मजदूर समाचार (फरवरी 2022)

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

मौत के मुँह में समाते सीवर सफाई कर्मचारी

सीवर साफ करते हुए अक्सर किसी न किसी सफाई कर्मचारी की मौत की खबर आज आम हो चली हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि इतनी मौतों के बाद भी सरकार ने कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया? यह काम ठेकेदार के अधीन होता है, इसलिए इन पर भारतीय संविधान के बुनियादी मानदण्ड भी लागू नहीं होते। एक तरफ तो कोर्ट का यह आदेश है कि इस काम को ठेकेदार नहीं करा सकता, दूसरी तरफ हर शहर में बेरोक–टोक यह काम जारी है। ठेकेदार मजदूरों के निर्मम शोषण से लाखों रुपये कमाते हैं। बीमार पड़ने पर मजदूरों के पैसे काट लिये जाते हैं। हफ्ते में एक भी छुट्टी नहीं दी जाती। इसके बावजूद तय मजदूरी का आधा ठेकेदार हड़प जाता है और किसी के विरोध करने पर उसके साथ मारपीट तक करता है।

सीवर साफ करते हुए ठेकेदार की तरफ से इन्हें किसी भी तरह के सुरक्षा उपकरण भी उपलब्ध नहीं कराये जाते। इस काम के दौरान अक्सर मजदूर सीवर में मौजूद जहरीली गैसों के सीधे सम्पर्क में आते हैं। जिससे कई तरह की खतरनाक बीमारियाँ हो जाती हैं और मौत तक हो जाती है। ठेकेदार की तरफ से इन्हें किसी तरह का पहचान पत्र भी नहीं दिया जाता। इससे काम के दौरान गम्भीर बीमार या मौत हो जाने के बाद उनके परिवार को कोई मुआवजा तक नहीं मिल पाता। उनके परिवार वालों के पास ऐसा कोई दास्तावेज नहीं होता जिससे वे सफाई कर्मचारी भी प्रमाणित हो सकें। सरकार इसी बात को आधार मानकर अकसर यह कहती है कि काम के दौरान अब किसी सफाई कर्मचारी की मौत नहीं होती। ठेकेदार की लापरवाही और सरकार की अनदेखी की वजह से हर महीने कितने ही सफाई कर्मचारी अपनी जान गवाँ रहे हैं।

(साभार– वर्कर्स यूनिटी, 19 नवम्बर 2021 की खबर)

गुजरात की एक फैक्ट्री के पास जहरीली गैस के रिसाव से 6 मजदूरों की मौत

हाल ही में गुजरात की डार्इंग फैक्ट्री के पास जहरीली गैस के रिसाव से 6 मजदूरों की मौत हो गयी। साथ ही अनेक मजदूर और स्थानीय लोग अस्पताल में भर्ती हैं। यह कोई दुर्घटना नहीं थी बल्कि मालिक की जान–बूझकर की गयी लापरवाही का नतीजा था। दरअसल डार्इंग फैक्ट्री में तरह–तरह के रसायनों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें से कुछ हानिकारक भी होते हैं। इन रसायनों का इस्तेमाल होने के बाद उन्हें सुरक्षित जगह पर निष्कासित किया जाना जरूरी होता है, जिससे किसी को कोई नुकसान न हो। लेकिन फैक्ट्री मालिक ने खर्चा बचाने के लिए रसायनों को एक टैम्पो में भरवाकर पास में ही बहने वाली एक छोटी नदी में गैर–कानूनी तरीके से निष्कासित करवा दिया। जैसे ही ये रसायन पानी के सम्पर्क में आये इनसे जहरीली गैस बन गयी थी। यह गैस फैक्ट्री और पास के इलाके में तेजी से फैल गयी। इससे पहले की फैक्ट्री में काम कर रहे मजदूर कुछ समझ पाते वह गैस की चपेट में आकर बेहोश हो गये। इस घटना के सामने आने के बाद भी मालिक पर किसी भी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की गयी। मुख्यमंत्री ने भी इस घटना पर कोई ठोस कदम उठाने की जगह केवल मरने वाले मजदूरों के प्रति संवेदना व्यक्त करके अपना पल्ला झाड़ लिया। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि मालिकों के मुनाफे के सामने मजदूरों की जिन्दगी की कोई कीमत नहीं है।  

