नौजवान मजदूर की जिम्मेदारी
हम जानते हैं कि रोजगार की हालत खराब है। एक तो काम मिलना ही मुश्किल है, काम मिले तो सही मजदूरी नहीं मिलती। घर परिवार कैसे चले? महँगाई ने जीना हराम कर रखा है। दुनिया बहुत बुरी है। सड़ रही है। बदबू और बीमारी फैला रही है। इसे बदलकर बेहतर बनाने की असली जिम्मेदारी नौजवान मजदूरों के ऊपर ही है।नौजवान होना खुशी की बात है। रगों में गर्म खून झरने की तरह दौड़ता है। शरीर में ताजगी बनी रहती है। ऊर्जा और उत्साह से भरपूर मन हमेशा कुछ न कुछ करने के लिए बेचैन रहता है। मजदूर होना भी खुशी की बात है। मजदूर मेहनत से घबराता नहीं। काम करने के लिए उसके कदम हमेशा आगे बढ़ते रहते हैं। मजदूर अपनी भुजाओं की ताकत से खेत तैयार करता है और उसमें फसले उगाकर अन्न पैदा करता है। वह कपड़े, घर, सड़क और उस पर चलने वाली गाड़ियों को भी बनाता है। लेकिन अधिक उम्र के मजदूरों में कुछ कमियाँ होती हैं। वे जिन्दगी में बदलाव लाने से घबराते हैं। झूठी शान और परम्पराओं से चिपके रहते हैं। ठगी करने वाले बाबाओं और मुल्लाओं के पीछे भागते हैं। उनकी बेसिर–पैर की बातों पर भरोसा करते हैं। अपने बाल बच्चों तक ही सीमित रहते हैं। लेकिन नौजवान मजदूर इन कमियों से दूर होता है। इसलिए नौजवान मजदूर होना सबसे अधिक खुशी की बात है।
दुनिया को बदलने और मजदूर वर्ग की जिन्दगी को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी नौजवान मजदूरों के कन्धों पर होती है। ज्यादातर नौजवान मजदूर इस जिम्मेदारी से डरते नहीं। वे इसे स्वीकार करते हैं। समाज बदलने के लिए अपनी निजी जिन्दगी को पीछे रखते हैं। अपने घर को ही अपना नहीं मानते, बल्कि पूरा समाज ही उनका घर होता है। शुरू में उन्हें समाज का ज्ञान नहीं होता। उन्हें यह पता नहीं होता कि समाज में सभी एक जैसे नहीं हैं। कुछ लुटेरे मिलकर सभी मजदूरों की कमाई हड़प जाते हैं। उनके घर की महिलाओं को अपमानित किया जाता है। उनके साथ भी मालिक और उसके गुर्गे बुरा बर्ताव करते हैं। उन्हेंेे नीचा समझा जाता है। लेकिन नौजवान मजदूर इस बात को नहीं मानते कि भगवान ने किसी को ऊँचा–नीचा पैदा किया है। कबीर दास जी ने कहा है कि ‘‘ऊँचे कुल क्या जनमिये, जो करनी उच्च न होय।’’ यानी ऊँचे खानदान में पैदा होना बेकार है, अगर व्यक्ति अच्छे काम न करे। ऊँची जाति में पैदा होने का घमण्ड आदमी को अँधा बना देता है, वह दूसरी जाति के लोगों से नफरत करता है। नफरत की आग उसे तिल–तिलकर जलाती है। उसका दिमाग सड़ जाता है और वह एक अच्छा इनसान नहीं बन पाता। इसलिए ऊँच–नीच का भेदभाव खत्म किये बिना कोई अच्छा इनसान बन ही नहीं सकता। अगर कोई यह भेदभाव करता है, तो वह ढोंगी और पाखण्डी है। उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। क्या ऊँच–नीच मानने वाले ढोंगी–पाखण्डी समाज को अच्छा बना सकते हैं? नहीं, वे समाज को और बुरा बनाते हैं। नौजवान मजदूर अच्छा समाज बनाने की ओर आगे बढ़ता है, इसलिए वह किसी भी तरह का भेदभाव नहीं मानता।
मजदूरों में कुछ थोड़े लोग ऐसे भी होते हैं जो मजदूरों के नाम पर बट्टा लगाते हैं। वे नशाखोरी करते हैं। जुआ खेलते हैं और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करते हैं। मालिक उनके साथ खराब व्यवहार करता है, लेकिन वे मालिक का कुछ बिगाड़ नहीं पाते, इसलिए एक–दूसरे से लड़ते हैं। वे एक–दूसरे से नफरत करते हैं। इसका फल बहुत खराब होता है। मालिक इसका फायदा उठाते हैं और मजदूरों का बेलगाम शोषण करते हैं।
