मेहनतकश–मजदूरों के लिए मई दिवस के इतिहास का महत्व
आज मजदूरों की जिन्दगी पर गौर करें तो हमें क्या नजर आता है? सुबह से शाम तक हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी केवल जिन्दा रहने जितनी कमाई। एक तरफ रोजगार के साधन कम होते जा रहें हैं, मजदूरी घट रही है, तो वहीं दिन पर दिन महँगाई बढ़ती जा रही है। ऐसी हालत में मजदूरों के लिए अपने परिवार का भरण–पोषण भी बेहद मुश्किल हो गया है। इस परिस्थिति से बाहर निकलने का क्या रास्ता है? कोई सोचता है कि उसकी मुसीबत का कारण किसी देवी–देवता का गुस्सा है, तो कोई अपने भाग्य पर रोता है। लेकिन क्या सच में करोड़ों मजदूरों का भाग्य एक साथ खराब हो सकता है? अक्सर लोग यह कहते हैं कि मजदूर कभी एकजुट नहीं हो सकते, उनकी समस्याओं का कोई हल नहीं। यह निराशा से भरे दौर को दिखाता है। लेकिन इतिहास को जानने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसी बातें नहीं कहता। इतिहास में हजारों ऐसे दौर आये हैं लेकिन लोगों ने अपनी हिम्मत और साहस से हमेशा उनका सामना किया और जीत हासिल की। अब हम इतिहास की ऐसी ही एक घटना से रूबरू होंगे। एक ऐसी घटना जहाँ मजदूरों ने अपनी संगठित ताकत के बल पर दुनिया में पहली बार 8 घण्टे के कार्यदिवस का कानून बनाने पर सरकार को मजबूर कर दिया था। इतिहास में इस घटना को ‘‘मई दिवस’’ के नाम से जानते हैं। उस समय भी बहुत से लोग यही मानते थे कि कुछ नहीं हो सकता, लेकिन जाँबाज मजदूरों ने अपने हौसलों और बलिदानों से इतिहास बना दिया।
मई दिवस का इतिहास लगभग 150 साल पुराना है। यह कहानी उस अमरीका की है जो आज दुनिया के शीर्ष पर माना जाता है। अमरीका की भव्यता और सुन्दरता को अक्सर टीवी पर देखकर हम आश्चर्यचकित हो उठते हैं। लेकिन शायद ही हमने कभी सोचा हो कि इसका निर्माण करने वाले कौन थे? आज हम जिस अमरीका को देखते हैं, वह मजदूरों के निर्मम शोषण और खून–पसीने से बना है। उस समय मजदूरों ने अपनी बेजोड़ मेहनत से एक बंजर देश में बड़े–बड़े शहर बसाये, सड़कों और रेलों का जाल बिछाया, नदियों को बाँधा, गगनचुम्बी इमारतें खड़ी कीं, कारखानों में दुनिया–भर का सामान पैदा किये। इस काम के लिए मजदूरों को, जिसमें छोटे बच्चे और महिलाएँ भी शामिल थीं, 18–18 घंटे तक खटाया जाता। इन्हीं की मेहनत से अमरीका में एक मालिक वर्ग पैदा हुआ। यह मालिक वर्ग कोई मेहनत का काम नहीं करता था, उसके बाद भी इसकी सम्पत्ति दिन दूनी–रात चैगुनी बढ़ रही थी। मजदूरों का निर्मम शोषण और उत्पीड़न ही उसकी सम्पत्ति बढ़ाने में सहायह था। सरकार भी मालिकों के सामने झुक जाती थी और उनको खुली छूट देती थी कि वे मजदूरों को लूटें। जहाँ एक तरफ मुट्ठीभर मालिकों के लिए जन्नत का निर्माण हो रहा था, वहीं दूसरी ओर मजदूरों के लिए जिन्दगी नर्क बनती जा रही थी। जब कभी वह अपने ऊपर होने वाले शोषण के खिलाफ आवाज उठाते तो मालिक पुलिस, सेना और निजी गुण्डों से उन पर हमले करवाती। लेकिन अमरीका के जाँबाज मजदूर डरकर चुप रहने वालों में से नहीं थे। कुछ समय बाद वह इतिहास रचने वाले थे।
मालिकों से छिटपुट संघर्षों ने उन्हें यह बात सिखा दी थी कि अगर सारे मजदूर एक हो जायें तो वह अपनी मुक्ति हासिल कर सकते हैं। 