मजदूर वर्ग के प्रति पढ़े–लिखे लोगों की जिम्मेदारी
समाज के शिक्षित लोगों में डॉक्टर, इंजीनियर, अध्यापक, सरकारी कर्मचारी, निजी कर्मचारी और दूसरे पढ़े–लिखे लोग आते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह शिक्षित तबका समाज का अगुआ है। समाज के बाकी लोगों को जागरूक करने की जिम्मेदारी उसकी है।
आज समाज के किस वर्ग को जागरूक करने की सबसे ज्यादा जरूरत है और क्यों? जब हम इस सवाल पर निगाह डालते हैं तो हमारे सामने सबसे पहले मजदूर वर्ग आता है क्योंकि इसकी संख्या सबसे अधिक है और समाज के क्रान्तिकारी बदलाव की ताकत उसी के पास है। अगर वह सही जानकारी और क्रान्तिकारी विचारधारा से लैश हो जाये तो समाज को सही दिशा दे सकता है और वह न केवल अपने वर्ग की सभी समस्याएँ सुलझा सकता है, बल्कि दूसरे पीड़ित वर्गों और तबकों को भी शोषण–उत्पीड़न से मुक्ति दिला सकता है। लेकिन आज उसकी आर्थिक हालत खराब है, बल्कि उसका बड़ा हिस्सा सही शिक्षा से वंचित है तथा अन्धविश्वास और गलत विचारों में फँसा है। इसलिए सबसे पहले मजदूर वर्ग को सही विचारों से लैश करना होगा और यह जिम्मदारी शिक्षित तबके की है कि वह मेहनत, लगन और त्याग करके मजदूर वर्ग को सही विचारों से लैश करे।
मजदूर वर्ग की हालत पर एक नजर डालने से यह साफ हो जायेगा कि क्यों मजदूर वर्ग की जिन्दगी में बदलाव लाना समाज की बेहतरी के लिए जरूरी है।
मजदूर वर्ग की समस्याएँ रोज–ब–रोज बढ़ती जा रही हैं। महँगाई और बेरोजगारी ने मेहनत मजदूरी करने वाले लोगों की कमर तोड़ दी है। साथ ही मजदूर बस्ती में गन्दे नाले और तंग गलियाँ हैं। इसके चलते उन्हें हमेशा ताजी हवा और साफ पानी के अभाव में जीवन बिताना पड़ता है और वे लगातार जानलेवा बीमारियों की चपेट में आते रहते हैं। स्कूल–अस्पताल का अभाव, मनोरंजन के साधनों का अभाव और 12 से 14 घंटे काम के चलते मजदूरों की जिन्दगी बद से बदतर हो रही है। अब आप खुद सोचिए कि जिस समाज का सबसे बड़ा वर्ग इतनी बुरी हालत में जिन्दगी गुजार रहा हो, वह समाज कभी स्वस्थ और सुन्दर हो सकता है? अगर ऐसे सड़े–गले समाज को बदला नहीं गया और खास तौर से मजदूरों की जिन्दगी को बेहतर नहीं बनाया गया तो हम सभी नरक में जीने के लिए मजबूर होंगे।
शिक्षित समुदाय के वे लोग जो मजदूरों की जिन्दगी को बदलने की इच्छा रखते हैं, उन्हें मजदूरों की जिन्दगी से जुड़ी सच्चाइयों से रूबरू होना जरूरी है और उनके बारे में समाज में फैलाये गये गलत विचारों से संघर्ष करना भी जरूरी है। जैसे मध्यम वर्ग के लोग मजदूरों पर तोहमत लगाते हैं कि वे आगे बढ़ना ही नहीं चाहते। वे अपने बच्चों को पढ़ाते नहीं। गन्दे होते हैं और गलत काम करते हैं। मध्यम वर्ग मजदूरों पर ऐसे झूठे–सच्चे आरोप मढ़कर उससे नफरत करता है, लेकिन ऐसा क्यों है और यह सब कैसे बदलेगा, इस पर वह दिमाग खर्च नहीं करता है।
