मजदूरों में फैली साम्प्रदायिकता पर बातचीत

07 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
मैं एक मजदूर हूँ और ‘मजदूर सहायता समिति’ से जुड़ा हूँ। हमारी समिति मजदूरों की राजनीतिक चेतना बढ़ाने पर बहुत जोर देती है। एक प्लांट में काम करने वाले अपने मजदूर दोस्तों के साथ बातचीत में मैंने खुद इस जरूरत को बहुत शिद्दत से महसूस किया है। अपने उसी अनुभव को आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मैंने प्लांट की मालिक कम्पनी का नाम नहीं दिया है और अपने दोस्तों के नाम भी बदल दिये हैं। देहरादून के सेलाकुई औद्योगिक क्षेत्र में एक कम्पनी ने पिछले दिनों नये नाम से अपना एक प्लांट खोला। इस प्लांट की खास बात यह है कि इसके 700 मजदूरों में एक भी मुसलमान नहीं है। यहाँ मजदूरों की भर्ती के समय उनके हिन्दू होने को ध्यान में रखा जाता है। मुझे यह कम्पनी मालिकों की बेहद खतरनाक और घिनौनी करतूत लगती है। मालिक मजदूरों को हिन्दू–मुसलमान में बाँटकर न केवल संविधान विरोधी काम कर रहे हैं, बल्कि मजदूरों की एकता को तोड़कर फायदा उठा रहे हैं। जल्दी ही मुझे यह एहसास हो गया कि हिन्दू–मुसलमान की गलत सोच से कई मजदूर पीड़ित हैं और इसके चलते वे मालिक–पूँजीपतियों के लिए बहुत फायदेमन्द साबित हो रहे हैं। मैंने सबसे पहले सविता नाम की मजदूर से सवाल–जवाब किया जो इस कम्पनी में ठेकेदार के अधीन काम करती है। पुराने प्लांट से यहाँ लायी गयी है। खूब बातूनी और मेहनती है। हमारी दूसरी ही मुलाकात में मैंने पूछ लिया, “सविता, मैंनें पूरे प्लांट में घूम लिया, लेकिन कहीं भी कोई मुसलमान नहीं दिखा। एसएमटी, डिस्पैच, डेको, स्ट्रिप लाईन, कहीं भी नहीं।” “हाँ, ये तो सही कर दिया, अब। पुराने प्लांट में तो मुसलमानों ने गन्ध मचा रखी थी।” उसने नाक–भौं सिकोड़ते हुए जवाब दिया। मैंने पूछा, “कैसे...?” सविता ने जवाब दिया, “अरे, तुम्हें नहीं पता, उनकी लड़कियों को शर्म तो है नहीं, सुपरवाईजर और इन्चार्ज, दोनों के चक्कर थे और सब खुलेआम था। दोनों उनसे कुछ नहीं बोलते थे।” मैंने कहा, “बड़े हरामी थे, बाल–बच्चों वाले होकर ऐसे करम!” उसने कहा, “हाँ, और उन मुसलमानियों को तुम कुछ न कहोगे, जिन्होंने ये गन्ध मचायी। ऐसे माहौल में कौन काम करेगा?” मैंने सवालिया अन्दाज में कहा, “पर यहाँ तो सब हिन्दू हैं, फिर भी माहौल वैसा ही है। डेको लाईन का इन्चार्ज...और जीएम के कुकर्म सब जानते हैं, पकड़े भी जा चुके हैं। ये सब तो हिन्दू हैं। फिर केवल मुसलमानों को दोष देना ठीक है क्या?” सविता ने नजरे चुराते हुए कहा, “भाई, हमें क्या लेना–देना, हमें तो अपनी नौकरी करनी है।” कोई और मुद्दा न मिला तो उसने सिगूफा छोड़ा, “वैसे मैं तुम्हें बता दूँ, मुसलमान बहुत चालू होते हैं। कुछ होता है तो सब एक हो जाते हैं।” मैंने पूछ ही लिया, “कैसे?” उसने कहा, “अरे, तुम्हें पता नहीं, ईद पर सारे मुसलमान एक हो गये थे। सबने काम बन्द कर दिया था, एमआई वाली सारी लडकियाँ काम छोड़कर खड़ी हो गयी थीं और वहीं नमाज पढ़ने लगी थीं। एक घण्टे तक काम बन्द रहा।” मैंने कहा, “क्यों? उन्हें छुट्टी नहीं मिली थी क्या?” उसने कहा, “हमें भी तो अपने त्योहारों पर छुट्टी नहीं मिलती, उन्हें छुट्टी के लिए इन्चार्ज ने पहले ही मना कर दिया था। फिर भी नमाज के टाइम पर सारी लड़कियाँ लाइन छोड़कर खड़ी हो गयीं, लड़के भी, और वहीं नमाज पढ़ने लगे। इसीलिए नहीं ले रहे हैं इस प्लांट में मुसलमानों को।” मैंने बिन माँगे उसे सुझाव दिया, “तुम भी उनका साथ देती तो अगली बार हिन्दुओं के त्योहार पर जरूर छुट्टी हो जाती।” उसने नाराज होते हुए कहा, “एँ, तुम तो बेकार की बात करते हो।”