1877 के बाद से मजदूरों ने संगठित होकर अपने संघर्षों को तेज कर दिया। कुछ जाँबाज मजदूर लोगों में तेजी से लोकप्रिय होने लगे। उनके साहस भरे कामों और जोशीले भाषणों ने मजदूरों को जगा दिया। वे मजदूरों पर होने वाले शोषण का खुलकर विरोध करते थे और अपने हक के लिए सबको संगठित करने पर जोर देते थे। उन्हीं के नेतृत्व में आगे चलकर पूरे अमरीका में मजदूरों के आन्दोलन शुरू हुए। शिकागों में मजदूरों का आन्दोलन सबसे अधिक ताकतवर था। वहाँ के मजदूरों ने एक मई, 1886 के दिन हड़ताल करने का आह्वान किया। देखते–देखते इस आह्वान से हजारों मजदूर जुड़ने लगे। एक मई के दिन शिकागों शहर में बहुत विशाल जुलूस निकला। जुलूस के आगे एक बड़ा बैनर था, जिस पर लिखा था? ‘‘8 घण्टे काम, 8 घण्टे मनोरंजन और 8 घण्टे आराम’’। इस तरह इतिहास में पहली बार 8 घण्टे के कार्यदिवस की माँग मजदूरों ने की। यह अमरीका के इतिहास का सबसे बड़ा जुलूस था, जिसमें लगभग 3 लाख मजदूर शामिल हुए थे। इस दिन शिकागो के आस–पास सारा रेल यातायात ठप्प हो गया और ज्यादातर कारखाने बन्द हो गये।
मजदूरों को संगठित होता देख मालिकों में डर पैदा हो गया। उन्हें अपनी लूट पर खतरा नजर आने लगा। सारे मालिकों ने मिलकर बैठकें करनी शुरू कर दीं। अखबारों के जरिये उन्होंने मजदूर आन्दोलन को बदनाम करना चाहा। साथ ही पूरे शहर में निजी गुण्डों और हथियारबन्द पुलिस को लगाकर उन्होंने आपातकाल घोषित कर दिया। इस लड़ाई में एक तरफ मालिक थे, जिनके साथ सरकार, पुलिस और निजी गुण्डे थे, जो लूट की व्यवस्था को किसी भी कीमत पर बचाये रखना चाहते थे। वहीं दूसरी तरफ मजदूर थे, जिनके पास केवल कभी न झुकनेवाला हौसला था। मजदूर लूट की व्यवस्था के विरोधी थे। हमले की घात में बैठे मालिकों ने तीन मई को निहत्थे हड़ताली मजदूरों पर गोलियाँ चलवा दी। इस घटना में चार मजदूर मारे गये और बहुत से घायल हुए। अगले दिन भी मजदूरों पर हमले जारी रहे।
पुलिस के बर्बर दमन के खिलाफ मजदूर नेताओं नें चार मई की शाम को मुख्य बाजार में एक जनसभा रखी। इसके लिए शहर के मेयर से इजाजत भी ले ली गयी थी। 300 मजदूरों की उपस्थिति में शाम 8 बजे सभा शुरू हुई। मजदूर नेता पार्सन्स और स्पाइस ने मजदूरों से कहा कि वे संगठित होकर पुलिस दमन का सामना करें। साथ ही उन्होंने अपनी लड़ाई को मानवता की लड़ाई बताया, जिसका लाभ आने वाली अनेकों पीढ़ियों तक को होगा। रात 10 बजे के आस–पास बारिश होने लगी, तब तक पार्सन्स और स्पाइस वहाँ से जा चुके थे और सभा भी खत्म होने वाली थी। लेकिन उसी समय वहाँ हथियारबन्द पुलिस आ गयी। उन्होंने मजदूरों से जाने के लिए कहा। तभी अचानक कहीं से एक बम फट गया, जिससे एक पुलिसवाला भी मारा गया। बम फटते ही पुलिस ने निहत्थे मजदूरों पर अंधाधुंध गोली चला दी। चारों तरफ चीख–पुकार मचने लगी। हर जगह खून से लथपथ मजदूर नजर आ रहे थे। 6 मजदूर इस निर्मम दमन में मारे गये और कितने ही घायल हुए। यह साफ था कि मजदूरों पर कार्रवाई को ठीक बताने के लिए यह बम पुलिस ने खुद डलवाया था।
इस घटना के बाद शिकागों की पुलिस मजदूरों के खून की प्यासी हो गयी। मजदूर संगठनों के दफ्रतरों पर छापेमारी शुरू हो गयी। बिना किसी सबूत के मजदूरों को जेल में भरा जाने लगा। 8 मजदूर नेताओं पर बम पफेंकने और हत्या करने का मुकदमा लगा दिया गया, जबकि इन 8 मजदूर नेताओं में से 7 उस समय वहाँ मौजूद भी नहीं थे। मजदूर नेता पार्सन्स डेढ़ महीने तक पुलिस से छिपते रहे। लेकिन जब उन्होंने देखा कि उनके दूसरे साथी बिना किसी जुर्म के पुलिस का अत्याचार सह रहे हैं तो उनके मन ने यह स्वीकार नहीं किया कि वह आजाद रहें। पार्सन्स खुद अदालत में गये और जज से कहा, ‘‘मैं अपने बेकसूर साथियों के साथ कठघरे में खड़ा होने आया हूँ।’’
सरकार यह जानती थी कि अगर मजदूर नेताओं को खत्म कर दिया जाये तो पूरा आन्दोलन खुद खत्म हो जाएगा। इसलिए बिना किसी सबूत के सभी मजदूर नेताओं को फाँसी की सजा सुना दी गयी। अदालत में स्पाइस ने चिल्लाकर कहा था कि ‘‘अगर तुम सोचते हो कि हमें फाँसी पर लटकाकर तुम मजदूर आन्दोलन को, गरीबी और बदहाली में कमरतोड़ मेहनत करनेवाले लाखों लोगों के आन्दोलन को कुचल डालोगे, अगर यही तुम्हारी राय है–– तो खुशी से हमें फाँसी दे दो। लेकिन याद रखो, आज तुम एक चिन्गारी को कुचल रहे हो लेकिन यहाँ–वहाँ, तुम्हारे पीछे, तुम्हारे सामने, हर ओर लपटें भड़क उठेंगी। यह जंगल की आग है। तुम इसे कभी भी बुझा नहीं पाओगे।’’