दरअसल, मध्यम वर्ग के लोग मजदूरों की जिन्दगी और उनके संघर्षों के बारे में ज्यादा कुछ जानते ही नहीं। क्या कोई इस बात से इनकार कर सकता है कि सभी सुख–सुविधा के साधन, मशीन, स्कूल–अस्पताल, आदि सब कुछ मजदूरों ने बनाये हैं, लेकिन उसे इन चीजों के इस्तेमाल से दूर रखा गया है। उसके श्रम का शोषण किया जाता है, उसे कम मजदूरी दी जाती है। पूँजीपति ने उसे लूटकर कंगाल बना दिया है। इसके चलते उसे 12–16 घण्टे और डबल ड्यूटी में काम करना पड़ता है। उसके पास इतना समय नहीं कि वह अपने घर, कपड़ों और शरीर को चमका सके। उसके पास सेण्ट, क्रीम, पावडर और डियोड्रेण्ट जैसे महँगे मेकअप के समान खरीदने के पैसे नहीं हैं। गन्दा रहना उसकी इच्छा नहीं, मजबूरी है।
मध्यम वर्ग की धारणा है कि मजदूर अपने बच्चों को पढ़ाना ही नहीं चाहते हैं जबकि ऐसा नहीं है। मजदूरों के छोटे बच्चे भी काम पर जाने के चलते पढ़ नहीं पाते या अच्छी पढ़ाई के लिए महँगी फीस नहीं चुका पाते। इसी के चलते मजदूर बस्तियों के अधिकतर बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं। अगर वे स्कूल जाते भी हैं तो मुश्किल से 10वीं या 12वीं से अधिक पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्हें मजबूरन काम करना पड़ता है। दूसरी तरफ मजदूर बस्तियों के आस–पास अच्छे स्कूल भी नहीं होते हैं। अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना किसी भी मजदूर परिवार के बूते की बात नहीं है। अगर कोई शिक्षित व्यक्ति इन बातों को नहीं समझेगा तो वह मजदूरों की बुरी हालत के लिए उन्हें ही कोसेगा और उसकी नजर में लुटेरे पूँजीपति अच्छे बने रहेंगे।
सच तो यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली के कुछ इलाकों में कोरोना महामारी के समय कुछ शिक्षित नौजवान जब मजदूर बस्तियों में गये और बच्चों की पढ़ाई–लिखाई की बुरी हालत को देखते हुए मजदूरों से उनके मोहल्ले में ही स्कूल खोलने की बात कही तो यह सुनते ही मजदूरों ने खुशी–खुशी हामी भर दी। इतना ही नहीं, कई मजदूर परिवारों ने स्कूल चलाने के लिए अपना घर, छत या घेर भी दे दिया। उन्होंने खुद ही चन्दा जुटाकर ब्लैकबोर्ड, दरी, कुर्सियाँ आदि की व्यवस्था की। बहुत से नौजवान मजदूर भी छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए तैयार हो गये और देखते ही देखते मजदूरों के कई निशुल्क स्कूल खुल गये। जो बच्चे कभी स्कूल नहीं गये थे वे भी स्कूल जाने लगे। क्या इसी तरह पूरे देश की मजदूर बस्तियों में स्कूल नहीं खोले जा सकते हैं? हर जगह के शिक्षित और समझदार नौजवान ऐसे कामों का खुशी से स्वागत करते हैं लेकिन जो लम्पट और बिगड़ैल नौजवान हैं वे इसका विरोध भी करते हैं। ऐसे विरोधी नौजवानों से सही तरीका इस्तेमाल करके निपटना भी जरूरी होता है।
पढ़े–लिखे नौजवानों की एक बहुत बड़ी संख्या बड़ी–बड़ी डिग्रियाँ लेकर 8–10 हजार की नौकरी करने पर मजबूर है। ये नौजवान खुद को मजदूर नहीं मानते हैं, लेकिन उनकी हालत भी मजदूरों से बेहतर नहीं है। उनकी नौकरियाँ सम्मानजनक नहीं हैं। बहुत से नौजवान लड़के–लड़कियाँ 3 से 5 हजार रुपये मासिक वेतन पर प्राइवेट संस्थाओं में काम कर रहे हैं और मालिक–मैनेजर की डाँट–फटकार भी झेल रहे हैं। ये नौजवान भी अपने दम पर अपनी समस्याएँ सुलझा नहीं पा रहे हैं। इसलिए ऐसे नौजवानों को चाहिए कि वे मजदूर वर्ग के साथ खुद को जोड़ें और समाज में सकारात्मक बदलाव की अगुआई करें।