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जिस दूसरे मजदूर से मैंने बात की, उसका नाम सुरेश है। वह इस कम्पनी में पिछले 8 सालों से काम कर रहा है। इतने साल से काम करने के बाद भी वह ठेकेदार के अधीन है और बहुत कम सेलरी पाता है। मैंने उससे सीधे सवाल किया, “भाई, इस प्लांट में मुसलमानों को क्यों नहीं रख रहे हैं?” उसने कहा, “थीक ही तो कर रहे हैं...। इनका यहाँ क्या काम? हमारे यहाँ जब से योगी जी आये हैं, कोई फालतू चूँ–चपड़ नहीं करता। अब राम मन्दिर का ही देख लो...। इतने दिनों से बन नहीं रहा था मन्दिर, मोदी जी–योगी जी आये बनवा दिया।” मैंने कहा, “भाई, मन्दिर तो बन गया, अब मुसलमानों को नौकरी देने में क्या दिक्कत है?” सुरेश ने कहा, “इन्हें नौकरी करनी ही नहीं है, पुराने प्लांट में, ईद पर ही देख लो क्या हुआ। सारे काम छोड़ कर खड़े हो गये, वहीं नमाज पढ़ने लगे और काम रुक गया। इन्चार्ज तो बोलेगा ही। इसलिए इस प्लांट में मुसलमानों को नहीं ले रहे हैं।” “अच्छा, ईद तो पिछले साल भी आयी होगी, तब भी ऐसा ही हुआ था क्या?” “नहीं, पहले हाफ डे की छुट्टी कर देते थे।” “तो  अबकी बार क्यों नहीं की? ये सोचने वाली बात है।” “अरे, पहले बात कुछ और थी, अब कुछ और है। पहले तो हमें भी छुट्टी मिल जाती थी।” “इस प्लांट में तो सारे हिन्दू हैं, यहाँ तो हिन्दुओं के सारे त्योहारों पर छुट्टी होती होगी?” “ हाँ, तू भी ले लेना छुट्टी! ऐसे तो ताला लग जाएगा प्लांट में।”

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मैंने तीसरे मजदूर सोहन सिंह भण्डारी से बात की जो इस कम्पनी में पिछले 11 सालों से काम कर रहा है। लेकिन बहुत कम सेलरी पाता है और यहाँ ठेकेदार के अधीन है। वह मेहनती, अनुशासित और ईमानदार है और लम्बे समय से कम्पनी की सेवा कर रहा है। वह हिन्दू राष्ट्र का सपना देखता है और उसके चक्कर में फँस कर अपना बहुत नुकसान कर बैठा है। नये प्लांट में केवल हिन्दू रखे जाएँगे, यह सुनते ही भण्डारी वहाँ जाने को बेचैन हो गया। जीएम और ठेकेदार की खुशामद करके नये प्लांट में ट्रांसफर करवा लिया। एक महीना पूरा होने के बाद इन्हें पता चला कि इनकी 12 घण्टे की सेलरी 18 हजार रुपये से घटाकर 13 हजार रुपये कर दी गयी है। जीएम के पास शिकायत लेकर पहुँचे तो उसने यह बोलकर भगा दिया कि “भण्डारी जी आप करते ही क्या हैं? आपकी सेलरी सबसे ज्यादा है, हम तो आपको निकालने की सोच रहे हैं।” इसके बाद भण्डारी ने जीएम और कम्पनी को खूब कोसा, लेकिन हिन्दू राष्ट्र का सपना आज भी देखते हैं। मैंने उससे पूछा, “ भण्डारी जी, आप यहाँ क्यों आ गये? पुराने प्लांट में मन नहीं लग रहा था क्या?” उसने कहा, “यहाँ सब अपने लोग हैं, भाई। वहाँ तो सब मुसलमान भरे पड़े हैं, यहाँ सब अपने हिन्दू भाई हैं।” मैंने समझाया, “अच्छा...  