निराशा नहीं उम्मीद ही दुनिया को बदल सकती है
मजदूर एकता पुस्तिका के पहले अंक का हर जगह लोगों ने और खास तौर से मजदूरों ने स्वागत किया। इससे हमारा उत्साह बहुत बढ़ गया है। उनके बीच से कई तरह की बातें सामने आयीं। कुछ लोगों ने इससे पूरी सहमति जतायी और इसे अपना सहयोग देने का वादा किया। जबकि कुछ लोगों ने पूछा कि इसे पढ़ने के बाद आगे क्या करना है? लेकिन कुछ लोग ऐसे भी मिले, जिन्होंने सन्देह जताया कि आन्दोलन करने से कोई लाभ नहीं होगा। हालाँकि हमने अपनी ओर से यह साफ कर दिया कि पूरी तैयारी के बिना किसी भी आन्दोलन को सफल नहीं बनाया जा सकता। कोई भी आन्दोलन तभी सफल हो सकता है, जब उसके पीछे एक मजबूत संगठन हो और संगठन तभी सही काम कर सकेगा, जब उसे सही विचारों की रोशनी में चलाया जाये।
ऐसे मजदूर बड़ी संख्या में मिले, जो हताश–निराश हैं। उनका कहना है कि इन सब से कोई लाभ नहीं। हमारी दशा नहीं सुधरेगी। आप चाहे जितनी कोशिश कर लो। जो मजदूर ऐसी बात कह रहे हैं, उनकी बातों को पूरी तरह हवाई नहीं कहा जा सकता। उन्होंने हमें वे बातें भी बतायीं, जिसके चलते उन्हें ऐसा मानने के लिए मजबूर होना पड़ा। मजदूरों से हुई बातों में से कुछ बातें हम यहाँ देने जा रहे हैं जिससे पाठक को पता लग सके कि आम मजदूर क्या सोचते हैं?
अपना अनुभव साझा करते हुए एक मजदूर ने हमसे कहा, ‘‘कुछ साल पहले की बात है। मेरठ में किताबों के प्रकाशन की एक कम्पनी में काम कर रहे मजदूरों ने अचानक हड़ताल शुरू कर दी। मालिक ने कुछ सालों से मजदूरी नहीं बढ़ायी थी, जबकि खाने–पीने की चीजों के दाम बढ़ते जा रहे थे। कम्पनी के गेट पर धरना प्रदर्शन शुरू हो गया। मालिक ने शहर के पुलिस अधिकारियों को फोन करके इसकी सूचना दी। सिपाहियों से भरी हुई कई गाड़ियों के साथ पुलिस अफसर धरना प्रदर्शन की जगह पर पहुँच गये। हड़ताल की अगुवाई करने वाले कुछ नौजवान मजदूरों के साथ मालिक की मीटिंग हुई। मीटिंग में मजदूरों की माँगों को पूरा करने का विश्वास दिलाया गया। इसके लिए एक महीने का समय तय हुआ। लेकिन एक महीने बाद जो वादा उनसे किया गया था उसे पूरा नहीं किया गया। सभी मजदूर चिन्तित और नाराज थे। उन्होंने काम बन्द कर दिया। मेन गेट पर सभी मजदूर इकठ्ठा होकर फिर से धरने पर बैठ गये। पुलिस अधिकारी अपने दल–बल के साथ आये और इस बार बातचीत किये बिना, मजदूरों पर लाठी बरसाने का सीधे आर्डर दे दिया। कुछ ने भागकर अपने को बचाया। नेतृत्व करने वाले मजदूर डटे रहे। उनमें से कुछ को पुलिस ने गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। पहली हड़ताल के बाद मजदूरों में जो उम्मीद जगी थी, पुलिस की हिंसक करवाई से वह निराशा में बदल गयी।’’
दूसरे मजदूर ने अपना किस्सा यों सुनाया, ‘‘मेरे सामने की बात है भाई साहब। छत गिर जाने से बिल्डिंग निर्माण के काम में लगे 30 मजदूर नीचे दबकर मर गये। कम्पनी ने रातों–रात मजदूरों की लाशों को ठिकाने लगा दिया। इस काम को पुलिस और मीडिया ने दबा दिया। जब परिवार के लोग पता लगाने के लिए निर्माण स्थल पर पहुँचे तो उन्हें कुछ भी हाथ नहीं लगा। अखबारों और टीवी चैनलों में इस खबर को जानबूझ कर जगह नहीं दी गयी। पुलिस ने भी कोई मदद नहीं की। वह भी कम्पनी मालिकों के साथ मिली हुई थी। इस व्यवस्था में कहीं से कोई मदद नहीं मिलती। इसमें कोई बदलाव नहींं हो सकता।’’ इस तरह कई मजदूरों से बात करने पर हमें पता चला कि उनमें घोेर हताशा और निराशा भरी हुई है।
