फर्नीचर की गिल्ली बनानेवाले मजदूर

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

मेरठ में मलियाना के उत्तरी इलाके में ज्यादातर मजदूर अस्थाई और खुली मजदूरी करते हैं। यह मुख्य सड़क से 200–300 मीटर अन्दर की ओर है। रेलवे स्टेशन यहाँ से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ के रास्ते और नालियाँ गन्दी हैं। इलाके में हरदम चहल–पहल रहती है। यहाँ से गुुजरते हुए एक बुजुर्ग महिला सब्जी बेचती नजर आती है, 55 साल की दूसरी महिला गरम पकौड़े तलती दिखायी देती है। आगे बंगाली डॉक्टर की दुकान है, दूसरी तरफ मुर्गी के पंजांे के पकौड़े बेचनेवाले की दुकान। अण्डे की दुकान के बाहर बड़े अक्षरों में लिखा है, ‘‘यहाँ शराब पीना सख्त मना है।’’ जैसे–जैसे इलाके में आगे जाते हैं वैसे–वैसे गलियाँ सँकरी होती जाती है। इन गलियों मे दो लोग बड़ी मुश्किल से एक दूसरे को साइड देते निकल पाते हैं। साइकिल नहीं निकल सकती, मोटरसाइकिल की बात छोड़ ही दीजिए। ऐसी गलियाँ यहाँ सभी ओर हैं। इस इलाके की खास बात है कि यहाँ न पीने लायक पानी है, न रहने लायक जगह। एक छोटे से कमरे में 5 से 7 लोग रहते हैं। ज्यादातर मजदूर किरायेदार हैं। कोठरी का किराया उसकी साइज के हिसाब से 400 रुपये से 1500 रुपये तक है। कुछ मजदूर इस इलाके में ही अपना काम भी करते हैं। जैसे किसी का पूरा परिवार मिलकर पायदान बनाने का काम करता है। यहाँ एक प्राइवेट इण्टर कॉलेज भी है।

इस इलाके में बहुत से लोग एक विशेष प्रकार का काम करते दिखते हैं। वे लकड़ी की नुकीली सी कीलंे बनाते हैं। यह काम केवल आदमी ही नहीं करते बल्कि उनके साथ महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग भी इस काम को करते हैं।

हमने एक बुजुर्ग महिला से पूछा कि आप यह क्या कर रही हैं?

उन्होंने बड़े ही प्यार से मुस्कुराकर कहा कि बेटा, यह गिल्लियाँ है। जो इमारती लकड़ियों के फर्नीचर को जोड़ने के काम आती है।

यह सुनकर हमारी उत्सुकता और बढ़ी। फिर हमने पूछा कि कब से यह काम कर रही हैं?

उन्होंने जवाब दिया कि बहुत साल हो गये। उन्हें साल याद नहीं है। उनकी उम्र 55 साल होगी। उनके परिवार में 5 बड़े और 2 बच्चे हैं। उन्होंने बताया कि 15 रुपये इस काम का मिल जाता है। एक छोटी सी बाल्टी दिखाते हुए कहा कि एक बाल्टी को पूरा भर कर देने पर ठेकेदार हमें 15 रुपये देता है।

हमने पूछा कि आपने जिस ठेकेदार की बात की, वह कहाँ रहता है और वह गिल्लियों का तुरन्त पैसा देता है या बाद में?

उन्होंने हमें बताया कि ठेकेदार बाँस के टुकड़े देता है और ठोकने के लिए छोटा सा साँचा देता है। जिस पर बाँस के टुकड़े रखते हैं। डण्डे की मदद से एक हाथ से पकड़ कर उस साँचे के अन्दर मारते हैं, जिससे बाँस की गिल्लियाँ अन्दर चली जाती हंै और नीचे रखी बाल्टी में भरती रहती हंै। इलाके में 3 से 4 ठेकेदार आते हैं। उन्होंने आगे बताया कि अगर घर के सभी सदस्य यानी मेरी बिटिया, नाती, पोते और मेरी बहू भी मिलकर काम करें तो दिन भर में 150 रुपये से 200 रुपये तक कमा लेते हंै। इससे हमारा छोटा–मोटा खर्च, जैसे कि साग–सब्जी का इन्तजाम हो जाता है। बाकी का खर्च घर के बेटे और बुजुर्ग उठाते हैं। वे दिहाड़ी पर काम करते हैं। अगर काम न मिले तो वह भी इसमें ही लग जाते हैं और 100 से 200 रुपये और कमा लेते हैं।

हमने पूछा कि इस काम में वक्त–बेवक्त चोट भी लग जाती होगी?