11 नवम्बर 1887 के दिन 4 मजदूर नेताओं को फाँसी दे दी गयी। इनको फाँसी शहर के 200 धनवान मालिकों के बीच में दी गयी। शायद मालिकों को लगता था कि आखिरी समय वे अपनी मौत के लिए उनके सामने झुकेंगे, लेकिन एक पत्रकार ने बाद में बताया कि वह मरते समय तक अपने उसूलों पर कायम थे।
सरकार और मालिक खुश थे कि अब मजदूर डरकर चुप बैठ जाएँगे। लेकिन जैसा कि स्पाइस ने कहा था कि यह तो बस चिन्गारी है, वही हुआ। 13 नवम्बर को चारों नेताओं की शव यात्रा एक जनसैलाब में बदल गयी। देखते ही देखते पूरा शिकागो शहर मजदूरों से भर गया। हर कोई अपने नेताओं को आखिरी सलाम देना चाहता था। लगभग 6 लाख लोग जिसमें मजदूर, बच्चे, डॉक्टर, वकील, जज, शिक्षक सभी शामिल हुए। लोग इतने ज्यादा थे कि पुलिसवाले चुपचाप सड़क के दोनों ओर अपनी बन्दूक नीचे रखकर नजर झुकाये खड़े थे। चारों तरफ इतनी शान्ति थी कि केवल कदमों और साँसों की आवाजें ही सुनाई दे रही थीं। बच्चे, बूढ़े, औरत, आदमी हर किसी की आँखों से आँसू छलक रहे थे। लोगों का आना बढ़ता जा रहा था मानों पूरा शहर उमड़ आया हो। शायद पहले अमरीका के इतिहास में किसी को इतना सम्मान मिला हो, जितना इन शहीद नेताओं को मिल रहा था। यह खबर जल्दी ही हर जगह फैल गयी। पूरी दुनिया के मजदूरों ने शिकागों के इन शहीदों को नमन किया और उनसे प्रेरित होकर लूट और शोषण के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। दुनिया भर की सरकारें मजदूरों के संगठित ताकत से घबरा गयी और 8 घण्टे के कार्यदिवस का कानून बना दिया। तब से एक मई को मजदूर दिवस के रूप में दुनियाभर में मनाया जाता है।
आज हम ऐसे समय में ‘‘मई दिवस’’ मना रहे हैं, जब सरकार मजदूरों के हित में बने कानूनों को एक के बाद एक करके खत्म कर रही है। मजदूरों ने निरन्तर संघर्ष और हजारों कुर्बानियों के बाद इन्हें हासिल किया था। 8 घण्टे काम को हटाकर 12 घण्टे काम लेने की इजाजत दी जा रही है। मालिक यानी पूँजीपति आज पहले से कहीं अधिक क्रूर नजर आ रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मजदूर आज बेहद कमजोर स्थिति में है, उनके संगठन टूट–पफूट का शिकार हैं। मजदूरों के संगठित न होने का मतलब मालिकों को लूट–खसोट की खुली आजादी और मजदूरों की बर्बादी है। लॉकडाउन में जब मजदूरों की हालत बद से बदतर हो रही थी, उसी समय भारत के शीर्ष 100 पूँजीपतियों ने 10 लाख करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया। अकेले मुकेश अम्बानी को एक घण्टे में इतना मुनाफा हुआ जितना कमाने में एक सामान्य मजदूर को 10 हजार साल लग जाएँगे। साफ है कि आज सरकार मेहनतकश लोगों के खून की एक–एक बूँद निचोड़कर पूँजीपतियों की मुनापफे की हवस शान्त करने में लगी हुई है। वहीं दूसरी तरफ मजदूरों कि एकता को कमजोर करने के लिए उन्हें हिन्दू–मुस्लिम या जाति के आधार पर बाँटकर आपस में ही लड़वा रही है, ताकि उनकी लूट बरकरार रहे। आज हमें इतिहास से सबक लेकर अपनी सही पहचान हासिल करनी होगी। अपने बीच जाति, धर्म, क्षेत्र आदि की नकली दीवारों को तोड़कर एकता कायम करनी होगी। हमें याद रखना चाहिए कि फाँसी के फन्दे पर मजदूर नेता पार्सन्स ने कहा था, ‘‘मेरी बात सुनो–– अमरीका के लोगो! मेरी बात सुनो–– जनता की आवाज को दबाया नहीं जा सकेगा’’। आज हमें निराशा के अंधेरे को चीरकर नये कीर्तिमान खड़े करने होंगे। मई दिवस मनाने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है!