मजदूर वर्ग के सच्चे कलाकार उत्पल दत्त

उत्पल दत्त एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने मजदूर वर्ग की सेवा में अपनी पूरी जिन्दगी लगा दी। वे चुप रहकर हालात का तमाशा देखनेवालों में से नहीं थे। उन्होंने विषम परिस्थितियों से घबराना नहीं सीखा था। जो सरकार और सत्ता मजदूरों के शोषण–उत्पीड़न पर आमादा हो, उस सत्ता को वे बेखौफ होकर अपने निशाने पर लेते थे और उसके शोषण–उत्पीड़न का पर्दाफाश करते थे। वे उस शासन–सत्ता के वफादार सेवक नहीं हो सकते थे। अगर अभिनेता उत्पल दत्त को समझना हो तो हमें सत्यजीत रे की फिल्म “आगन्तुक” देखनी चाहिए, जिसका मुख्य किरदार उत्पल दत्त की अपनी छवि बन गया है।
29 मार्च, 1929 को बरिशाल में उत्पल दत्त पैदा हुए थे जो अब बांग्लादेश का एक जिला है। उन्होंने कलकत्ता के सेंट जेवियर्स कॉलेज से पढ़ाई की थी। वे जर्मनी के क्रान्तिकारी कवि और नाटककार बर्ताेल्त ब्रेख्त से प्रभावित थे। ब्रेख्त के प्रभाव में उन्होंने कई नाटक लिखे, उनमें खुद अभिनय किया और उन्हें निर्देशित भी किया। वे प्रगतिशील नाट्य मंडल ‘इप्टा’ के संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने ‘इप्टा’ को ऊँचाई तक पहुँचाने के लिए जी–तोड़ मेहनत की। उन्होंने बंगाल के गाँव–गाँव घूमते हुए ‘जात्रा’ अभियान चलाया और क्रान्ति का अलख जगाया।
1970 के दशक के दौरान, उनके अब तक के तीन प्रसिद्ध नाटकों–– बैरिकेड, दुशापनेर नगरी (बुरे सपने का शहर) और एबार राजार पाला (अब राजा की बारी) को सरकार ने आधिकारिक तौर पर प्रतिबन्धित कर दिया था। इसके बावजूद लोग उसे देखने के लिए उमड़ पड़ते थे। उनके अन्य महत्वपूर्ण नाटक–– मानुषेर ओधिकारे यइन्सान के अधिकार), सूर्य–शिकार (सूर्य का शिकार), महा–बिद्रोह (महान विद्रोह) और लाल दुर्गा (लाल दुर्ग) थे। उन्होंने 22 पूर्ण लम्बाई के नाटक, 15 पोस्टर नाटक और 19 जात्रा स्क्रिप्ट लिखीं। दत्त ने 1948 में सत्यजीत रे की अध्यक्षता में ब्रेख्त सोसाइटी का भी गठन किया। उनका लिटिल थिएटर वह मंच बन गया जिसने दमनकारी ताकतों के खिलाफ मजदूर–किसान और तमाम उत्पीड़ित जनता के संघर्ष को नाटक के जरिये आवाज दी। उन्होंने हिन्दी और बांग्ला की कई फिल्मों में भी काम किया है।
एक चैंकाने वाली घटना में, उन्होंने बड़े साहस का परिचय देकर बहुत जोखिम भरा काम किया। धनबाद क्षेत्र के जामाडोबा इलाके में चिनाकुडी और बाराधेमो कोयला खदानों की सुरंग में आग लग गयी। मालिक खदान में फँसे मजदूरों की जिन्दगी की परवाह किये बिना पानी डालकर खदान को बचाने की कोशिश कर रहा था। इस दुर्घटना की खबर रवि घोष ने अपने एक रिश्तेदार के जरिये उत्पल तक पहुँचायी। खबर सुनते ही वे कोयला खदान की ओर दौड़ पड़े–– तापस सेन, निर्मल गुहा रॉय, उमानाथ भट्टाचार्य, रवि चट्टोपाध्याय और रवि घोष के साथ। वे एक हजार फीट नीचे उस खदान के छेद में दो घंटे तक घूमते रहे। जीवित खनिकों से बात की। खदान के अन्दर विभिन्न आवाजें रिकार्ड कीं।
बाद में उन्होंने मिनर्वा थियेटर के तीन मंजिला मकान में बैठकर लगातार 15 दिनों में कालजयी नाटक ‘अंगार’ लिखा। 31 दिसम्बर, 1959 को हुए इस नाटक के मंचन की कहानी आज बंगाली थिएटर जगत में एक मिथक बन गयी है।
उनके कालजयी नाटक फ्कल्लोल” से सरकार नाराज हो गयी। कल्लोल नाटक का 1965 में पहली बार मंचन किया गया था, जिसमें सरकार और प्रशासन के जन–विरोधी कार्यों की आलोचना की गयी थी। दत्त का मानना था कि “ऐसे देश में जहाँ बहुसंख्यक जनता भूख से मरती है, सिनेमा के सौन्दर्यशास्त्र के बारे में सहज बातचीत करना निन्दनीय है।” कल्लोल नाटक ने अंग्रेज सरकार के व्यवस्थित उत्पीड़न और भारत के लोगों के साथ राजनीतिक भेदभाव को निशाना बनाया था। इसकी पृष्ठभूमि 1946 के भारत के शाही नौसेना विद्रोह की थी।
अंग्रेज सरकार को निशाना बनानेवाले इस नाटक से कांग्रेस की सरकार भी डर गयी। 23 सितम्बर, 1965 को उत्पल दत्त को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। सरकार के इशारे पर अखबारों और पत्रिकाओं में नाटक को लेकर आलोचना की आँधी चलायी गयी। उस समय कलकत्ता के लगभग सभी समाचार पत्रों ने इस नाटक के विज्ञापनों के प्रकाशन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। लेकिन नाटक की सफलता तापस सेन द्वारा बनाये गये ‘कल्लोल चाहा चाहा’ पोस्टर और मन्मथ रॉय, सत्यजीत रॉय आदि द्वारा भेजे गये विरोध पत्रों के साथ जारी रही। उनकी रिहाई की माँग को लेकर राष्ट्रीय–अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कलाकार और बु(िजीवी एकजुट हो गये। कोलकाता की सड़कों पर जुलूस निकला। उनकी रिहाई के बाद 7 मई, 1966 को कलकत्ता के मैदान में ‘कल्लोल विजय उत्सव’ का आयोजन किया गया।
क्रान्तिकारी जज्बे वाला मजदूर वर्ग का यह कलाकार 1993 में 19 अगस्त को हमेशा के लिए लम्बी नींद में सो गया। आज भी वे जनता के हक की आवाज उठानेवाले कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों के लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। वे अपने कामों से हमें आगे बढ़ने के लिए सही रास्ता दिखा रहे हैं।
मजदूर वर्ग के इस सच्चे कलाकार को इन्कलाबी सलाम!