फैक्ट्रियाँ बनी मजदूरों की जान की दुश्मन
मजदूरों के लिए फैक्ट्री में काम करना बेहद खतरनाक होता जा रहा है। देश भर में फैक्ट्रियों में होने वाली दुर्घटनाएँ इस बात की गवाह हैं। इन दुर्घटनाओं में मजदूर घायल हो जाते हैं, या अपना कोई अंग खो बैठते हैं, यहाँ तक कि कई बार उनकी मौत भी हो जाती है। आइये, पिछले दिनों घटी कुछ घटनाओं पर नजर डालते हैं।
बिहार की पहली इथेनॉल फैक्टरी पूर्णिया जिले में लगायी गयी, जिसका उद्घाटन मुख्यमंत्री और उद्योगमंत्री ने किया था। इसके बावजूद यह फैक्ट्री इनसान के जानमाल के लिए कतई सुरक्षित नहीं है। 20 अगस्त 2022 को 21 वर्ष के रणजीत नाम के मजदूर की मशीन में दबकर मौत हो गयी। उसके बाद फैक्टरी के प्रबन्धन और पुलिस प्रशासन ने मिलकर केस को रफा–दफा करने की कवायद शुरू की। बेशर्मी की हद तो तब हो गयी, जब बिना परिजनों को सूचना दिये शव का आनन–फानन में पोस्ट मार्टम कराकर उसे घर भेज दिया गया। इस घटना को लेकर बाकी फैक्ट्री मजदूरों में जबरदस्त गुस्सा था। उन्होंने ही मृतक के परिजनों को फोन करके सूचना दी, जिसके बाद परिजनों ने एम्बुलेंस से शव बरामद कर लिया।
दूसरी घटना 25 अगस्त 2022 को मुजफ्फरपुर के मेडिकल वेस्टेज प्लान्ट की है। बेला इण्डस्ट्रियल एरिया के फेज टू में स्थित बायो कचरा निष्पादन फैक्ट्री की चिमनी दोपहर में काटने के दौरान टूटकर गिर गयी। इसकी चपेट में आकर एक मजदूर की घटनास्थल पर दर्दनाक मौत हो गयी और दूसरा गम्भीर रूप से घायल हो गया। मृतक के परिजनों ने कम्पनी पर लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए कहा कि घटना के बाद इलाज कराने में भी देरी की गयी, जिससे उस मजदूर की मौत हो गयी। हालाँकि पुलिस ने मैनेजर और ठेकेदार को हिरासत में ले लिया है, लेकन शायद ही उनके खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई हो।
तीसरी घटना मेरठ के रोहटा थाना क्षेत्र के एक पटाखा फैक्ट्री की है। 26 अगस्त 2022 को शुक्रवार के दिन पटाखा फैक्ट्री में भीषण आग लग गयी। धमाकों की आवाज दूर–दूर तक फैल गयी, जिससे लोगों में हड़कम्प मच गया। इस हादसे में एक मजदूर की मौत हो गयी और कई मजदूर झुलस गये। बाकी लोगों ने आठ फीट ऊँची दीवार को फाँदकर अपनी जान बचायी। इस फैक्ट्री में उस समय एक दर्जन मजदूर काम कर रहे थे। प्रशासन ने जाँच के बाद कार्रवाई करने की बात कही है।
इसी क्रम में चौथी घटना हिमांचल प्रदेश के विलासपुर की है। जहाँ 27 अगस्त 2022 को देर रात सरिया फैक्ट्री में जोरदार धमाका हुआ। इस धमाके में आठ मजदूर गम्भीर रूप से झुलस गये। घायलों की शिकायत पर फैक्ट्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर लिया गया है। अन्य प्रत्यक्षदर्शी मजदूरों का कहना है कि फैक्ट्री में गैस रिसाव हो रहा था, जो दुर्घटना का कारण बना। फैक्ट्री के प्रबन्धन की लापरवाही इस घटना में साफ–साफ देखी जा सकती है क्योंकि प्रबन्धन ने किसी भी तरह का सेफ्टी किट उपलब्ध नहीं करवाया था। बाद में आठ घायल मजदूरों से दो की मौत हो गयी।
पाँचवी घटना मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के खोखरी नामक गाँव की है। 8 सितम्बर 2022 को इस गाँव की अनब्रेको फैक्ट्री में एक हादसा हो गया। इस हादसे में एक मजदूर की मौत हो गयी। इस फैक्ट्री में नट–बोल्ट और वाशर बनाये जाते हैं। मशीन पर काम करते हुए अचानक एक वाशर एक मजदूर को आकर लगा और वह जमीन पर ऐसे गिरा कि दुबारा उठा ही नहीं। वहीं उसकी मौत हो गयी। अगर फैक्ट्री में सुरक्षा के इंतेजाम किये गये होते तो मजदूर की जान न जाती।
छठी घटना राजस्थान के राजसमन्द जिले के मोरचना थाने की है। 9 सितम्बर 2022 को 6 हजार किलो के मार्बल ब्लॉक के नीचे दबने से एक मजदूर की जान चली गयी। यह घटना तब हुई, जब वह मजदूर पत्थर को गैन्ट्री मशीन से उठाकर कटिंग मशीन तक पहुँचा रहा था। उसी समय गैन्ट्री मशीन की रस्सी टूट गयी, जिससे पत्थर फिसलकर मजदूर के ऊपर गिर पड़ा। हादसे के बाद मजदूरों में गुस्से की लहर दौड़ गयी। उन्होंने काम छोड़ दिया और फैक्ट्री के परिसर में जमा होकर धरना शुरू कर दिया। उन्होंने फैक्ट्री मालिक को बुलाने और मुआवजे की माँग की। देर शाम तक फैक्ट्री में शोर–शराबा होता रहा। इसी दौरान परिजनों ने शव उठाने से मना कर दिया। कुछ मजदूरों ने वहीं दाह–संस्कार करने के लिए ट्रैक्टर भर लकड़ी मँगा ली। यह मजदूरों के गुस्से का इजहार था।