उन्होंने हँसते हुए कहा कि हाँ, लगती ही है। यहाँ कोई भी गिल्लियाँ ठोकने वाला नहीं दिखेगा, जिसकी उँगलियों पर चोट के निशान न हों। चाहे वह बच्चा ही क्यों न हो। ठेकेदार चोट लगने पर कुछ नहीं देता है। वह क्या देगा? हमें अपना इलाज खुद ही करवाना पड़ता है।

हमने पूछा कि यहाँ कितने परिवार होंगे जो गिल्लियाँ ठोकने का काम करते है? क्या एक बाल्टी गिल्लियों की मजदूरी 15 रुपये हमेशा से ही तय थी?

उन्होंने कहा कि 50 से 60 परिवार होंगे जो यह काम करते हैं। बाल्टी की मजदूरी हमेशा से 15 रुपये नहीं थी। 2009 कि बात है, जब एक बाल्टी गिल्लियों की मजदूरी 9 रुपये हुआ करती थी। तब हम सब मिलकर ठेकेदार के पास गये थे। इसकी कीमत बढ़ाने की बात कही थी। शुरुआत में तो उसने आनाकानी की। हमने फिर और लोगों से बात की तो मोहल्ले के जो बुजुर्ग हैं वे बोले कि बात तो सही है। ऐसे तो काम नहीं चलेगा। लोगों ने ठेकेदार से अर्जी लगायी कि रुपये बढ़ाओ। ठेकेदार नहीं माना। फिर क्या था? मोहल्ले के जितने भी पुरुष और महिलाएँ थीं, कोई साइकिल लेकर तो कोई ठेला लेकर निकल पड़े। जितने लोग इलाके में यह काम करते थे, उनसे जाकर बोले कि आज के बाद कोई भी ठेकेदार से माल नहीं उठाएगा। जो भी माल उठाएगा उसके लिए अच्छा नहीं होगा। हम लोग उसकी शादी–विवाह और दूसरे समारोह में शामिल नहीं होंगे, यानी उनको समाज से अलग कर देंगे। उन्होंने आगे बताया कि उस समय लोगों से बातें मनवाने में इतनी मुश्किल नहीं हुआ करती थी। दो से तीन सप्ताह हमने काम रोक दिया और ठेकेदार को हमारी माँगंे माननी पड़ी। उसने फिर एक बाल्टी गिल्लियों की मजदूरी 9 रुपये से बढ़ाकर 12 रुपये कर दी। बाल्टी की मजदूरी आज 15 रुपये है, इसको ज्यादा समय नहीं हुआ है। आज से करीब 3 से 4 साल पहले, कुछ लोग ठेकेदार के पास बाल्टी की मजदूरी बढ़ाने के लिए गये थे। इस बार ठेकेदार ने ज्यादा आनाकानी नहीं की और 12 से 15 रुपये कर दिया क्योंकि उसे समझ मे आ चुका था कि पिछली बार हमने क्या किया था।

हमने पूछा कि क्या आपके पास से गिल्लियाँ सीधे ठेकेदार के पास जाती हैं?

उन्होंने कहा कि नहीं, इसके आगे और भी काम हैं जैसे–– गिल्लियों को नुकीला बनाकर पैकेट में भरने का काम। यह काम अलग मजदूर करते हैं। हमने पूछा कि इसके बारे में हमें कौन जानकारी दे सकता है? उन्होंने हमें एक घर का पता दिया।

हम उस पते पर गये जहाँ गुल्लियों को नुकीला करके पैकेट में भरने का काम होता है। वहाँ हमें एक महिला मिलीं। हमने उनसे पूछा कि आपके परिवार में कितने सदस्य है और उनमें से कितने लोग यह काम करते हैं?

उन्होंने बताया कि हम संयुक्त परिवार में रहते हैं। हमारे परिवार में कुल 9 बड़े और 11 बच्चे हैं। जिनमें से 2 महिलाएँ यह काम करती हैं।

हमने उनसे उनकी और दूसरी महिला की उम्र पूछी?

उन्होंने बताया कि वे दोनों 25 वर्ष की हैं। वे दो साल से और दूसरी महिला तीन साल से यह काम कर रही हैं। उन्होंने हँसते हुए आगे कहा कि वे मेंहदी लगाना सीखना चाहती थीं, लेकिन शादी होने के बाद घर के काम और बच्चों से फुर्सत नहीं मिली।

हमने पूछा कि पैकेट बनाने का आपको कितने रुपये मिलते हैं?

