मजदूर समाचार (जुलाई 2021)
कोरोना महामारी ने मजदूरों के सामने दोहरा संकट पैदा कर दिया है। एक तरफ तो कोरोना वायरस से जान का खतरा, वहीं दूसरी ओर रोजी–रोटी का संकट। पिछले साल कोरोना महामारी के दौरान देश में लगे लॉकडाउन ने मजदूरों की कमर तोड़ दी थी। उनकी जमा–पूँजी पहले ही खत्म हो गयी थी। इसके चलते वे अब बहुत कम मजदूरी में 12–14 घण्टे तक काम करने को मजबूर हैं। इनकी इसी मजबूरी का फायदा उठाकर मालिक मालामाल हो रहे हैं। देश भर से कई ऐसे समाचार मिल रहे हैं जिससे साफ पता चलता है कि मजदूरों का बेरहमी से शोषण–उत्पीड़न हो रहा है।
ईंट भट्ठे पर मजदूर बंधक, कराया गया जबरन काम
20 मई 2021 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में एक र्इंट भट्ठे पर मजदूरों और छोटे–छोटे बच्चों से जबरन दिन–रात काम कराये जाने की खबर मिली। पूरे दिन में उन्हें खाने के लिए एक–दो रोटी दी जाती थी। इसी खराब हालत में मजदूर पिछले तीन–चार महीनों से बंधक थे। मजदूरी माँगने और वहाँ से जाने की बात करने पर मालिक के गुण्डें उन्हें धमकी देते और पीटते थे। कुछ मजदूर वहाँ से भागने में सफल हुए। अपने बाकी साथियों को छुड़ाने के लिए वे पुलिस के पास गये। लेकिन पुलिसवालों ने उनकी एक न सुनी और उन्हें डरा–धमका कर भगा दिया। जब इस घटना की जानकारी एक सामाजिक संगठन को लगी तब जाकर पुलिस–प्रशासन पर दबाव बना। आखिरकार लम्बे संघर्ष के बाद मजदूरों को मालिक के चंगुल से छुड़ाया गया।
यह कोई अपवाद नहीं है बल्कि पिछले कुछ सालों से कई ऐसी घटनाएँ सामने आ रही हैं। ऐसे जघन्य अपराध के प्रति सांसदों, विधायकों और नेताओं ने मुँह फेर लिया है, इतना ही नहीं वे मालिकों का पूरा साथ दे रहे हैं।
अमरीका में मन्दिर निर्माण के दौरान भारतीय मजदूरों का शोषण
13 मई 2021 को वर्कर्स यूनिटी की वेबसाइट पर खबर छपी कि पिछले कई सालों से अमरीका के न्यू जर्सी शहर में जो मन्दिर बनाया जा रहा है, उसमें काम करने वाले मजदूरों का भयावह शोषण हो रहा है। उस मन्दिर का निर्माण भारत की एक धार्मिक संस्था करवा रही है। इसके लिए भारत से मजदूर ले जाये गये। उन्हें बेहतर मजदूरी और जरूरी सुविधाएँ देने का वादा किया गया, लेकिन वहाँ पहुँचते ही मजदूरों से उनके पासपोर्ट छीन लिये गये। मजदूरों को यह समझने में देर नहीं लगी कि उनके साथ धोखा हुआ है। उनसे रोज 12 से 13 घण्टे तक काम कराया जाता है। न्यू जर्सी में एक घण्टे की न्यूनतम मजदूरी 876 रुपये है, जबकि उन्हें महज 87 रुपये दिये गये। वहाँ के नियम से एक हफ्ते में सिर्फ 40 घण्टे तक काम कराया जा सकता है। लेकिन सभी कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए भारतीय मजदूरों से एक सप्ताह में 90 घण्टों तक काम कराया गया। मन्दिर प्रशासन एक दो दिन नहीं, पिछले कई सालों से ऐसा कर रहा है।
मजदूरों को वहाँ लोहे के तारों से घिरी जगह में रखा जाता है। उनके रहने के लिए लोहे के कण्टेनर बने हुए हैं, जिनमें बहुत गर्मी रहती है। साथ ही उन पर कैमरा और हथियारबन्द गार्ड हमेशा तैनात रहते हैं। उन्हें खाने के लिए सिर्फ कुछ आलू और थोड़ी सी दाल दी जाती है। इस अत्याचार और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने पर उन्हें तरह–तरह से प्रताड़ित कर जेल में डालने की धमकी दी जाती है।
मन्दिर के निर्माण के लिए जनता से खूब चन्दा इकठ्ठा किया गया। इसे एक नेक काम बताकर मजदूरों को आसानी से फँसा लिया गया। काम के बदले पूरी मजदूरी भी नहीं दी गयी। धर्म के नाम पर अलग–अलग करों में सरकारी लूट के मजे भी लिये गये। मौत के बाद स्वर्ग के ख्वाब दिखा कर मजदूरों की जिन्दगी को नरक से भी बदतर बना दिया गया। इस तरह धार्मिक संस्था से जुड़े लोग धर्म के धंधे से इसी जन्म में स्वर्ग का आनन्द ले रहे हैं और मजदूरों को स्वर्ग का सपना दिखाकर उनका अमानवीय शोषण–उत्पीड़न कर रहे हैं।
ताउते तूफान में फँसे 70 मजदूरों की मौत का जिम्मेदार कौन?