क्या शिक्षित नौजवान मजदूर वर्ग की समस्याओं को सुलझाते हुए अपनी समस्याओं का समाधान पा सकते हैं? हाँ, वे ऐसा कर सकते हैं, बल्कि उनकी समस्याओं का तभी सही समाधान निकल सकता है जब वे खुद को मजदूर वर्ग से जोड़ें और उनके संघर्षों में भाग लें।
जिन करोड़ों नौजवानों की प्रतिभा सरकारी नौकरियों की तैयारियों में और सम्मानजनक रोजगार न मिलने के चलते बेकार जा रही है, क्या वे उसका इस्तेमाल करके मजदूर बच्चों को शिक्षा, नृत्य, संगीत, साहित्य, पेंटिंग, ड्रामा आदि नहीं सिखा सकते हैं? क्या बच्चों को शिक्षित करने से अन्धविश्वास के मकड़जाल में फँसे मजदूरों के बीच वैज्ञानिक चेतना नहीं पनपेगी? जो मजदूर नौजवान नशाखोरी के दलदल में फँसे हुए हैं, क्या उन्हें उससे निजात पाने की प्रेरणा नहीं मिलेगी? ऐसा ही होगा, लेकिन इसके लिए शिक्षित नौजवानों को मजदूरों के बीच स्कूल चलाने, मेडिकल कैम्प लगाने और सामाजिक बदलाव का काम शुरू करना होगा।
आज मजदूरों की दशा में सुधार के लिए किसी सरकार के भरोसे बैठे नहीं रहा जा सकता क्योंकि कोई भी सरकार ऐसा नहीं करने जा रही है। आज सभी सरकारें लुटेरे पूँजीपतियों के साथ खड़ी हैं और समाज के खिलाफ काम कर रही हैं। वे वैज्ञानिक नजरिये को बढ़ावा देने वाली संस्थाओं को बन्द कर रही हैं और विज्ञान से जुड़े महत्वपूर्ण पाठों को सिलेबस से हटा रही हैं। ऐसी नीतियाँ बना रही हैं जिनसे मजदूर वर्ग और ज्यादा कंगाल–बदहाल होता जा रहा है और पूँजीपति वर्ग रोज अथाह मुनाफा कमाने का रिकार्ड बना रहा है। ऐसी स्थिति में पढ़े–लिखे नौजवानों को चाहिए कि वे न केवल मजदूरों को शिक्षित करें, बल्कि उन्हें चेतनशील भी बनायें। उन्हें देश–दुनिया की अर्थव्यवस्था, राजनीति, समाज और संस्कृति को जानने–समझने के लिए जागरूक करें और एकजुट करके उनके संघर्षों की अगुआई करें।
डॉक्टर और नर्स मजदूरों की जिन्दगी में क्या सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं? इस बात को अच्छी तरह समझने के लिए दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कोरोना महामारी के समय और उसके बाद काफी काम किया गया। इन इलाकों की मजदूर बस्तियों में डॉक्टरों और नर्सों ने कई मेडिकल कैंप लगाये और मरीजों का इलाज किया। उन डॉक्टरों और नर्सों को मजदूरों के हालात के बारे में बताया गया और उन्हें शिक्षित किया गया। उन्हें बताया गया कि वे जिन अस्पतालों में काम करते हैं, जो मशीनें और उपकरण इस्तेमाल करते हैं, जो दवाइयाँ मरीजों को देते हैं, उन सबको मजदूरों ने ही बनाया है। इसलिए मजदूरों और उनके बच्चों को मुफ्त या सस्ता इलाज मुहैया कराना मजदूरों पर कोई एहसान नहीं, बल्कि उनका कर्ज उतारना है।
डॉक्टरी की पढ़ाई करने के बाद ज्यादातर डॉक्टर शहरों में चले जाते हैं और महँगी फीस लेकर मरीज का इलाज करते हैं। कोई भी मजदूर महँगा इलाज कराने में असमर्थ होता है। अगर ऐसे डॉक्टर मजदूर बस्तियों में जाकर सस्ती फीस लेकर इलाज करें तो उन्हें आर्थिक रूप से भले थोड़ा नुकसान उठाना पड़े और वे आलीशान बंगले में न रह पायें, लेकिन वे अच्छे इनसान बने रहेंगे और समाज को बेहतर बनाने में अपना योगदान दे सकेंगे।
