मजदूर विरोधी चार श्रम संहिताओं का विरोध क्यों करें?
2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान उद्योगपतियों के संगठन फिक्की ने मुख्य चुनावी पार्टियों के सामने यह प्रस्ताव रखा था कि श्रम कानूनों को लचीला किया जाये। उनकी मंशा साफ थी कि मजदूरों की सहुलियतों में भारी कटौती की जाये। 2019 में नरेन्द्र मोदी की सरकार ने फिक्की के सुझावों पर अमल करके श्रम कानूनों को तेजी से बदलना शुरू किया। इसके तरत केन्द्र और राज्य के अधीन आने वाल 144 कानूनों को चार श्रम संहिताओं में सीमित कर दिया। ये सहिताएँ है–– (1) औद्योगिक सम्बन्ध संहिता (2) न्यूनतम मजदूरी संहिता (3) सामाजिक सुरक्षा संहिता (4) व्यवसायगत सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थितियाँ संहिता।
सभी श्रम कानूनों को चार सहिताओं में तब्दील करने के पीछे सरकार का तर्क है कि इनसे व्यवसाय की सुगमता को बढ़ावा मिलेगा। यह बेबुनियादी और गलत तर्क है। इसका कोई सबूत नहीं है कि अधिक कानून होने से व्यवसाय में कोई कठिनाई होती है। क्या कानूनों की संख्या सीमित करके अपने व्यावसाय को सुगम बनाया जा सकता है? भारत में समान काम–समान वेतन के सि)न्त को लागू करने के लिए केवल एक कानून है लेकिन अमरीका में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए 8 कानून है। यूनाइटेड किंगडम में 65 से ज्यादा केन्द्रीय कानून है। इन देशों ने कभी अपने कानूनों को सीमित करने की बात नहीं की।
श्रम कानून महज 7 प्रतिशत संगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए हैं 93 प्रतिशत अंसगठित क्षेत्र को इससे अलग रखा गया है। यदि सरकार की मंशा साफ होती तो मजदूरों के बड़े हिस्से को इससे अलग क्यों रखती? असल में यह मजदूर वर्ग के उन हकों पर हमला है जो अकूत संघर्षों–बलिदानों के बल पर हासिल किये गये थे।
पहली संहिता (औद्योगिक सम्बन्ध संहिता)–– इन कानूनों के लागू होने से ट्रेड यूनियन अधिनियम–1926, औद्योगिक रोजगार अधिनियम–1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम–1947 का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। इस संहिता में पुरानी यूनियनों को रद्द करने के लिए सरकार को असीमित शक्तियाँ दी गयी हैं। किसी संस्था में एक वार्ताकार यूनियन की मान्यता हासिल करने के लिए 51 प्रतिशत मजदूरों की सदस्यता की सीमा रखी गयी है, पहले यह सीमा 10 प्रतिशत मजदूरों की थी। इसी तरह अब किसी भी संस्था की और किसी भी प्रकार की हड़ताल के लिए पहले नोटिस देना जरूरी है। हड़ताल से पहले नोटिस देने की शर्त अब से पहले केवल जन उपयोगी सेवाओं वाले प्रतिष्ठानों के लिए अनिवार्य थी। कुल मिलाकर यह कानून मजदूरों की यूनियन की ताकत पर हमला है। इसी संहिता में ‘हायर एण्ड फायर’ की नीति को मान्यता मिल गयी है। अब स्थायी प्रकृति के कामों में भी ‘रखों और निकालों’ की नीति लागू होगी जो मालिकों के लिए बेहद फायदे की है। इसी के तहत लेबर कोर्ट को हमेशा के लिए बन्द कर दिया जाएगा। अब मजदूर अपने साथ हुए अन्याय की गुहार नहीं लगा सकते। न तो कोई यूनियन होगी, न कोर्ट होगी। इसका मतलब साफ है कि मालिकों की मनमर्जी को खूली छूट देना। प्रशिक्षुओं और कम वेतन वाले सुपरवाइजरों को मजदूर की परिभाषा से बाहर कर दिया गया है।
दूसरी संहिता (न्यूनतम मजदूरी संहिता)–– 1957 में भारतीय श्रम सम्मेलन के अनुसार न्यूनतम वेतन अधिनियम परिवार के खाना, कपड़ा, शिक्षा–स्वास्थ्य, शादी–ब्याह, बुढ़ापे में देखरेख, त्यौहार, सामाजिक खर्ज आदि को मद्देनजर रखकर बनाया गया था। आज की महँगाई के हिसाब से यह 27 हजार रुपये प्रतिमाह से भी अधिक होगा। 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस मापदण्ड को सही बताया था। लेकिन इस संहिता में न्यूनतम मजदूरी तय करने के इस पैमाने को त्याग दिया गया है। इस समय मोदी सरकार द्वारा घोषित राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम वेतन 178 रुपये प्रतिदिन या लगभग साढ़े पाँच हजार रुपये मासिक है। यही नहीं, मालिक इतना तुच्छ वेतन देकर भी मजदूरों से 12 घण्टे काम करा सकता है।
यह न्यूनतम वेतन नहीं, भिखमंगा वेतन है, इतना मिलने पर तो जैसे–तैसे रो–गाकर बस जिन्दा ही रहा जा सकता है। चार लोगों का छोटा परिवार भी इतने कम पैसों में गुजारा नहीं कर सकता। हर रोज महँगाई आसमान छू रही है। नयी–नयी बीमारियाँ फैल रही हैं। इलाज और शिक्षा महँगी होती जा रही है। क्या इतने कम पैसों से कोई एक व्यक्ति भी अपनी ठीक ढंग से जिन्दगी जी सकता है? 178 रुपये न्यूनतम वेतन का क्या आधार है?