सच पूछा जाये तो एक मजदूर चाहता है कि उसकी बीवी और बच्चों को अच्छा खाना मिले। उसके बच्चे स्कूल जायें। पढ़ाई–लिखाई करें। घर में कोई बीमार पड़े तो उसका बेहतर इलाज हो सके। लेकिन कड़ी मेहनत के बावजूद उसे और उसके परिवार के सदस्यों को वह सब नहीं मिल पाता जिसके वे सच्चे हकदार हैं। मजदूर जब भी मालिकों से अपने हक के लिए संघर्ष करता है तो उसे हार का सामना करना पड़ता है? आखिर क्यों? क्योंकि संघर्ष का तरीका ठीक नहीं होता। वह बिना संगठन बनाये संघर्ष करता है। वह सोचता है कि जल्दी–जल्दी 50–100 लोगों को जुटाकर आन्दोलन करने से मालिक डर जायेगा और हमारा हक दे देगा। उसकी यह सोच गलत है। मजदूर हक की यह लड़ाई एक बहुत ही लम्बी लड़ाई है। इसके लिए धैर्य से कुछ समझदार मजदूरों को संगठन बनाकर लम्बे समय तक संघर्ष करना होगा और तमाम टेढ़े–मेढ़े रास्ते से गुजरने के बाद सफलता हासिल होगी। इसके साथ यह भी सच है कि मजदूरों के पास संघर्ष करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।
यह हम सभी जानते हैं कि मजदूर अपनी जिन्दगी को बेहतर बनाने के लिए संघर्ष करता है। इस संघर्ष को जीतने के लिए उसे सबसे पहले समाज व्यवस्था को जानना और समझना होगा। हमारा समाज वर्गों में बँटा हुआ है। एक तरफ, मालिक या पूँजीपति वर्ग है जो शोषक वर्ग है क्योंकि वह मजदूरों की गाढ़ी कमायी लूटता है। दूसरी तरफ, मजदूर वर्ग है जो शोषित वर्ग है क्योंकि इसे ही लूटकर मालिक अपनी तिजोरी भरते हैं। मजदूर वर्ग के हित मालिक के खिलाफ होते हैं। मालिक का एक ही मकसद है, ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना। इस मुनाफे को बढ़ाने के लिए वह मजदूरों को गुमराह करता है। उनकी एकता को तोड़ देता है जैसे 12–12 घण्टे काम कराकर मजदूरों का पूरा समय छीन लेता है, जिससे मजदूर खाली समय में दूसरे मजदूर की मदद न कर सकंे या अपना संगठन न बना लंे क्योंकि अगर मजदूर के पास समय नहीं होगा तो वह अपना संगठन नहीं बना पायेगा। मजदूरों को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि वर्गों में बंटे समाज में सरकार किसी एक वर्ग की होती है यानी या तो वह मजदूरों की सरकार होगी या पूँजीपतियों की। आज सभी चुनावी पार्टियाँ, उनके संगठन और सरकारें मालिक वर्ग की सेवा के लिए हैं।
वर्ग के हिसाब से समाज को देखने और समझने के तौर–तरीके को वर्गीय नजरिया कहते हैं, जिसका अर्थ है, मजदूर खुद को एक वर्ग के सदस्य के रूप में देखे और सभी मजदूरों के हितों को एक माने। वर्गीय नजरिये के बिना कोई भी मजदूर उस अन्धे के समान है जो आँख होते हुए भी समाज की सच्चाई नहीं जान पाता। वह यह नहीं देख पाता कि उसकी खराब हालत का असली जिम्मेदार कौन है? वह अपनी खराब हालत को किस्मत का खेल या पिछले जन्म के कर्मों का फल समझता है। अगर उसके पास सही वर्गीय नजरिया होता तो वह समझ जाता है कि उसका शोषण करने वाला मालिक वर्ग ही उसकी खराब हालत का जिम्मेदार है। वह मजदूर वर्ग की मेहनत से पैदा की गयी सम्पत्ति को हड़प जाता है। इस के काम में सरकार भी पूँजीपति वर्ग की मदद करती है। इसलिए की संगठित ताकत के खिलाफ संघर्ष करने के लिए मजदूरों को भी अपना संगठन बनाना पडे़गा। वर्गीय नजरिये के बिना किसी भी संघर्ष को जीता नहीं जा सकता।
आज मजदूरों के पास सही वर्गीय नजरिये की कमी है। इसके चलते वह अपने को एक वर्ग के रूप में संगठित नहीं कर पाते। बिना संगठन के हर लड़ाई में हार के अलावा कुछ भी हासिल नहीं होता है। जैसे एक अकेली सींक घर की सफाई नहीं कर सकती। वैसे ही एक अकेला मजदूर संगठित पूँजीपति वर्ग से मुकाबला नहीं कर सकता। जिस तरह कई सींकों को मिलाकर झाड़ू बनाने के लिए एक डोरी की जरूरत होती है। उसी तरह मजदूर वर्ग को संगठित करने के लिए वर्गीय नजरिये की जरूरत होती है। इसके बिना मजदूर वर्ग एक अकेली सींक की तरह बेकार रह जायेगा।