पिछले महीने, 24 मई 2021 के आस–पास अरब सागर में ताउते नाम का भयंकर तूफान आया था। इस विनाशकारी तूफान ने अपने सामने आने वाली हर चीज को तबाह कर दिया। इसी तूफान में फँसकर 70 मजदूरों की जान चली गयी और 100 से ज्यादा लापता हो गये। ये मजदूर मुम्बई के समुद्र तट से 65 किलोमीटर दूर अरब सागर में तेल निकालने के काम में लगे हुए थे। यह सभी मजदूर एक ठेका कम्पनी में काम करते थे जो सरकारी कम्पनी ‘तेल और प्राकृतिक गैस निगम’ यओएनजीसीद्ध के आधीन थी। यह तूफान अचानक से नहीं आया बल्कि मौसम विभाग एक हफ्ते पहले से इसकी सूचना ओएनजीसी को दे रहा था। अनेक चेतावनियों के बाद भी अधिकारी मजदूरों से काम करवाते रहे। उस समय वहाँ पर 800 से ज्यादा मजदूर काम कर रहे थे। तूफान आने के 24 घण्टे पहले आस–पास की सभी नाव–जहाज जा चुकी थी। इसके बावजूद मजदूरों को जबरदस्ती वहीं रोककर काम करने को मजबूर किया गया। बिना किसी इन्तजाम के मजदूर तूफान का सामना नहीं कर सके और बड़ी संख्या में उनकी जान गयी। आखिर इतनी मौतों का जिम्मेदार कौन है? क्या पहले से मिली सूचना पर ध्यान देकर मजदूरों को बचाया नहीं जा सकता था? लेकिन अपने मुनाफे के लिए सरकार और निजी कम्पनियों ने मजदूरों को मौत के मुँह में धकेल दिया।
कम्पनी में गैस सिलेण्डर फटने से कई मजदूर हुए घायल
10 जून को पलवल स्थित साकेत फैब प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी में अचानक दो गैस सिलेण्डर फट गये। यह घटना शाम 5 बजे के आसपास हुई। आसपास काम कर रहे मजदूर घायल हो गये जिनमंे 4–5 की हालत बेहद गम्भीर बतायी जा रही है। वहाँ काम करने वाले मजदूरों ने बताया कि धमाका इतना तेज था कि पास की एक दीवार टूट गयी। साथ ही सिलेण्डर छत को तोड़ते हुए बाहर जाकर गिरे। मजदूरों ने कम्पनी पर सुरक्षा मानकों न मानने का आरोप लगाया। कम्पनी ने पिछले कुछ महीनों से मजदूरों का वेतन पूरा नहीं दिया है। सारे मानकों की अनदेखी कर अक्सर कम्पनियाँ कुछ पैसों की बचत तो कर लेती हैं, लेकिन इसका खामियाजा मजदूरों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है। पिछले साल ही दिल्ली में ऐसी ही दुर्घटना में 50 से ज्यादा मजदूरों को गम्भीर चोटे आयी थीं। सरकार भी दोषी मालिकों पर कार्रवाई न करके ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देती है।
3 माह रुके वेतन के खिलाफ ठेका मजदूरों ने किया आन्दोलन का आह्वान
11 जून की खबर के अनुसार हिमाचल प्रदेश के रामपुर नगर परिषद के अन्दर काम कर रहे ठेका मजदूरों को पिछले 3 महीने से वेतन नहीं मिल रहा है। रोज कुआ खोद कर पानी पीने वाले मजदूरों के लिए तीन महीने तक बिना वेतन के घर चालना बेहद मुश्किल है। ठेकेदार और श्रम अधिकारी से बार–बार शिकायत करने के बाद भी उनकी एक बात नहीं सुनी गयी। बल्कि अपनी बात रखने पर ठेकेदार उन्हें नौकरी से निकालने तक की धमकी देता रहा।
