मजदूर–समाचार (अगस्त 2023)

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

काम के दौरान मजदूर हो रहे हैं दुर्घटनाओं का शिकार

एक सरकारी संस्था है–– ‘श्रम और रोजगार मंत्रालय के महानिदेशालय, फैक्ट्री सलाह सेवा और श्रम संस्थान’। इसने एक आरटीआई के जवाब में कम्पनियों के अन्दर सुरक्षा मानकों की अनदेखी के चलते होने वाली दुर्घटनाओं का विवरण दिया है। यह विवरण चौकाने वाला है। इसके अनुसार भारत में पंजीकृत फैक्टारियों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी के कारण हर दिन लगभग तीन मजदूरों की मौत हो जाती है और 11 गम्भीर रूप से घायल हो जाते हैं। 2017 से 2020 तक लगभग 1109 से ज्यादा मजदूरों की काम के दौरान मौत हो गयी और 4000 से अधिक मजदूर गम्भीर रूप से घायल हुए हैं। इनमें सबसे ज्यादा मौतें गुजरात राज्य में दर्ज हुई हैं। 2019 में गुजरात में 79 मजदूरों की मौत हुई और 192 मजदूर गम्भीर रूप से घायल हुए।

ये आँकड़े तो केवल पंजीकृत संस्थानों से लिये गये हैं। लेकिन हर रोज कितने ही मजदूर गैर–पंजीकृत संस्थाओं में दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं उनका तो कोई लेखा–जोखा भी नहीं है। अधिकतर मौतें फैक्ट्रियों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी के चलते होती हैं। इसके बाद भी भारत सरकार ने 2020 में ‘औद्योगिक सुरक्षा और स्वास्थ्य कानून’ के तहत अति–संवेदनशील उद्योगों में सुरक्षा की गारंटी को खत्म कर दिया है जिनमें 250 से कम मजदूर काम करते हैं। साथ ही सामान्य उद्योगों में तो यह संख्या 500 कर दी गयी है। ऐसा करके सरकार ने 90 फीसदी मजदूरों को सीधे–सीधे कार्यक्षेत्र में दी जाने वाली जरूरी सुरक्षा के दायरे से बाहर कर दिया है। जाहिर है कि ऐसे काले कानूनों से मालिकों का सुरक्षा मानकों पर होने वाला खर्चा बचेगा। वहीं दूसरी तरफ मजदूरों के साथ कार्यस्थल पर होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ेगी और वह इसके खिलाफ कोई कानूनी लड़ाई भी नहीं लड़ पाएँगे।

   (साभार–– वर्कर्स यूनिटी, 22 जनवरी 2023)

सफाईकर्मियों की मौत पर सरकार की संवेदनहीनता

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक हर सप्ताह एक या एक से अधिक सफाईकर्मी की सीवर की सफाई करने के दौरान जहरीली गैसों की चपेट में आने से मौत हो जाती है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने 2013 से सीवर की हाथ से सफाई करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया हुआ है। लेकिन सरकार की नाक के नीचे हर रोज खुलेआम इस काम को अंजाम दिया जा रहा है। ऐसे सभी सफाईकर्मी ठेके पर काम करते हैं। काम करते हुए इनका किसी भी तरह का पहचानपत्र नहीं बनाया जाता। सफाई के दौरान कितने ही कर्मचारियों की मौत के आँकड़े दर्ज नहीं होते हैं। ठेकेदार उन्हें किसी भी तरह के सुरक्षा के जरूरी उपकरण तक मुहैया नहीं कराते। सीवर में सुरक्षा उपकरणों के बिना जाने पर जहरीली गैस से उनका दम घुट जाता है जिससे उनकी मौत हो जाती है।