(साभार–– द वायर, 6 जनवरी 2022 की खबर)

मजदूरी माँगने पर मालिक ने मजदूर का हाथ काटा

मजदूरों को अक्सर अपना हक माँगने पर डराया, धमकाया और अपमानित किया जाता है। ठेके पर काम करने वाले या दिहाड़ी मजदूर ऐसी घटनाओं से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। महीनों काम करने के बाद भी उन्हें अपनी पूरी मजदूरी समय पर नहीं मिलती। कभी–कभी तो ठेकेदार पैसे माँगने पर उनके साथ मारपीट तक कर देता है। एक ऐसी ही घटना मध्य प्रदेश के रावी जिले में घटी है। 37 वर्षीय अशोक कोरोना महामारी के कारण गाँव के ही एक आदमी के यहाँ काम कर रहे थे। काम पूरा होने के बाद भी मजदूरी का एक पैसा तक अशोक को नहीं मिला था। कोई दूसरा रोजगार न होने के कारण उनके घर की हालत रोज–ब–रोज बिगड़ती जा रही थी। घर में खाने–पीने का गुजारा करना भी मुश्किल हो रहा था। ऐसी हालत में सिर्फ अपनी मजदूरी का पैसा ही आखिरी सहारा था। लेकिन हर बार पैसे माँगने पर मालिक कोई न कोई बहाना बना देता।

एक दिन मालिक ने फोन करके अशोक को अपने यहाँ बुलाया। अशोक को लगा कि अब उसके पैसे मिल जाएँगे। वह अपने एक दूसरे मजदूर साथी के साथ मालिक के घर गया। वहाँ जाने के बाद मालिक ने उसे बैठने के लिए कहा और खुद अन्दर चला गया। अशोक को लग रहा था कि मालिक अन्दर पैसे लेने गया है। लेकिन मालिक अन्दर से तलवार उठा कर लाया और मजदूर पर तलवार से जानलेवा हमला कर दिया। अपनी जान बचाने के लिए अशोक ने अपना हाथ आगे किया तो तलवार के वार से उसका हाथ कट गया। इसके बाद भी मालिक ने उसे मारना चाहा तो वह और उसका साथी किसी तरह अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग निकले। उसके हाथ से बहुत खून बह गया था इसलिए वह रास्ते में ही बेहोश हो गया। उसके साथी ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया। इस खबर के फैलने पर पुलिस पर थोड़ा दबाव बना तो रिपोर्ट दर्ज हुई। आज मजदूरों के किसी मजबूत संगठन के न होने का फायदा मालिक उठा रहे हैं।

