता है? वह देखता है कि मकान का किराया बढ़ गया है। बिजली का बिल, गैस सिलेण्डर, राशन और सब्जी की कीमतें बढ़ती जा रही हैं। पैसे हाथ से फिसलकर भाग रहे हैं। उसने सुन रखा है कि पैसा हाथ का मैल है, यह सच लग रहा है। अधिक पैसा कमाने का और कम पैसा खर्च करने का उपाय बढ़ती महँगाई के आगे बेकार हो जाता है। वह हताश–निराश हो जाता है। दूसरे मजदूरों और रिश्तेदारों से बात करता है, लेकिन सबकी हालत एक जैसी है।
बहुत सोचने–विचारने पर उसे एक उपाय सूझता है। अगर मकान अपना हो तो किराये के सारे पैसे बच जायेंगे। उसने जमीन का रेट पता किया। आज सस्ती से सस्ती जमीन भी 5 से 10 हजार रुपये गज है और छोटे से छोटा कमरा बनवाने के लिए उसे 25 से 30 गज चाहिए। यानी डेढ़ लाख रुपये जमीन खरीदने में लग जायेंगे और साधारण कमरे बनवाने में भी तीन लाख लग जायेंगे, यानी कुल मिलकर 4 से 5 लाख चाहिए। अगर वह 4 हजार भी महीने में बचाये तो इस हिसाब से उसे पैसे जुटाने में दस साल लगेंगे। यह सोचकर वह घबरा गया। क्या मेरे पास अपना घर नहीं होगा? बीबी–बच्चे उदास हो गये। उसने इरादा मजबूत करके पैसा जुटाना शुरू कर दिया। लेकिन कभी बीमारी और कभी रोजगार की कमी उसकी बचत के पैसों को ले उड़ी। कई बार ऐसा समय भी आया कि वह कर्ज में डूब गया।
फिर वह क्या करे? क्या मेरे पास अपना मकान भी नहीं होगा? दूसरे मौज कर रहे हैं और हम गरीबी में घुट–घुट कर मरते रहें। उसे लगा कि कहीं से दस बीस लाख रुपये मिल जाएँ, तो दिन सुधर जाये। पहले जब लॉटरी पर पाबन्दी नहीं थी तो कुछ मजदूर रोज लॉटरी की दुकान पर किस्मत आजमाने पहुँच जाते थे। हजारों लाखों में किसी एक की किस्मत चमक जाती थी। बाकी लोेग मेहनत की कमाई उड़ाकर हाथ मलते रह जाते थे। लेकिन अब तो यह रास्ता भी बन्द है। सरकार ने लॉटरी को बन्द कर दिया है। तो क्या कहीं डकैती डाली जाये? एटीएम मशीन उखाड़ लें? किसी दुकान का माल गायब कर दें? लेकिन अगले पल उसे पड़ोस के बबलू और उसके साथियों की याद आ गयी। उन्होंने दीवार तोड़कर सुनार की दुकान से लाखों के गहने उड़ा दिये थे, लेकिन पता नहीं कहाँ से पुलिस को खबर मिल गयी। अब तो हर जगह सीसीटीवी कैमरे की निगरानी है और शहर भर में पुलिस के मुखबिर फैले रहते हैं। पुलिस ने उन्हें रातोंरात उठा लिया और थाने में उन पर जमकर डण्डा पफेरा। कहावत है कि मार के आगे भूत भी बोलते हैं। सारा किस्सा बक दिया। गहने पुलिस ने बरामद कर लिये। दो–दो साल की सजा हुई और हरजाना भी देना पड़ा क्योंकि सुनार के जितने गहने गायब हुए थे, उसने उससे 2–4 लाख फालतू का बता दिया था। यह किस्सा याद आते ही चोरी या डकैती का इरादा मजदूर के दिमाग से फुर्र हो गया।
यह सब करते–कराते पाँच–दस साल गुजर गये। मजदूर की हालत अच्छी होने के बजाय और खराब होती गयी। उसके बाल पकने लगे। जिन्दगी का अनुभव बढ़ता गया। उसके दिमाग में एक खास आइडिया आया। क्यों न कोई बिजनेस किया जाये? वह देखा कि क्रिकेट के जो ग्लब्स वह बनाता है, वे 300 से 500 रुपये के बिकते हैं, जबकि उसमें सामान 50 रुपये का भी नहीं लगता। उसने सोचा कि मुझे हर ग्लब्स पर केवल 10 रुपये मजदूरी मिलती है। अगर वह खुद कच्चा माल मँगवाकर, सिलाई