लेकिन भण्डारी जी मुसलमान भी तो हमारी तरह मजदूर ही हैं।” वह बोला, “तुम्हें नहीं पता, उन्होंने नीचे वाले प्लांट का माहौल कितना खराब कर रखा है। ईद पर नमाज के लिए छुट्टी नहीं मिली तो वहीं प्लांट में नमाज पढ़ने लग गये। यहाँ हमें खुद छुट्टी नहीं मिल रही है, लेकिन हमने तो कुछ नहीं किया। मैंने कहा, “हमेशा ईद पर उन्हें छुट्टी मिलती थी। अबकी बार कम्पनी ने क्यों नहीं दी? और एका करना गलत बात थोड़ी है।” भण्डारी ने कहा, “भाई, तुम समझ नहीं रहे हो। वे सारे काम कर लेते हैं। सारे काम–धन्धों पर कब्जा कर लिया है, नाई, फैबरीकेशन का काम, कपड़े का काम, सब्जी का काम, यहीं सेलाकुई में सारे मोमडन भरे पड़े हैं।” मैंने कहा, “ऐसा तो नहीं है। ये सभी काम हिन्दू भाई भी बड़ी संख्या में करते हैं। लगता है कि आपको हिन्दुत्ववादियों ने गुमराह किया है। क्या कभी आपको किसी मुसलमान ने धोखा दिया है या आपको कभी नुकसान पहुँचाया है?” उसने कहा, “ नहीं, किसी ने नुकसान नहीं पहुँचाया है, लेकिन भाई सवाल तो देश का है। अपने जीएम को ही देख लो, बब्बर शेर है, कर दिया सारे मुसलमानों को बाहर, ऐसे लोग ही देश बचाएँगे।” मैंने कहा, “लेकिन भण्डारी जी, यह बब्बर शेर तो आपकी एक तिहाई सेलरी खा गया। अब तो आपकी जिन्दगी बढ़िया कट रही होगी, आपकी सारी समस्याएँ हल हो गयी होंगी?” उसने कहा, “छोड़ो यार, देश में क्या चल रहा है, तुम्हें कुछ नहीं पता। भाई... हम खत्म हो जायेंगे लेकिन समस्याएँ कभी खत्म नहीं होंगी।”

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आप इन तीन मजदूरों की हिन्दुत्ववादी और साम्प्रदायिक समझ को देख सकते हैं। इनके अलावा मैंने कई दूसरे मजदूर साथियों के साथ बात की उनकी समझ भी लगभग साम्प्रदायिक ही है। ये सभी कई साल से इस कम्पनी में काम कर रहे हैं। नये हिन्दू प्लांट, हम इसे यही कहते हैं, इसमें सभी की सेलरी घटा दी गयी। मेरे ज्यादातर दोस्त वहाँ से काम छोड़ चुके हैं। उनके लिए पेट की जरूरत हिन्दुत्ववादी सोच पर भारी पड़ी है। लेकिन अभी हिन्दुत्ववाद उनके दिमागों से पूरी तरह साफ नहीं हुआ है और मजदूरों की एकता को तोड़ रहा है। आज मजदूर वर्ग में हिन्दुत्ववादी और साम्प्रदायिक सोच ने गहरी पैठ बना ली है। ऐसी जहरीली सोच मजदूरों की दुश्मन है, उनके हितों के खिलाफ है, उनकी एकता को तोड़ने वाली है। लेकिन सही राजनीतिक चेतना और वर्गीय विचारधारा के अभाव में वे हिन्दुत्ववादियों का आसान शिकार बन रहे हैं और अपना नुकसान कर रहे हैं। आज जरूरत इस बात की है कि उन्हें इस जहरीली सोच से मुक्त किया जाये। इसके लिए मैं मजदूरों के बीच बहस–मुबाहसा करके सही विचार स्थापित करने की कोशिश करता हूँ। मैं उनके बीच ‘मजदूर एकता पुस्तिका’ के सभी अंक बाँटता हूँ। साथ ही कई मजदूरों के बीच इसे पढ़कर सुनाता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि इन कामों से वे जल्दी ही पूँजीपतियों की पक्षधर हिन्दुत्ववादी और साम्प्रदायिक सोच को छोड़कर मजदूर वर्ग की सही वर्गीय विचारधारा को स्वीकार कर लेंगे। वे समझ जायेंगे कि मजदूरों की कोई जाति या धर्म नहीं होता। सभी जाति या धर्म के मजदूर भाई–भाई हैं। इन बातों को समझने के बाद उनकी एकता मजबूत होगी और वे अपने संघर्षों में जीत हासिल करेंगे। –– कुलदीप
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