दिहाड़ी मजदूरों की बढ़ती आत्महत्याओं के बीच पूँजी के नये पहाड़

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के अनुसार साल 2020 में 1 लाख 53 हजार लोगों ने आत्महत्या की जिसमें सबसे ज्यादा दिहाड़ी मजदूर थे। 2019 के मुकाबले यह संख्या 10 फीसदी से भी अधिक है। सबसे ज्यादा आत्महत्या तमिलनाडु, उसके बाद मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और गुजरात के मजदूरों ने की है। कोरोना महामारी में लॉकडाउन लगने के कारण सबसे बड़ी मार दिहाड़ी मजदूरों पर ही पड़ी। रोज कुआ खोदकर पानी पीने वाले मजदूरों के लिए रोजी–रोटी का इन्तजाम करना बेहद मुश्किल हो गया था। इनकी समस्याओं की ओर से सरकार ने भी मुँह मोड़ लिया था। ऐसे में कोई रास्ता नजर न आने पर इतने बड़े पैमाने पर दिहाड़ी मजदूरों को आत्महत्या करने पर विवश होना पड़ा। लेकिन दूसरी तरफ इसी देश के मुट्ठीभर लोगों की सम्पत्ति दिन–दूनी रात–चौगुनी बढ़ रही है। हुरून रिपोर्ट के अनुसार 2020 में अडानी हर घण्टे 42 करोड़ रुपये कमाकर भारत का दूसरा सबसे अमीर आदमी बन गया है। इसकी कुल सम्पत्ति 7 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा हो गयी है। कोविड की वैक्सीन बनाने वाले सीरम इंस्टीटूट का मालिक पूनावाला 190 करोड़ रुपये रोज कमाकर भारत का छठे नम्बर का अमीर बन बैठा है। पूरे भारत मे 1007 व्यक्तियों की सम्पत्ति 1000 करोड़ रुपये से ऊपर है।

ऐसे समय में जब भूख और बीमारी से तड़प–तड़प कर लोग मर रहे हैं, बड़ी संख्या में रोजगार खत्म हो रहे हैं और देश में कंगाली–बदहाली बढ़ती जा रही है तब कुछ मुट्ठीभर पूँजीपतियों की दौलत के पहाड़ कैसे खड़े हो गये? यह कोई करिश्मा नहीं है बल्कि इन धन्नासेठों ने कोरोना महामारी का फायदा उठाकर मजदूरों के निर्मम शोषण के दम पर इस पूँजी को खड़ा किया है। इस काम में केन्द्र और राज्य सरकारों ने इनका पूरा सहयोग किया। काम के घण्टों की सीमा को खत्म कर दिया गया, साथ ही राशन पर कालाबाजारी करने की पूरी छूट दी गयी। कोरोना महामारी के दौरान सरकार का मजदूर विरोधी चरित्र खुलकर सामने आया जिस कारण हजारों मजदूरों को आत्महत्या तक करने को मजबूर होना पड़ रहा है।

(साभार–– वर्कर्स यूनिटी, 2 और 9 नवम्बर 2021 की खबर)

मजदूर विरोधी चार श्रम संहिता (4 लेबर कोड) के पक्ष में बीजेपी समेत कांग्रेस और अन्य पार्टी भी एकमत

मोदी सरकार ने 44 श्रम कानूनों को खत्म कर चार श्रम संहिता संसद में पारित करवा लिये हैं। चार श्रम संहिता इतिहास के काले कानूनों में से एक है। बीजेपी ने सत्ता में आते ही मजदूरों के अधिकारों पर हमले शुरू कर दिये थे। हजारों कुर्बानियों और लम्बे संघर्ष के बाद हासिल मजदूरों के अधिकार अब उनसे छीने जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि मजदूर इन कानूनों का विरोध नहीं कर रहे हैं। देश की अलग–अलग जगहों पर सरकार को मजदूरों के तीखे विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

इन कानूनों पर एक नजर डालने से यह साफ हो जाता है कि इनका फायदा मालिकों को होगा और नुकसान मजदूरों को। ये कानून मालिकों को आजादी देंगे कि जब वह चाहे मजदूरों को कारखाने से निकाल सकते हैं। यह कानून स्थायी रोजगार को खत्म करके ठेके पर मजदूरों को रखने की छूट देता है। मतलब साफ है, आने वाले समय में ठेकेदारी प्रथा और बढ़ेगी। पहले से ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की हालत नारकीय बनी हुई है। उन्हें एक तो समय पर पूरी मजदूरी नहीं मिलती, दूसरा वे अपने ऊपर होने वाले अन्याय के खिलाफ आवाज भी नहीं उठा सकते। अब देश के सभी मजदूरों को इस ओर धकेला जा रहा है। मजदूरों की सामूहिक ताकत को कमजोर करने के लिए उनके यूनियन बनाने के संवैधानिक अधिकार को भी खत्म कर दिया गया है।