नौजवान मजदूर इन बातों को समझता है। वह खुद गलत काम से दूर रहता है और दूसरे लोगों को भी गलत काम करने से रोकता है। वह स्वार्थी नहीं होता और सबकी भलाई के लिए काम करता है। अगर कोई नौजवान मजदूर अच्छे रास्ते से भटक जाये तो बहुत बुरा होता है। बुराई का पलड़ा भारी हो जाता है और अच्छाई का पलड़ा हल्का। इससे समाज और खराब हो जाता है। लूटपाट और अपराध बढ़ जाते हंै। अपराध खत्म करने के नाम पर पुलिस वाले मजदूरों को लूटते हैं। उन्हें कई तरह से दबाते हैं। लेकिन मजदूरों को डरने की कोई जरूरत नहीं। उन्हें मिलकर अन्याय के खिलाफ लड़ना चाहिए। अपने ऊपर डण्डे फटकारने वालों का विरोध करना चाहिए। गलत बात का विरोध करना सबसे अच्छा काम है। इससे बुराई पर रोक लगती हैै और समाज बेहतर बनता है। जहाँ भी गलत हो रहा है, उसका विरोध करना चाहिए। अगर सरकार गलत काम कर रही है, तो उसका भी विरोध होना चाहिए।
सरकार ने श्रम कानून खत्म कर दिया। इससे मालिकों को कानूनी अधिकार मिल गया कि वे मजदूरों से 8 घण्टे की जगह 12 घण्टे काम करायें और उन्हें सही मजदूरी भी न दें। मालिकों के अन्याय से मजदूर परेशान हैं। लेकिन उन्हें आवाज उठाने की इजाजत नहीं दी जाती। क्या मालिक अपने खिलाफ आवाज उठाने की इजाजत मजदूरों को देंगे? नहीं। इसके बाद भी मजदूरों को मालिकों के अन्याय का विरोध करना चाहिए। उन्हें अकेले–अकेले नहीं, आपस में मिलकर विरोध करना चाहिए। विरोध करने से ही उन्हें उनका हक मिलेगा और अन्याय खत्म होगा।
लेकिन बीबी–बच्चे वाले मजदूर विरोध करने से डरते हैं। वे क्यों डरते हैं? वे इसलिए डरते हैं कि अगर उन्हें कुछ हो गया तो उनके बच्चों का क्या होगा? जबकि नौजवान मजदूर ऐसी किसी बात से नहीं डरते। वे संघर्ष करने और विरोध करने में सबसे आगे रहते हैं। उनके अन्दर साहस कूट–कूट कर भरा होता है। वे किसी जोर जबरदस्ती को नहीं मानते। किसी बाधा की परवाह नहीं करते। हर कठिनाई से टकराते हैं। हर समस्या का हल ढूँढने की कोशिश करते हैं और कभी हार नहीं मानते। कुछ नौजवान मजदूर पता नहीं क्यों निराश रहते हैं। वे अपने मन की बात किसी से खुलकर नहीं बताते। अगर वे अपने मन की बात किसी समझदार और अच्छे इनसान से कहें, तो हो सकता है कि उनकी समस्या का समाधान हो जाये। मन में बातें छिपाकर क्या फायदा, उसका आचार तो नहीं बनेगा कि पराठे से खाने के काम आये। अन्दर ही अन्दर घुटते न रहंे। मन में एक बोझ लेकर न चलें। मन का बोझ उतारकर पफेंक देना चाहिए। खुलकर लोगों से अपने मन की बात करनी चाहिए। इसी से निराशा दूर होगी।
इससे मन छोटा नहीं करना चाहिए कि मालिक हमें लूटते हैं और हमारा अपमान करते हैं। हमें इस बात से बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं कि दूसरे लोग पैसे के ढेर पर बैठकर अय्याशी कर रहे हैं और हमारी जिन्दगी में दु:ख ही दु:ख हैं। दु:ख इनसान को क्या तोड़ेगा, तुम दु:ख को तोड़ दो। लूट, अपमान और दु:ख हमारे तीन दुश्मन हैं और जिनको हमें चुनौती की तरह लेना चाहिए। दुश्मन से बिना लड़े हार नहीं माननी चाहिए। अगर लड़ें और मारे गये तो शहीद कहलायेंगे और दुनिया हमें इज्जत देगी। कीड़े की तरह अपमान सहकर घुट–घुटकर मरने से खराब चीज कोई नहीं। यह सब धरती पर नरक जैसा है। इसलिए इन तीन दुश्मनों के खिलाफ अन्त तक लड़ना चाहिए। नौजवान मजदूर ही इस लड़ाई को अन्त तक लड़ता है। नौजवान मजदूरों को उठ खड़ा होना चाहिए, मजदूर वर्ग के हक में न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। इस लड़ाई में एक ओर सारे मालिक और धनी लोग हैं जो मजदूरों का खून चूसने वाले जोंक हैं। दूसरी ओर, मेहनत करके गुजारा करने वाले मजदूर। मजदूरों को आपसी भेदभाव मिटाकर एका करके शोषण और अन्याय के खिलाफ लड़ना चाहिए। इस लड़ाई से ही आगे चलकर एक नया समाज बनेगा और मजदूरों के दु:खों का अन्त होगा।