फैक्ट्रियों की आग में झुलस कर मरते मजदूर

08 Jun 2025 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!
बीती 4 जनवरी को तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले के सत्तूर इलाके में एक पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट की दिल दहलाने देने वाली घटना सामने आयी। इस धमाके में फैक्ट्री का एक कमरा पूरी तरह से तबाह हो गया जिसमें कई मजदूर काम कर रहे थे। विस्फोट इतना भयानक था कि इसमें 6 मजदूरों की मौत हो गयी और कई मजदूर अभी तक लापता हैं। धमाके से फैक्ट्री में भीषण आग लग गयी जिसमें बहुत से मजदूर झुलस गये। विरुधुनगर जिले में यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी यहाँ पटाखा फैक्ट्रियों में दो बड़े हादसे हो चुके हैं, जिनमें 14 मजदूरों की मौत हुई थी, जिसमें 12 महिलाएँ भी शामिल थीं। इन फैक्ट्रियों के मलबे में 7 मजदूरों के शव मिले जिनकी पहचान आज तक नहीं हो पायी है। यही हाल देश के लगभग सभी राज्यों का है। उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के एक फर्नीचर बनाने वाले कारखाने में 26 नवम्बर 2024, मंगलवार को भीषण आग लग गयी, जिसमें तीन मजदूर जिन्दा जल गये और उनकी मौत हो गयी। आग की लपटें इतनी तेज थीं कि मजदूरों को बचने का कोई मौका तक नहीं मिला। 22 सितम्बर को कानपुर देहात के औद्योगिक क्षेत्र रनिया में एक गद्दा बनाने वाली फैक्ट्री में आग लगी। वहाँ दिवाली को देखते हुए मजदूरों से दिन–रात काम कराया जा रहा था। ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए फैक्ट्री मालिक ने उसी दिन 11 नये मजदूरों को काम पर रखा था। सभी 11 मजदूरों ने फैक्ट्री में पहले दिन ही नाइट की शिफ्ट में ज्वाइनिंग कर ली और ये सभी मजदूर इसी दिन आग की चपेट में आ गये। इनमें से 6 मजदूरों की मौत हो गयी। ताला नगरी कहे जाने वाले अलीगढ़ में मनकामेश्वर स्टील्स फैक्ट्री में 24 मई 2024, शुक्रवार शाम को बड़ा हादसा हुआ। लोहा गलाने के दौरान भट्ठी में विस्फोट हुआ और भीषण आग लग गयी। इस हादसे में दो मजदूरों की जलकर मौत हो गयी और पाँच बुरी तरह से झुलस गये। पिछली साल 3 नवम्बर को दिल्ली के कीर्ति नगर में एक फैक्ट्री में आग लगी, जिसमें लकड़ी और फर्नीचर रखा हुआ था। आग लगने से फैक्ट्री में धुएँ का काला–भूरा अँधेरा फैल गया, जिससे दम घुटने से वहाँ सो रहे दो मजदूरों की मौत हो गयी। 6 दिसम्बर को पानीपत, हरियाणा में धागा फैक्ट्री आग की लपटों में धूँ–धूँ कर जल उठी। जहाँ आग लगी वहाँ 5 मजदूर काम कर रहे थे। इसने 2 मजदूरों की जिन्दगी को लील लिया और 3 मजदूर लम्बे समय तक जिन्दगी और मौत से लड़ते रहे। हरियाणा के ही रेवाड़ी में एक फैक्ट्री में इतनी भीषण आग लगी कि चार मजदूर जिन्दा जलकर मर गये और 12 मजदूर गम्भीर रूप से घायल हो गये। घटना के बाद लम्बे समय तक फैक्ट्री में सन्नाटा छाया रहा। आंध्र प्रदेश के अनाकापल्ली जिले की एक केमिकल फैक्ट्री में जोरदार धमाका हुआ। फैक्ट्री का एक हिस्सा इस धमाके में पूरी तरह तबाह हो गया और दूर–दूर तक केवल धुँआ ही धुँआ नजर आने लगा। इसमें 14 मजदूरों को अपनी जान गँवानी पड़ी और 30 से ज्यादा मजदूर बुरी तरह जख्मी हो गये। 13 अक्टूबर को झारखण्ड के सरायकेला की फैक्ट्री में बॉयलर फट गया, जिसमें एक मजदूर की मौत हो गयी और कई बुरी तरह घायल हो गये। पिछले छः–सात महीनों में 10 से ज्यादा फैक्ट्रियों में इस तरह की भीषण आग लग चुकी है, जिसमें 50 से ज्यादा मजदूरों को अपनी जान गँवानी पड़ी। ये ऐसी जानकारी है जो किसी न किसी अखबार में छपी है। ऐसी बहुत सी घटनाएँ हैं जो छपती ही नहीं या जिन्हें दबा दिया जाता है। आज देश में हर 20 से 25 दिन में किसी न किसी शहर में कोई न कोई फैक्ट्री आग की चपेट में आ रही है और उसमें काम करने वाले मजदूरों की जिन्दगी लील रही है। वहाँ बेहद कम मजदूरी पर काम करने वाले मजदूरों की जिन्दगी की कीमत लालाओं की तिजोरियों के सिक्कों से ज्यादा कुछ नहीं है। मजदूर इन लालाओं की फैक्ट्रियों की मशीनों के पुर्जे बनकर रह गये है। उन्हें खराब हो जाने पर या टूट जाने पर फेंक दिया जाता है, उसी तरह मजदूरों को भी इन हादसों में मर जाने पर भुला दिया जाता है और अपंग हो जाने पर फैक्ट्री से निकाल दिया जाता है। देश के रहनुमाओं को ये सुलगती हुई फैक्ट्रियाँ क्यों दिखायी नहीं देतीं, इनके मजदूरों की चीख–पुकार क्यों सुनायी नहीं देती और जिन्दा जल कर मर गये मजदूरों के लिए इनके मुँह से क्यों कुछ नहीं निकलता? ऐसा इसलिए कि लालाओं के चमकते सिक्कों ने इन्हे गाँधी जी का बन्दर बना दिया है। आज ये फैक्ट्रियों के मालिक कुछ भी करें, शासन–प्रशासन इनके सामने हाथ बाँधे और सिर झुकाए खड़ा है। मजदूर फैक्ट्रियों में थोड़ी सी मजदूरी के लिए 12 से 14 घण्टे काम करने को मजबूर किये जा रहे हैं। न उनकी नौकरी की कोई गारण्टी है और न ही जिन्दगी की। मजदूर हर समय किसी न किसी परेशानी से घिरा ही रहता है, उसके दिमाग में अपने परिवार की चिन्ताएँ घूमती रहती हैं। चुनाव लड़नेवाली पार्टियों का कोई नेता उसके साथ खड़ा नजर नहीं आता। जो दुनिया को बनाने में अपनी जान दे रहा है, क्या वह फिकरेबाजी, तानों और गालियों का हकदार बना रहेगा या उसे सम्मानजनक जिन्दगी का हक भी मिलेगा? यह हक और सम्मान उसे तभी मिल सकता है, जब उसका अपना संगठन हो, जो उसके सुख–दुख में उसके साथ खड़ा रहे और उसकी बेहतर जिन्दगी के लिये लगातार संघर्ष करता रहे। मजदूरों को अपने ऐसे संगठन बनाने ही होंगे, जिनका लक्ष्य एक शोषणमुक्त समाज का निर्माण हो। –– अभिषेक तिवारी    
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