सातवीं घटना गुजरात के सूरत शहर की है। 9 सितम्बर 2022 को यहाँ की एक केमिकल फैक्ट्री में भीषण आग लग गयी। इस हादसे में 4 मजदूर मारे गये और 20 मजदूर बुरी तरह झुलस गये। यह दुर्घटना तब हुई, जब खतरनाक केमिकलों से भरे कंटेनर में भीषण विस्फोट के बाद आग लग गयी। दमकल की गाड़ियों को आग पर काबू पाने के लिए दो घण्टे मशक्कत करनी पड़ी। फैक्ट्री के प्रबन्धन ने इस दुर्घटना को ‘‘दुर्भाग्यपूर्ण’’ करार देते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया।
यहाँ हमने बीस दिनों के अन्दर सात दुर्घटनाओं का जिक्र किया है, जो देश के विविध हिस्सों में घटी हैं और जिसमें दर्जनों मजदूरों की जिन्दगी तबाह हो गयी। यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पूरे साल भर देशभर में इस तरह कि सैकड़ों दुर्घटनाएँ होती हैं, जिसमें हजारों मजदूरों की जिन्दगी बरबाद हो जाती है। साथ ही उनके परिजनों पर संकट का पहाड़ टूट पड़ता था। एक तो अपनों के खोने का गम और दूसरे रोजी–रोटी का संकट उनकी जिन्दगी को नरक बना देता है। कई परिवार तो इतनी बुरी हालत में पहुँच जाते हैं कि सम्मानजनक रोजगार के अभाव में भीख माँगने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
2021 में केन्द्र सरकार ने संसद में जानकारी दी कि पिछले पाँच सालों में फैक्ट्रियों, पोर्ट, माइनों और निर्माण स्थलों पर 6500 मजदूर मारे जा चुके हैं। हालाँकि इस क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि ढेरों मामलों का रिकॉर्ड नहीं रखा जाता है। ताजा खबरों के मुताबिक बिना रजिस्ट्रेशन वाली छोटी फैक्ट्रियों में सबसे अधिक दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। इनमें काम करने वाले मजदूर बेहद गरीब परिवार से आते हैं। दुर्घटना के बाद अधिकांश परिवारों को मुआवजा नहीं मिलता और न ही उनके पास इतने पैसे होते हैं कि वे कोर्ट–कचहरी का दरवाजा खटखटा सकें।
इन सब का जिम्मेदार कौन है? दरअसल, अधिक मुनाफा कमाने के लिए फैक्ट्री मालिक सुरक्षा उपाय पर खर्च करने से बचता है, दुर्घटना होने के पीछे यही सबसे मुख्य वजह है। फैक्ट्री मालिक के लिए इनसान की जिन्दगी से अधिक कीमती उसका मुनाफा और रुपया–पैसा होता है। दूसरी और कार्य स्थल पर सुरक्षा के लिए जो भी कानून थे जैसे– कारखाना अधिनियम–1948, खान अधिनियम–1951 आदि उन्हें खत्म करके सरकार उनकी जगह पर व्यवसायगत सुरक्षा संहिता–2020 लेकर आयी है। इस नयी संहिता के चलते फैक्ट्री मालिक पूरी तरह से बेखौफ हो जायेंगे और फैक्ट्री में सुरक्षा के इन्तेजाम से पूरी तरह मुँह मोड़ लेंगे। यह सोचकर ही रूह काँप जाती है कि उसके बाद फैक्ट्रियों में मजदूरों की क्या दशा होगी।
सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि पहले जब ट्रेड यूनियनें मजबूत हुआ करती थीं, तो वे मालिक पर दबाव बनाकर सुरक्षा के इन्तेजाम करवा लेती थीं। आज या तो ट्रेड यूनियनें खत्म कर दी गयी हैं या उन्हें कमजोर कर दिया गया है। इसके चलते फैक्ट्री मालिक बेलगाम होकर मनमानी पर उतर आये हैं। फैक्ट्री मजदूरों की भी आँखें तभी खुलती हैं, जब कोई न कोई दुर्घटना हो जाती है। इस खराब हालात को तभी बदला जा सकता है, जब मजदूर संगठित होकर आवाज उठायें और फैक्ट्री मालिक पर स्थायी दबाव बनाकर उसे सुरक्षा के उपाय करने के लिए मजबूर कर दें। इसी के साथ मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं को वापस लेने की और पुराने श्रम कानूनों को बहाल करने की माँग करें। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक मजदूर अपनी जान गँवाते रहेंगे और फैक्ट्रियाँ इनसानों को खाने वाली पिशाच बनी रहेंगी।