आज मालिक वर्ग संगठित है। वे आपस के लड़ाई–झगड़े को शान्तिपूर्वक निपटा लेते हैं। जबकि मजदूर आपसी विवाद होने पर बँट जाते हैं और कमजोर पड़ जाते हैं। मीडिया और टीवी चैनल शोषण करनेवाले मालिकों के हित की बातें करते हैं। वे मजदूरों की बात नहीं उठाते। इसलिए मजदूरों के अपने अखबार, चैनल, पत्रिका आदि होने चाहिए। अगर मजदूर अपनी बात को इन माध्यमों से समाज में फैलायें तो उन्हें देश के कई हिस्सों से समर्थन मिलेगा। इसके अलावा मजदूरों को समाज में हो रहे हर आन्दोलन, हड़ताल और दूसरी घटनाओं पर नजर रखनी चाहिए। मजदूर आन्दोलन पर पुलिस के लाठी–डण्डे के हमले को देखकर मजदूर समझ सकते हैं कि पुलिस वाले असल में किसके साथ होते हैं। वर्गीय नजरिये की कमी, संगठन के अभाव और मजदूर मीडिया की कमी के चलते एक फैक्ट्री में शुरू होने वाली हड़ताल दूर–दूर तक अपना असर नहीं छोड़ पाती। यानी एक फैक्ट्री से शुरू होकर पूरे इलाके में, फिर जिला स्तर से होते हुए प्रदेश स्तर तक नहीं पहुँच पाती है। इससे मजदूर वर्ग की ताकत बढ़ नहीं पाती और उन्हें हार का सामना करना पड़ता है।
दुनिया में जिन देशों के मजदूरों ने वर्गीय नजरिये और संगठन के महत्व को समझ लिया, उन देशों में मजदूरों को सफलता मिली और कई देशों में उनकी सरकारें भी बनी। रूस, क्यूबा, चीन जैसे देशों के मजदूरों की हालत हमारे देश के मजदूरों से बेहतर क्यों है? क्योंकि इन देशों के मजदूर वर्ग ने अपने को वर्गीय नजरिये के आधार पर संगठित किया था। पूँजीपति वर्ग को हराकर एक ऐसे समाज का निर्माण किया, जहाँ इनसान का शोषण नहीं होता था। बच्चों से मजदूरी नहीं करवायी जाती थी। सभी को सही मजदूरी मिलती थी। बेरोजगारी, भुखमरी, वेश्यावृत्ति का नामोनिशान खत्म हो गया था।
आज मजदूरों को इन देशों के मजदूर संगठन और मजदूर आन्दोलन के इतिहास से प्रेरणा लेने की जरूरत है। अगर रूस, क्यूबा और चीन के मजदूर ऐसे महान कारनामे कर सकते हैं तो भारत के मजदूर क्यों नहीं कर सकते? कुछ लोग मजदूरों को गुमराह करते हुए कहते हैं कि भारत में मजदूरों की दशा सुधर नहीं सकती क्योंकि यहाँ कोई आन्दोलन सफल नहीं होगा। उन्हें अपने देश के इतिहास के बारे में ही नहीं पता है। हमारे देश में सैकड़ों बार मजदूर ने आन्दोलन शानदार जीत हासिल की है। चाहे वह कोयला खदान मजदूरों का आन्दोलन हो या बम्बई का मशहूर कपड़ा मिल का आन्दोलन।
जिस तरह मजबूत लकड़ी में दीमक लग जाने पर वह खोखली हो जाती है और किसी काम की नहीं रह जाती है। उसी तरह अगर निराशा किसी इनसान के अन्दर घर कर जाये तो वह खोखला हो जाता है। धीरे–धीरे उसका जीवन अँधेरे में डूब जाता है। लकड़ी दीमक को पहचान नहीं सकती लेकिन इनसान अपनी निराशा को पहचान सकता है। जिस चीज को पहचाना जा सकता है। उसे दूर भी किया जा सकता है। कुछ थोड़े से हताश–निराश मजदूर हमेशा यह कहते हुए मिल जाते हैं कि लोगों को नहीं समझाया जा सकता। उन्हंे इस बात का एहसास ही नहीं है कि जो मजदूर दुनिया को बना सकता है वह उसे बदल भी सकता है। अगर हमारे आस–पास के मजदूर नहीं समझते तो क्या हमें भी उनके जैसा बन जाना चाहिए? क्या हमें हार मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना चाहिए? संघर्ष किये बिना ही हार मान लेना क्या ठीक बात है? इससे तो हमारे दुश्मनों की जीत होगी।