करके अमेजन या फ्रिलपकार्ट पर बेचे तो कितना फायदा होगा! उसने अनुमान लगाया कि कच्चा माल सिलाई मशीन और दूसरे सामान लेने पर उसे 2 से 3 लाख खर्च करने पड़ेंगे। इतने पैसे आयेंगे कहाँ से? बहुत भाग–दौड़ करने पर दो लाख कर्ज मिल गया। उस पर 5 प्रतिशत मासिक ब्याज है, यानी एक साल बाद एक लाख 20 हजार ब्याज का और जुड़ जायेगा। बूढ़े–बुजुर्गों ने समझाया कर्ज मत लो। पत्नी ने झगड़ा किया, बच्चे रूठ गये। महाजन ने उधार राशन देना बन्द कर दिया। लेकिन मजदूर ने किसी की न सुनी। उसने किराये के दूसरे कमरे में अपना छोटा–सा कारखाना खोला। पत्नी झाँकने आयी। बच्चों ने कमरे में उछल–कूद मचायी। तजुर्बे ने कमाल कर दिखाया। सुन्दर–सजीले ग्लब्स बनकर तैयार होने लगे। मजदूर आठ घण्टे दिहाड़ी करके परिवार चलाता। अगले 7–8 घण्टे अपने कारखाने में काम करता। पत्नी और बच्चे भी, जो बाहर काम करते थे, अपने कारखाने में काम करने लगे।
सब कुछ ठीक चला। हालाँकि परिवार के लिए समय न मिलने पर तनाव जैसी स्थिति बनी रही। फिर भी माल खूब ज्यादा तैयार हो रहा था। एक बड़ी समस्या ने आ घेरा। माल बिकने बन्द हो गये। तमाम जोड़–तोड़, बेचने वाले को छूट और भाग–दौड़ के बाद भी कुछ हजार के ही माल बिके। लॉकडाउन और महामारी ने लोगों को और तबाह किया। रोटी–दाल को मुहताज लोगों के घरों के बच्चे क्रिकेट खेलना छोड़ मजदूरी पर लग गये। जो क्रिकेट खेलते भी थे, वे लेदर की गेंद के बजाय टेनिस की गेंद से, जिसमें ग्लब्स की जरूरत ही नहीं पड़ती। ऊपर से बड़ी कम्पनियों ने ग्लब्स के दाम गिरा दिये थे। उनके पास विज्ञापन की भी ताकत थी। बाजार में उन्हीं के माल बिकते थे। मजदूर का माल रखा रह गया। कर्ज देने वाले सिर पर चढ़ आये। कई महीने से बिजली का बिल बकाया होने से बिजली काट दी गयी। मकान मालिक धमकी दे गया कि बकाये के पाँच महीने का किराया चुका दो, नहीं तो मकान छोड़ दो और बदले में जब तक किराया न चुकता हो अपना कोई कीमती सामान गिरवी रख दो।
मजदूर को समझ न आये, गलती कहाँ हुई। बिजनेस में घाटा कैसे हुआ? साल बीता, दो लाख का कर्ज तीन लाख से ऊपर हो गया। कहावत है न कि जब तक आफत चारों ओर से न घेर ले, तब तक वह आफत कैसी। मजदूर जिन्दगी से निराश होता चला गया। वह मालिकों से नफरत करने लगा। हर अमीर आदमी को देखकर जलन के मारे, उसके मन में आग लग जाती।‘‘ये सब चोर–लुटेरे हरामखोर हैं। मेहनत की कमाई से कोई अमीर नहीं बन सकता।’’ वह सोचता और गाली देते हुए बड़बड़ाता। शराब पीना रोजमर्रे की आदत बन गयी। पत्नी से झगड़ा और मारपीट, चीख–चिल्लाहट से पड़ोसी परेशान हो गये। बच्चों ने बचपन में ही इतना सह लिया कि बूढों जैसे हो गये। बच्चों को लेकर पत्नी मायके चली गयी। कुछ दिन मजदूर को सुकून मिलता रहा, लेकिन फिर बच्चों की याद आयी। पत्नी को लाने पहुँचा। मायके वालों ने महिला को समझाया, ‘‘ससुराल ही तुम्हारा असली घर है।’’ वह वापस आ गयी। आत्महत्या के ख्याल उसके दिमाग में लहरों की तरह आते हैं और गायब हो जाते हैं। कोई नहीं जानता कब यह ख्याल हकीकत में बदल जाये।