मजदूर वर्ग के बीच एक और गम्भीर समस्या पौष्टिक भोजन की है। ज्यादातर मजदूर परिवारों को पौष्टिक भोजन नहीं मिलता है। यदि कुछ परिवार आर्थिक रूप से पौष्टिक भोजन लेने में सक्षम हैं भी तो उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि पौष्टिक भोजन क्या होता है? शरीर को प्रोटीन, विटामिन, वसा, कार्बाेहाइड्रेट आदि कब और कितनी मात्रा में लेनी चाहिए। खाये–पीये–अघाये लोगों के लिए तो अलग से डाइटिशियन भी होते हैं जो उन्हें खाने के बारे में रोज मशवरा देते हैं। ऐसी स्थिति में मजदूरों के बीच काम करनेवाले डॉक्टर और नर्स मजदूरों को सस्ते और पौष्टिक भोजन के बारे में सही जानकारी देते हैं और उनकी कमी से होने वाली बीमारियों के बारे में भी बताते हैं। स्वास्थ्य से सम्बन्धित इसी तरह की ढेरों जानकारी मजदूरों को वे दे सकते हैं जिससे मजदूरों की सेहत बेहतर हो सके।
मजदूर कई बार अपनी समस्याओं को लेकर खुद को कोसते रहते हैं और हताश–निराश होने लगते हैं। उन्हें समझना पड़ेगा कि उनकी खराब हालत के लिए वे खुद जिम्मेदार नहीं हैं। उन्हें इस बात को समझना होगा कि मजदूर होना कोई शर्म की बात नहीं, बल्कि गर्व की बात है। माना कि उन्हें आज इतनी फुर्सत और साधन नहीं है कि वे अर्थव्यवस्था, राजनीति, समाज और संस्कृति के बारे में जान–समझ सकें और अपनी मौजूदा खराब हालत के लिए जिम्मेदार पूँजीपतियों की व्यवस्था की हकीकत को पहचान सकें। वे आज अपनी समस्याओं से अकेले दम पर निजात पाने में असमर्थ है। लेकिन अगर कोई शिक्षित व्यक्ति उन्हें समझाये और संगठित करे तो वे समाज को बदलने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
अब आइये, इस पहलू पर विचार करें कि मजदूरों की खराब हालत के लिए पूँजीपति, सरकार और उसकी नीतियाँ कैसे जिम्मेदार हैं और इस मामले में शिक्षित तबके की क्या जिम्मेदारी बनती है।
1990 में नवउदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद से सभी सरकारों ने मजदूरों के हकों पर लगातार हमले किये हैं। सरकारी नौकरियाँ खत्म कर दी गयीं और ठेके पर काम कराकर मजदूरों का बेइन्तहा शोषण शुरू कर दिया गया। हाल ही में सरकार ने चार श्रम संहिताओं पर कानून बना दिया। इसने मजदूरों के फायदे वाले सभी श्रम कानूनों को खत्म कर दिया। इन श्रम संहिताओं के तहत मजदूरों और नौकरीपेशा लोगों से 12 घंटे काम का कानून बना दिया गया है। यह देशी–विदेशी पूँजीपतियों को अधिक से अधिक मुनाफा पहुँचाने के लिए किया गया है।
पढ़े–लिखे नौजवानों को चाहिए कि वे सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों को समझें और मजदूरों को न केवल इनकी जानकारी दें, बल्कि उन्हें एकजुट करके मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष में सहयोग करें। अगर आज हम ऐसा नहीं करते हैं तो आने वाले समय में मजदूरों के पास कोई हक और अधिकार नहीं बचेंगे। जिस तरह किसानों ने देश की राजधानी की सीमा पर जुझारू आन्दोलन करके किसान विरोधी तीन काले कानूनों को वापस लेने के लिए सरकार को मजबूर कर दिया। उसी तरह मजदूरों को भी अपने संगठित और जुझारू संघर्षों से मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं को वापस लेने के लिए सरकार को मजबूर करना पड़ेगा।