इसके अलावा रोज ही सफाईकर्मी बीमारी की चपेट में आते हैं जिनके इलाज का खर्च खुद इन्हें ही उठाना पड़ता है। इन्हीं समस्याओं को लेकर लम्बे समय से सफाईकर्मी आन्दोलन कर रहे हैं। इनका कहना है कि सरकार मौतों के आँकड़ों को कम करके बता रही है। सरकार 5 साल में कुल 308 मौतें बता रही है जबकि 2000 से अधिक मौतें हुई हैं। सरकार सफाईकर्मियों के ऊपर खर्च होनेवाली राशि भी कम करती जा रही है। 2021 में मैला ढोने वाले मजदूरों के बजट में 73 प्रतिशत और 2022 में 30 प्रतिशत की कटौती की गयी। साथ ही मरने वाले सफाईकर्मियों के परिवार को मिलने वाला मुआवजा भी कम कर दिया गया है। 

(साभार–– मेहनतकश, 21 जून 2023)

जंजीरों से बाँधकर जबरन करवाया गया काम

बँधुआ मजदूरी हमें बीते जमाने की बात नजर आती है। लेकिन महाराष्ट्र के धारशिव जिले की घटना ने एक बार फिर मजदूरों की बेहद बुरी स्थिति को हमारे सामने ला खड़ा किया है। यहाँ एक खेत में 11 मजदूरों को जंजीरों से बाँधकर उनसे कुआँ खुदवाया गया और खेत में दिन–रात काम करवाया गया। सभी मजदूर यहाँ पिछले 4 महीने से बंधक बनाकर रखे गये थे। यह घटना बेहद विचलित कर देने वाली है। पूरे दिन हाड़तोड़ मेहनत करवाने के बाद इन्हें रूखा–सूखा खाने के लिए दिया जाता था। रात में इन्हें नशे के इंजेक्शन लगा दिये जाते थे जिससे ये भाग न सकें। एक रात जब इनमें से एक मजदूर वहाँ से भागने में सफल हुआ तब यह जानकारी पुलिस तक पहुँची। इन सभी मजदूरों को एजेंट ने झूठ बोलकर ठेकेदार को बेच दिया था। पूरे महाराष्ट्र में ऐसे अनेक एजेंट और ठेकेदार काम कर रहे हैं जो मजदूरों को बंधुआ बनाकर काम करवा रहे हैं। इतने बड़े स्तर पर यह काम चल रहा है लेकिन सरकार को इनकी कोई खोज–खबर तक नहीं है। मजदूरों के प्रति सरकार के इस गैर–संवेदनशील रवैये को अब छुपा पाना भी मुश्किल है।

मजदूरों–मेहनतकशों की नगीना कालोनी को ढहा दिया गया

नगीना कालोनी नैनीताल जिले में लालकुआँ उत्तराखंड रेलवे स्टेशन के करीब स्थित थी। सरकार, पुलिस–प्रशासन और न्यायालय ने एकजुट होकर नगीना कालोनी को मई महीने में बुलडोजर से ढहा दिया। मजदूरों–मेहनतकशों की इस कालोनी पर आजादी के ‘अमृत काल’ में तथाकथित ‘अवैध अतिक्रमण’ के नाम पर यह कार्रवाई की गई।

नगीना कालोनी में राजमिस्त्री, बढ़ई, मजदूरी, फड़–ठेला लगाने वाले, सेंचुरी पेपर मिल में ठेका श्रमिक, ऑटो चालक, गौला नदी में मजदूरी इत्यादि काम करने वाले लोग रहते थे। कुछ निम्न मध्यम वर्गीय लोग भी रहते थे। ये लोग यहाँ पर पिछले 40–50 सालों से रह रहे थे। कालोनी को तबाह करते समय बेरहम प्रशासन और सरकार ने यह भी नहीं सोचा कि उजाड़े गये मजदूर परिवार कहाँ जायेंगे और क्या करेंगे?