नेताओं के झूठे वादों को मजदूर अक्सर सच मान बैठते हैं और इस या उस पार्टी के पीछे हो जाते हैं। लेकिन किसी भी पार्टी ने इन काले कानूनों का विरोध नहीं किया। 9 राज्य की सरकारों ने तो इन्हें लागू कर भी दिया है। इन राज्यों में भाजपा सहित कांग्रेस शासित प्रदेश भी हैं। मजदूर विरोधी इन कानूनों को लाने वाली तो भाजपा सरकार है लेकिन अन्य सभी राजनीतिक पार्टियाँ पूरी तरह इन काले कानूनों के पक्ष में हैं। एक तरफ तो सभी पार्टियों के नेता चुनाव के समय मजदूरों से बड़े–बड़े वादे कर रहे हैं दूसरी तरफ मजदूरों के हकों को कुचलकर लाये जा रहे कानूनों का समर्थन भी कर रहे हैं।

(साभार–– वर्कर्स यूनिटी, 13 नवम्बर 2021 की खबर)

डाडम पहाड़ी इलाके में ठेकेदार की लापरवाही से गयी मजदूरों की जान

एक तरफ जहाँ एक जनवरी को देश और पूरी दुनिया नये साल के जश्न में डूबी थी, वहीं दूसरी तरफ उसी समय हरियाणा के भिवानी जिले में सुबह तोशाम इलाके के डाडम पहाड़ी में खनन के दौरान हादसे में 5 मजदूरों की जान चली गयी। इस हादसे को लेकर कई गम्भीर सवाल उठ रहे हैं कि खतरनाक स्थिति में खनन की मंजूरी दी कैसे गयी? मजदूर संगठन इस हादसे को लेकर सीधे तौर पर खनन मालिकों की लापरवाही और सरकार के गैरजिम्मेदाराना रवैये को जिम्मेदार बता रहे हैं। इस बीच सरकार ने इस पूरे मामले के जाँच के आदेश दे दिये है। उधर मजदूर संगठन और विपक्ष इस घटना की न्ययिक जाँच की माँग कर रहा है।

भिवानी जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर उपमण्डल तोशाम के गाँव डाडम में खनन क्षेत्र में शनिवार को पहाड़ी ढहने से ये दर्दनाक हादस हुआ। इस हादसे में पाँच मजदूरों की मौत हो गयी जबकि दो अन्य मजदूरों की हालत गम्भीर है। प्रत्यक्षदर्शियों ने दावा किया कि इस हादसे के कई घण्टे बाद तक बचाव कार्य शुरू नहीं हुआ था।

अरावली पर्वतमाला क्षेत्र जिसमें ये पहाड़ी भी आती है। वहाँ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने प्रदूषण का हवाला देकर पिछले दो महीने से खनन के काम पर रोक लगा दी थी। इस हादसे से दो दिन पहले ही खनन पर रोक को हटाया गया था।

खनन पर रोक के चलते पत्थरों की माँग बढ़ गयी थी। खनन माफिया और जमाखोरों ने माँग को जानबूझकर भी बढ़ने दिया था। बढ़े हुए माँग के मद्देनजर अधिकाधिक मुनाफा कमाने के लिए आज सुबह पहाड़ में बड़े पैमाने पर विस्फोट किये गये थे। उसकी वजह से ही पहाड़ दरक गया और यह बड़ा हादसा हुआ। खनन माफिया, ठेकेदार और सरकारी तन्त्र सीधे तौर पर मजदूरों की मौत के लिए जिम्मेदार हैं। सरकारें जानबूझकर ऐसी घटनाओं की अनदेखी करती हैं।

(साभार–– न्यूजक्लिक डॉट इन, 3 जनवरी 2022)

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