आप लोग यह सोच रहे होंगे कि मैं यह कहानी आपको क्यों सुना रहा हूँ। मैं यह बताना चाहता हूँ कि मजदूरों को मालिकों की नकल क्यों नहीं करनी चाहिए? मुझे लग रहा है कि कहानी से मेरी यह बात साफ हो गयी होगी।
कहते हैं कि पैसा पैसे को खींचता है। यानी किसी व्यवसाय को शुरू करने के लिए ढेर सारे पैसे की जरूरत होती है। मजदूरों के पास इसी की कमी होती है। इसलिए उन्हें अपनी मेहनत बेचकर गुजारा करना पड़ता है। कर्ज किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। वह खुद कई समस्याओं को जन्म देने वाला है। कर्ज देनेवाले सूदखोर इस लालच में बैठे रहते हैं कि कब कोई ग्राहक पफँसे और उसे निचोड़ लें। कर्ज के चलते लाखों परिवार हर साल बर्बाद होते हैं।
बाजार में हर काम और हर धन्धा मन्दा है। जो पहले से बिजनेस कर रहे हैं और जिनके पास बिजनेस में लगाने के लिए पैसों की कमी नहीं है, वे भी बैठे–बैठे रो रहे हैं। धन्धे में जितनी लागत लगाते हैं, उतना भी निकलना मुश्किल है। उनकी भी हालत दिन पर दिन खराब हो रही है। ऐसे में पैसे की कमी से जूझता मजदूर बिजनेस करके कैसे आगे बढ़ जायेगा? इस व्यवस्था में अमीर बनने की उसकी कोई सम्भावना नहीं है। उसे बदहाल जीना है और मेहनत करते हुए ही दुनिया से विदा हो लेना है। इसलिए मजदूर को मालिक बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और उसे ऐसे लोगों को मूर्ख और खुद को बहुत होशियार समझने की गलती भी नहीं करनी चाहिए, जो मालिक नहीं बनना चाहते।
जब मजदूर मालिक बन ही नहीं सकता तो उसके जैसा दिखने का ढकोसला ही क्यों करे? मालिक की नकल क्यों करे? झूठ–फरेब और दिखावेबाजी से उसे क्या मिल जायेगा? मजदूरों को मालिकों की नकल करने की जरूरत नहीं है। यह बात उसे गाँठ बाँध लेनी चाहिए क्योंकि मालिक बनने की कोशिश में वह कर्ज में डूब जाता है, नशाखोरी, महिलाओं से बुरा व्यवहार और ढकोसलाबाजी करने लगता है। उसे अपनी तुलना भी मालिक से नहीं करनी चाहिए क्योंकि मालिक कोई आदर्श आदमी नहीं होता है। कहावत है कि ‘‘दगा किसी का सगा नहीं है/ न मानो तो कर देखो/ जिसने–जिसने दगा किया है/ जाकर उसका घर देखो।’’ आज दगाबाज, भ्रष्टाचारी और तिकड़मबाज ही अमीर बनते हैं, अगर वे कानून के शिकंजे से बच जायें। मालिक हमेशा मजदूरों का शोषण करता है। उसकी सेलरी डकार जाता है और हर अनैतिक और बुरे काम करता है। ऐसा इनसान बनकर भी मजदूर को क्या मिलेगा? अपने ही किसी मजदूर भाई को लूटकर और उनके परिवार को आँसुओं में डुबोकर उसे क्या मिलेगा? यह सब तो बहुत ही गन्दे काम हैं।
एक मजदूर को मालिक बनने के बजाय एक अच्छा मजदूर बनने की कोशिश करनी चाहिए। वह नशाखोरी से दूर रहे। महिलाओं का सम्मान करे। बच्चों से प्यार करे और उन्हें पढ़ाये–लिखाये। बिना मेहनत किये खाना पाप है। मजदूर अपने मेहनत की कमाई खाता है। इसलिए वह समाज में सबसे अच्छा काम करता है। लेकिन मालिक, सूदखोर, सामान बनाने वाली कम्पनियाँ और सरकार सभी उसे लूटते हैं। मजदूर को इस लूट के खिलाफ आपस में मिलकर संघर्ष करना चाहिए। उसे चाहिए कि वह अपने मजदूर भाइयों की बुरे दिनों में मदद करे। अच्छे और नेक मजदूरों को साथ लेकर संगठन बनाये। उनके साथ–साथ उठे–बैठे। एकजुट होकर अपने हक के लिए संघर्ष करने से ही उसकी जिन्दगी बेहतर हो सकेगी।