रामपुर नगर परिषद और ठेकेदार खुलेआम सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। एक तरफ तो 24 मई, 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि कोई भी प्रवासी मजदूर भूखा नहीं रहना चाहिए। यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह प्रवासी मजदूरों के लिए खाने और सूखे राशन का इन्तजाम करे। लेकिन दूसरी तरफ रामपुर नगर परिषद और ठेकेदार मिलकर प्रवासी मजदूरों का खुला शोषण कर रहे है। क्या मजदूरों के लिए कानून केवल कागजी चीज बनकर रह गये हैं? मजदूरों के लिए घोषणाएँ तो बड़ी–बड़ी होती है लेकिन क्या सच में उनका भला होता है। ऐसा ही इन ठेका मजदूरों के साथ हुआ। आखिर में सब रास्ते बन्द होने पर मजदूरों ने एकजुट होकर धरना देने का फैसला लिया है। धरने में मजदूरों ने कहा कि अगर 3 महीने का वेतन 15 जून तक मजदूरों को नहीं मिला तो आने वाले समय में आन्दोलन तेजी से आगे बढ़ेगा।
हरियाणा सरकार ने पिछले एक साल में 6,500 से ज्यादा सरकारी कर्मचारियों की छँटनी की
17 मई, 2021 की एक खबर के अनुसार पिछले एक साल में हरियाणा सरकार ने 6,500 से ज्यादा सरकारी कर्मचारियों को बिना किसी सूचना के नौकरी से निकाल दिया। यह छँटनी करीब 20 विभागों में की गयी जिसमें टूरिज्म, पशुपालन, वन विभाग, चिकित्सा विभाग आदि शामिल हैं। यह सिलसिला पिछले साल मई से शुरू हुआ जब खेल कोटे में भर्ती हुए 1518 ग्रुप डी के कर्मचारियों को अचानक नौकरी से निकाल दिया गया। धीरे–धीरे यह काम दूसरे विभागों में भी होने लगा।
एक तरफ तो मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर कोरोना महामारी के समय मजदूरों के लिए बड़ी–बड़ी घोषणाएँ कर रहे थे। वह निजी कारखाना मालिकों से यह अपील कर रहे थे कि किसी भी मजदूर को नौकरी से न निकाला जाये। वहीं दूसरी तरफ उन्होंने चुपचाप अपने ही कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। निकाले गये कर्मचारियों की कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के 65 सफाई कर्मचारी पिछले एक साल से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं। लेकिन कोई अधिकारी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है। कोरोना महामारी में अपनी जान की बाजी लगाने वाले नर्सिंग कर्मचारियों तक को भी सरकार ने नहीं बक्शा। लगभग 400 अनुभवी नर्स और अन्य कर्मचारियों को कोरोना महामारी के समय में ही निकाल दिया गया। सरकार का यह कदम मजदूर विरोधी है। जब बेरोजगारी पहले से ही चरम पर है, छोटे–छोटे उद्योग बर्बाद होने के कगार पर हैं ऐसे में निकाले गये मजदूरों की गुजर–बसर कैसे होगी। लेकिन सरकार इन सब बातों से आँख बन्द करके बैठी है।
लोहे की एंगल के नीचे दबकर मजदूर की दर्दनाक मौत
12 जून को बिनौली रोड स्थित चौधरी टिम्बर ट्रेडर्स पर लोहे की एंगल रखते समय स्लेब खिसक जाने से एक मजूदर की दबकर दर्दनाक मौत हो गयी। वह मुजफ्फरनगर का रहने वाला था जिसकी उम्र लगभग 45 वर्ष थी। वह मुजफ्फरनगर से सरधना माल ढोने वाले ट्रक पर काम करता था। कितने ही मजदूरों ने ऐसी दुर्घटनाओं में अपने हाथ–पाँव तक गवाँ दिये हैं। लेकिन ऐसी घटनाओं से मालिक कोई सबक नहीं लेते। बिना किसी सुरक्षा के मजदूरों की जिन्दगी खतरे में डाल दी जाती है।