मजदूर–समाचार (सितम्बर 2022)
मैनेजमेंट की गलती के कारण एक मजदूर की कुचल कर मौत
बीते दिनों रेवाड़ी जिले के बावल औद्योगिक इलाके में स्थित रीको कम्पनी में सत्येन्द्र सिंह नाम के ठेका मजदूर की दर्दनाक मौत हुई। इस कम्पनी में एक हजार से ज्यादा मजदूर काम करते हैं। अधिकतर मजदूर ठेकेदार के अधीन काम करते हैं। इन मजदूरों की हालत बेहद खराब है। अक्सर इनसे ओवरटाइम काम करवाया जाता है और मजदूरी भी बेहद कम दी जाती है। इन्हीं मजदूरों में से एक मजदूर सतेन्द्र की बीते 5 सितंबर की रात कम्पनी में एक दुर्घटना के कारण मौत हो गई। लेकिन अन्य मजदूरों का साफ कहना है कि यह दुर्घटना नही बल्कि हत्या है जिसके लिए मैनेजर जिम्मेदार है। दरअसल कम्पनी में एक जगह से दूसरी जगह तक डाई को रखने के लिए क्रेन का इस्तेमाल किया जाता है। यह डाई 5 से 7 टन तक वजनी होती हैं। उस रात क्रेन का हुक सही से काम नहीं कर रहा था। यह बात जानने के बाद भी मैनेजर ने सत्येन्द्र पर उसी क्रेन से डाई लाने का दबाव बनाया। मैनेजर ने उसे नौकरी से निकालने तक की धमकी दी जिस कारण उसे मजबूरी में उसी क्रेन से काम लेना पड़ा। जब क्रेन के हुक में डाई को फँसाया गया तो उसमें लॉक नहीं था। इसलिए कुछ ऊँचाई पर पहुँचने के बाद ही हुक स्लिप हो गया और वह 5–7 टन की डाई सीधे सत्येन्द्र सिंह के ऊपर आ गिरी। इस हादसे में उनकी मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गयी।
मैनेजमेंट की गुंडागर्दी, जबरदस्ती और लापरवाही के कारण एक मजदूर का पूरा परिवार तबाह हो गया। जब उनके परिवार वालों ने पुलिस से इसकी शिकायत की तो उन्हें वहाँ से भगा दिया गया। उनके घर वालों के हजार प्रयास के बाद भी अब तक सत्येन्द्र को न्याय नहीं मिला पाया है।
इस कम्पनी में परमानेंट वर्करों की संख्या बहुत कम है। यहाँ यूनियन न होने के कारण मजदूर बेहद बुरी स्थिति में भी काम करने को मजबूर हैं। याद रहे इस कम्पनी में पिछले साल जून 2021 में मशीन पर काम करते हुए एक और ठेका मजदूर की मौत हुई थी।
साभार–– वर्कर्स यूनिटी, 6 सितम्बर 2022
परमानेंट नौकरी की माँग करने पर 5 मजदूरों को प्लांट से बाहर निकाला।
मानेसर में स्थित ‘हिताची मेटल्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ प्लांट में 200 से अधिक मजदूर काम कर करते हैं। अधिकतर मजदूर लम्बे समय से इसी जगह काम कर रहे हैं। लेकिन इतना लम्बा समय होने के बाद भी उन्हें परमानेन्ट नहीं किया गया। कानूनन किसी कम्पनी में 240 दिनों तक काम करने के बाद मजदूर परमानेन्ट माना जाता है। यह बात जब कुछ मजदूरों ने उठायी तो कम्पनी प्रबंधन ने उनकी बात को सिरे से खारिज कर दिया। दरअसल अस्थायी होने के चलते मजदूरों को किसी तरह का लाभ नहीं मिलता, साथ ही स्थायी मजदूरों की तुलना में उन्हें वेतन भी बेहद कम दिया जाता है। पिछले दिनों से मजदूर इसके विरोध में धरना प्रदर्शन भी कर रहे थे। विरोध करने पर प्रबंधन लगातार मजदूरों को धमकियाँ दे रहा था ताकि मजदूर अपना धरना तोड़ दें। लेकिन जब मजदूर अपनी माँगों पर अड़े रहे तो प्रबंधन ने 5 मजदूरों को बिना किसी पूर्व सूचना के नौकरी से निकाल दिया। यह मजदूर पिछले 6–7 सालों से इसी कम्पनी में काम कर रहे थे। क्या अपने हक की माँग करना भी अब जुर्म हो गया है? पिछले समय से कम्पनी अपने खिलाफ जाने वाले या अपना हक माँगने वाले सभी मजदूरों को इसी तरह डरा–धमका रही है। लेकिन मजदूरों के साथ ऐसी नाइंसाफी पर पुलिस और लेबर कोर्ट भी कुछ नहीं करती। भीषण बेरोजगारी के समय में आज मजदूर बेहद खराब शर्तों पर भी इन कम्पनियों में काम करने को विवश हो रहे हैं।
साभार–– वर्कर्स यूनिटी, 8 सितम्बर 2022
भीषण भुखमरी के कारण अपने बच्चे बेचने को मजबूर है मजदूर