पढ़े–लिखे नौजवानों को चाहिए कि वे आज की परिस्थितियों को समझे और सत्ता की भूखी राजनीतिक पार्टियों की जन–विरोधी भूमिका को पहचानें। ये सभी पूँजीपति वर्ग की पार्टियाँ हैं। सत्ता में आने पर वे पूँजीपति वर्ग के हित में नीतियाँ बनाती हैं। यदि कोई भी पार्टी मजदूर वर्ग को ध्यान में रखकर नीतियाँ नहीं बनाती है तो पढ़े–लिखे नौजवानों को चाहिए कि वे ऐसी पार्टियों का पर्दाफाश करें और मजदूर वर्ग को समझाएँ कि सरकारी की मजदूर विरोधी नीतियाँ पूँजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए बनायी गयी हैं और पूँजीपतियों को मजदूरों का शोषण करने की खुली छूट देती हैं।
कई नेकदिल नौजवान जो इन चुनावी पार्टियों को गलत मानते हैं, वे एनजीओ की शरण में चले जाते हैं। जबकि उन्हें यह पता होना चाहिए कि एनजीओ के लिए फंड कहाँ से आता है और उनका उद्देश्य क्या है? क्या देश में लाखों एनजीओ की मौजूदगी के बावजूद मजदूर वर्ग की हालत सुधरी है? दरअसल, अमरीका सहित दुनिया के पूँजीपतियों ने मजदूर आन्दोलन में दरार पैदा करने और मजदूरों की एकता को तोड़ने के लिए ही एनजीओ को बनवाया है। वे ही इन्हें फंड देते हैं। बदले में एनजीओ पूँजीपति वर्ग की सेवा करते हैं। एनजीओ सहित तमाम सुधारवादी लोगों का मानना है कि इसी पूँजीवादी व्यवस्था को चाक–चौबन्द करके बेहतर बनाया जा सकता है। वे क्रान्तिकारी आन्दोलन का विरोध करते हैं। वे नहीं चाहते कि जनता क्रान्ति करके पूँजीपतियों के द्वारा किये जा रहे शोषण–उत्पीड़न को खत्म करे और एक अच्छा समाज बनाये। ये लोग मजदूरों के शोषण–उत्पीड़न को गलत नहीं मानते, इसलिए इसे खत्म करनेवाले आन्दोलन का समर्थन नहीं करते। वे पूरी तरह से पूँजीपतियों की गोद में बैठकर मजदूरों के खिलाफ काम करते हैं। हालाँकि वे मुखौटा समाज सुधार का लगाते हैं लेकिन उन्हें देखकर यही कहा जा सकता है कि विषरस भरे कनक घट जैसे। यानी वे जहर से भरे सोने के घड़े के समान हैं। अगर कोई नौजवान एनजीओ की हकीकत को नहीं समझता तो वह मजदूर वर्ग और अन्य उत्पीड़ित जनता की सच्ची सेवा नहीं कर सकता।
आज जो पढ़े–लिखे नौजवान सच्चे आदर्शों की तलाश में यहाँ–वहाँ भटक रहे हैं, उन्हें मजदूर वर्ग के साथ अन्य उत्पीड़ित जनता की सेवा में तन–मन से समर्पित हो जाना चाहिए। इसी में उनके जीवन का सच्चा महत्व छिपा हुआ है। आज शोषित–उत्पीड़ित जनता की सेवा से महान और सच्चा काम कोई भी नहीं है। इससे ऊँचा कोई आदर्श नहीं है। ऐसा इसलिए कि मजदूर वर्ग ही एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकता है और शिक्षित तबका उसके साथ जुड़कर इस काम में उसकी अगुआई कर सकता है। एक बेहतर और न्यायपूर्ण समाज व्यवस्था की स्थापना ही इस सड़ती और ढहती पूँजीवादी व्यवस्था की जगह ले सकती है। यही विकल्प मजदूर वर्ग और देश की अन्य उत्पीड़ित जनता की मुक्ति का रास्ता है।
इसलिए शिक्षित तबके को बेहतर और न्यायपूर्ण समाज व्यवस्था की लड़ाई में भागीदार हो जाना चाहिए। उसे मजदूर वर्ग के बीच जाना चाहिए और अधिक से अधिक मजदूरों को शिक्षित करके इस नये विकल्प की ओर उनका ध्यान खींचना चाहिए। मजदूर वर्ग की मुक्ति मजदूर वर्ग के प्रयास के बिना सम्भव नहीं है। आज सभी समस्याओं का समाधान उसी के बीच से और उसके साथ जुड़कर ही निकलेगा।