तीसरी संहिता (सामाजिक सुरक्षा संहिता)–– कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) में योगदान को 12 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया है। इस योगदान को और अधिक कम करने का हक भी सरकार के पास है। ठीक इसी तरह से कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) में मालिक के योगदान को 4–75 प्रतिशत से घटाकर 3–25 प्रतिशत कर दिया गया है और मजदूर के योगदान को 1–75 से 0–75 प्रतिशत घटा दिया गया है। साथ ही संस्थान को ईएसआईसी से खुद अलग रखने की छूट भी है। पूँजीपति द्वारा अपना हिस्सा जमा न करने पर जेल की सजा को अब महज छोटे से जुर्माने में तब्दील कर दिया गया है।
सामाजिक सुरक्षा के नजरिये से ईपीएफ और ईएसआईसी जैसी योजनाओं से मजदूरों के लिए बहुत फायदे थे जो संकट के समय में मजदूर को कुछ राहत देने के काम आ जाते थे। लेकिन अब मोदी सरकार की गि( नजर ईपीएफ और ईएसआईसी के भारी भरकम कोष पर है।
चौथी संहिता (व्यवसायगत सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थितियाँ संहिता)–– इस संहिता के तहत अब 500 मजदूरों वाली फैक्ट्री ही सेफ्टी कमेटियों के दायरें में होगी, खतरनाक उद्योगों में भी 250 मजदूरों वाली फैक्ट्री ही इस दायरें में आयेंगी। साफ है कि इस पैमाने से 98–99 प्रतिशत औद्योगिक ईकाई सेफ्टी कमेटियों के दायरे से बाहर हो जायंेगी, जिनमें 500 या 250 से कम मजदूर काम करते हैं । यही सरकार का ‘श्रमेव जयते’ अभियान है? काम के दौरान मजदूर घायल हो या मर जाये इनकी बला से। इसका सीधे–सीधे फायदा किसको होगा? मालिकों को।
इसके अलावा यह संहिता ठेका प्रथा को बढावा देने का काम करती है क्योंकि 50 मजदूरों तक की आपूर्ति करने वाले ठेकेदार संहिता के नियमों से मुक्त रहंेगे। पहले यह कानून 20 मजदूरों की आपूर्ति करने वाले ठेकेदारों तक सीमित था। इसके अलावा ठेका मजदूरों को वेतन के भुगतान के समय मुख्य नियोक्ता की ओर से किसी अधिकार प्राप्त व्यक्ति की उपस्थिति अनिवार्य थी। अब नये कानून के तहत इस नियम को हटा दिया गया है। हम सब जानते है कि ठेका मजदूरों के वेतन का बड़ा हिस्सा ठेकेदार द्वारा हड़प लिया जाता है।
अब तक शाम 7 बजे के बाद महिला मजदूरों को काम पर नहीं रोका जा सकता था, लेकिन अब रात की पाली में भी महिला मजदूर से काम लेने का अधिकार पूँजीपतियों को मिल गया है। महिला सशक्तिकरण का राग–अलपाने वाली सरकार कितनी बेशर्मी से ऐसे कानूनों को मान्यता दे रही है। जहाँ दिन में ही महिलाएँ सुरक्षित नहीं है, वहाँ रात की पाली में काम कराने का क्या मतलब है? नौकरी देने के बहाने महिलाओं के साथ हर रोज दिन–दहाड़े यौन हिंसा की खबरें आती हैं। रात के समय में ऐसी घटनाएँ और भयावह रूप लेंगी।
इसी संहिता में कार्यदिवस की समय सीमा 12 घण्टे कर दी गयी है। लाखों कुर्बानियों के बाद 8 घण्टे का कार्यदिवस तय हुआ था। लेकिन अब इसे 8 घण्टे के वेतन से ही 12 घण्टे काम लिया जाएगा।
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थोड़ी भी समझदारी रखनेवाला व्यक्ति आसानी से बता सकता है कि ये चार श्रम संहिता किसके फायदे के लिए लायी गयीे हैं। बात बिलकुल साफ है कि पूँजीपतियों को खुली छूट दे दी गयी है जिससे वे मजदूरों के खून–पसीने को सिक्को में ढालने का भरपूर इन्तजाम कर लें। मजदूरों ने जो अधिकार जबरदस्त संघर्षों से हासिल किये थे, उन सभी को एक झटके में छीन लिया गया है। मजदूर ट्रेड यूनियन में एकजुट न हों और मिलकर संघर्ष न कर पायें, इसके लिए ये तरह–तरह के हथकण्डे अपनाये गये हैं। आज चार श्रम संहिताओं का विराध करना और पुराने श्रम कानूनी की बहाली की माँग करना मजदूरों के लिए बहुत जरूरी है।
आज मजदूरों को पीछे मुड़कर अपने संघर्ष भरे इतिहास को देखने की जरूरत है और उससे सबक लेकर आगे के लिए संघर्ष की रणनीति बनानी है। सरकार और पूँजीपतियों के नये हथकण्डों को समझने के लिए अपनी चेतना को उन्नत करना भी जरूरी है। मजदूरों को एक मजबूत सांगठनिक एकता कायम करते हुए सरकार के इन प्रतिक्रियावादी मंसूबों के खिलाफ जुझारू और निरन्तर संघर्ष चलाने की जरूरत है। अगर हम अभी नहीं जागते और आगे बढ़कर जुल्म ढानेवाली सरकार की नीतियों का विरोध नहीं करते तो हमारी आनेवाली पीढ़ियाँ गुलामों से भी बदतर हालत में ढकेल दी जायेंगी।