हाल ही में एक खबर आयी कि महाराष्ट्र के नासिक जिले में एक आदिवासी समुदाय के लोग अपने बच्चों को सस्ते मजदूर के रूप में बेचने को मजबूर हो रहे हैं। यह समुदाय किसी तरह मेहनत–मजदूरी करके अपने परिवार का भरण–पोषण करता था, लेकिन पिछले कुछ समय से इन्हें काम मिलना बन्द हो गया। ऐसे में इनके सामने भुखमरी की समस्या आ गयी है। इनकी इस मजबूरी का फायदा उठाते हुए कुछ ठेकेदार सस्ते श्रम के लिए इनके बच्चों को खरीद रहे हैं। ताकि उन बच्चों को बँधुआ मजदूरों की तरह किसी कारखाने या खनन के काम में झोंक कर अकूत मुनाफा कमाया जा सके। मात्र दस हजार सलाना में यह काम करवाया जा रहा है।
एक तरफ देश में विकास के नये–नये दावे पेश किये जा रहे हैं और अमृत काल की घोषणा की जा रही है। दूसरी तरफ अच्छी शिक्षा और पौष्टिक खाना तो बहुत दूर की बात है, मजदूर अपने बच्चों को दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने की हालत में भी नहीं रह गये हैं। ऐसे हालात में वह मजबूरन अपने बच्चों से सस्ती मजदूरी करवाने के लिये विवश हो रहे हैं, जिससे उन्हें जिन्दा रहने के लिए केवल खाना मिल सके।
क्या यह मजदूरों का अमृत काल है या फिर उनके खून की एक–एक बूँद से मुनाफा निचोड़ने वाले मालिकों का अमृत काल है?
साभार–– वर्कर्स यूनिटी, 14 सितम्बर 2022
मजदूरों की बढ़ती आत्महत्या का जिम्मेदार कौन?
2021 के ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ के अनुसार 42 हजार यानी हर घंटे लगभग 5 दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की है। अब इनके परिवार दर–बदर की ठोकरे खाने को मजबूर हैं। आखिर एक साथ इतने बड़े पैमाने पर मजदूर आत्महत्या करने को क्यों विवश हो रहे हैं? एक तरफ सरकार देश में प्रगति और विकास की रोज नयी घोषणा कर रही है। वहीं दूसरी तरफ साल–दर–साल मजदूरों की आत्महत्या की घटनाएँ तेजी से बढ़ती जा रही हैं। आँकड़ांे के अनुसार 2014 में 15 हजार मजदूरों की आत्महत्या दर्ज हुई थी, जो 2020 तक बढ़कर 37 हजार हो गयी और 2021 में 42 हजार पार कर गयी। चौकाने वाली बात यह है कि इन मामलों में 25 फीसदी से भी ज्यादा दिहाड़ी मजदूर हैं।
क्या आज विकास का यही मॉडल है? एक तरफ अडानी जैसे मुट्ठी भर व्यापारी और धन्नासेठों की सम्पत्ति में दिन–दुनी, रात–चौगुनी बढ़ोतरी हो रही है। वहीं दूसरी तरफ मजदूरों के लिए भीषण अभाव और भुखमरी है जिसमें फँसकर वे केवल आत्महत्या को ही अपनी मुक्ति मान रहे हैं।
साभार– वर्कर्स यूनिटी
ऑटोरिक्शा चालक ने की आत्महत्या
बीते 13 सितम्बर को कानपुर आउटर के नरवर इलाके में सुनील गुप्ता नामक ऑटोरिक्शा चालक ने आत्महत्या कर ली। सुनील पहले एक किसान थे लेकिन पिछले समय से खेती में कोई बचत न होने के चलते उन्होंने अपना कोई काम शुरू करने का फैसला लिया था। इसके लिए उनके पास कोई जमा–पूँजी भी नहीं थी। मजबूरी में उन्हें अपने खेत को बेचना पड़ा, जिससे उन्होंने एक ऑटो खरीदा। परिवार की आर्थिक हालत इतनी खराब थी कि उनके पास खर्चा निकालने के लिए यह केवल आखिरी उम्मीद बची थी। लेकिन ऑटोरिक्शा चलाने के पहले दिन ही ट्रैफिक पुलिस के द्वारा उनका 10 हजार का चालान काट दिया गया। घर में रोटी तक के पैसे न होने की स्थिति में 10 हजार का चालान भर पाना उनके लिए असम्भव सा लगने लगा। लेकिन फिर भी इधर–उधर से उधार लेकर उन्होंने यह चालान भर दिया। इस घटना को अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि उनका दुबारा 12 हजार का चालान काट दिया। इस घटना से वह बेहद तनाव में आ गये और हर तरफ से निराश होकर उन्होंने आत्महत्या कर ली। यह कहानी केवल एक सुनील की नहीं है, हमारे चारों तरफ कितने ही सुनील आज व्यवस्था की मार के चलते हर रोज दम तोड़ रहे हैं।
साभार – ‘यूपी तक’ न्यूज वेबसाइट से, 14 सितम्बर 2022