(साभार–– नागरिक, 16–31जुलाई 2023)

तमिलनाडु सरकार को मजदूर विरोधी कानून वापस लेना पड़ा

21 अप्रैल 2023 को तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने ‘फैक्ट्री संशोधन विधेयक 2023’ लागू किया था। इस विधेयक के अनुसार हफ्ते में चार दिन का कार्यदिवस निर्धारित किया गया और तीन दिन की सवैतनिक छुट्टी दी गयी। कर्मचारियों को एक हफ्ते में तीन दिन की छुट्टी का लालच दिया गया। लेकिन सच्चाई यह है कि इस विधेयक के अनुसार फैक्ट्री मालिक मजदूरों को 14–14 घंटे काम करवाने के लिए भी विवश कर सकता है। मजदूरों के श्रम काल के निर्धारित मानक इस विधेयक में काम नहीं करेंगे। इसका मतलब साफ है मजदूरों का बेहिसाब शोषण और उत्पीड़न करने के लिए मालिक आजाद होंगे और मजदूर इसके खिलाफ कानूनन कोई आवाज भी नहीं उठा पाएँगे। 

इस मजदूर विरोधी कानून और उसके दुष्परिणामों को मजदूर जल्द ही समझ गये। इस विधेयक के पारित होते ही जगह–जगह पर मजदूरों ने संगठित विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिये थे। मजदूरों का बढ़ता आक्रोश देख सरकार को मजबूरन 72 घंटों में ही यह कानून वापस लेना पड़ा। यह मजदूरों के संगठित प्रयास की बड़ी जीत साबित हुई। आज देश में मजदूर विरोधी कानूनों को बड़ी तेजी से लागू किया जा रहा है। इसके खिलाफ मजदूरों का व्यापक संगठित विरोध ही कारगर है। 

(साभार–– वर्कर्स यूनिटी, 25 अप्रैल 2023)

सालभर से संघर्षरत हिताची कम्पनी के ठेका मजदूर फिर हड़ताल पर

 मानेसर में 30 जून को प्रोटेरिअल (हिताची) कम्पनी के ठेका मजदूर एक बार फिर हड़ताल पर बैठ गये। लगभग एक साल से यह मजदूर काम की सुरक्षा, बेहतर वेतन और स्थायी रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन अभी तक प्रबंधन की तरफ से इनकी किसी भी वाजिब माँग को माना नहीं गया है। आये दिन कम्पनी में मजदूरों के साथ जोर–जबरदस्ती कर अधिक काम लिया जाता है। 29 जून 2023 को प्रबंधन ने अचानक पाँच मजदूरों की शिफ्ट बदल दी। इस जबरदस्ती शिफ्ट बदलने से मजदूरों को ओवरटाइम करने के लिए बाध्य किया जा रहा था। लेकिन जब मजदूरों ने ऐसा नहीं किया तो अगले दिन उन मजदूरों को काम करने से रोक दिया गया। इसके विरोध में अन्य मजदूरों ने भी काम रोक दिया और हड़ताल पर बैठ गये।

हड़ताल को तोड़ने के लिए कम्पनी प्रबंधन और ठेकेदार ने धरना स्थल की बिजली काट दी। पंखा न चलने के कारण कमरे में भीषण गर्मी और उमस हो गयी। लेकिन मजदूर अपनी हड़ताल पर डटे रहे। लेकिन भीषण गर्मी के कारण कितने ही मजदूर बेहोश होकर गिर गये। इन्हें सेक्टर–3 के ‘ईएसआई अस्पताल’ में भर्ती कराया गया। इस घटना के बाद मजदूरों का गुस्सा कम्पनी प्रबंधन पर और बढ़ गया है। ठेका–मजदूरों से जबरदस्ती ओवरटाइम कराने, उनकी अचानक शिफ्ट बदलने और काम से निकालने की गुंडागर्दी हर कम्पनी में तेजी से बढ़ रही है। अगर मजदूर इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जा रहा है।  मजदूर केवल अपनी संगठित ताकत के दम पर ही अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब हो पा रहे हैं।

(साभार–– मेहनतकश, 1 जुलाई 2023)

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