उन्होंने हमें बताया कि उनको एक पैकेट के डेढ़ रुपये मिलते हैं और वह दिन भर में 50 पैकेट बनाकर 70 से 80 रुपये कमा लेती हैं। 3 बाल्टी में 80 पैकेट बन जाते हैं।

हमने उनसे यह भी पूछा कि जो औजार आप ठेकेदार से लेती हंै उसका वह कुछ पैसे जमा करवाता है क्या?

उन्होंने बताया कि नहीं, वह हमसे पैसे तो नहीं लेता, लेकिन कभी काम के पूरे पैसे भी नहीं देता। कुछ न कुछ पैसे अपने पास रख लेता है। पैसे कैसे निकलवाते हैं? उन्होंने बताया कि हम काम बन्द कर देते हैं और औजार वापस कर देते हैं। अगर ठेकेदार पैसे नहीं देता है तो हम दूसरे ठेकेदार से काम ले लेते हैं। हम उससे काम तब तक नहीं लेते जब तक वह हमारा पिछला हिसाब नहीं कर देता है।

हमने उनसे ठेकेदार का पता लिया और उससे मिलने गये।

ठेकेदार का घर मजदूरों के घरों से औसतन थोड़ी अच्छी स्थिति में है। वहाँ हमने गिल्लियों से भरे कई कट्टेे देखे। लोग आकर अपने–अपने पैकेट जमा कर रहे थे। पैकेटों की रेली लगती जा रही थी। ठेकेदार की बेटी 12 साल की है जो सातवीं कक्षा में पढ़ती है। वह पैकेट जमा करनेवाले लोगों का नाम एक कॉपी में लिख रही थी।

ठेकेदार से दुआ–सलाम करने के बाद हमने उनसे बातचीत शुरू की तो पता चला कि उनके परिवार में चार लोग हैं–– ठेकेदार, उसकी पत्नी, बेटी और बेटा। वह 35 वर्ष के हंै और बहुत कम पढ़े–लिखे हैं। उनका लड़का 12वीं में पढ़ता है। वह यह काम बहुत लम्बे समय से कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि हमने ही यह काम यहाँ शुरू किया था। 15 से 20 साल हो गये होंगे। वह सिर हिलाते हुये बोले कि मुझे तारीख याद नहीं।

हमने उनसे पूछा कि इन पैकेटों का क्या हिसाब हैं?

उन्होंने बताया कि राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कई इलाको से उनके पास डिमाण्ड आती हैं। जितनी डिमाण्ड आती हैं उस हिसाब से हम मजदूरों को काम दे देते हैं। उनको बाँस, गिल्लियाँ ठोकने वाला साँचा वगैरह–वगैरह।

हमने पूछा कि एक बाँस कितने का पड़ता हैं?

उन्होंने जवाब दिया कि 22 से लेकर 25 रुपये तक। बाँस की कीमत  उसकी लम्बाई पर निर्भर करती है। औसतन एक 25 फुट के बाँस में 4 बाल्टी गिल्लियाँ बन जाती हैं और तीन बाल्टी गिल्लियों से 80 पैकेट तक बनते हैं।

हमने पूछा कि इन पैकेटों को बेचने का क्या हिसाब है?

उन्होंने बताया कि यह तो बड़ा कठिन है बताना। मैं अकेला नहीं हूँ तीन–चार ठेकेदार और हैं जो यही काम करते हैं। हम लोग बहुत कोशिश करते हैं कि ठेकेदारों के बीच एकता बन जाये और यह तय कर लें कि कितने रुपये में एक पैकेट बेचेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो पाता। मैं अगर 15 रुपये में एक पैकेट बेचता हूँ, इस पर कोई 14 में या 12 रुपये में बेचना शुरू कर देता है। हम सबकी क्वालिटी में कोई ज्यादा अन्तर नहीं है। जो जितना सस्ता बेचेगा उसका उतना माल बिकेगा। एक पैकेट औसतन 12 से 15 रुपये के बीच बिकता है।

हमने उनसे पूछा कि लॉकडाउन का काम पर क्या प्रभाव पड़ा है? उन्होंने बताया कि लॉकडाउन में स्थिति बहुत खराब हो गयी है। जितना कमाया था उतना खा गये हैं। वह बार–बार बोल रहे थे कि मेरठ का लॉकडाउन न खुले, लेकिन दिल्ली का खुल जाना चाहिए क्योंकि हमारा सारा काम दिल्ली से चलता है।

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