पूँजीपति मजदूरों का श्रम कैसे चुराता है?
हम जानते हैं कि दुनिया भर की सारी निर्मित सम्पत्ति जैसे–– मकान, कपड़ा, घर के सारे सामान, आदि उन्हें मजदूरों ने ही बनाया है। जिस सड़क पर हम चलते हैं, जो सामान दुकानों में बिकते हैं, सभी को मजदूरों ने ही बनाया है। लेकिन मालिक या पूँजीपति मजदूरों के द्वारा बनाये गये सामान से उन्हें बेदखल कर देता है। मजदूरों से उनका हक छीन लेता है। पूँजीपति वर्ग मजदूरों के श्रम की चोरी करके ही अमीर बनता है।
इन बातों को गहराई से समझते हैं। आइये, देखते हैं कि मजदूरों के बनाये सामानों का उत्पादन कैसे होता है? आज की व्यवस्था में बाजार के लिए सबसे जरूरी चीज है–– माल। माल क्या है? मजदूर मेहनत करके जो सामान पैदा करते हैं, वे बाजार में जाकर बिकते हैं, इसलिए उसे माल कहते हैं। यानी जो भी चीज बाजार में बिकती है–– वह सब माल है। जैसे–– मोबाइल, बर्तन, साइकिल, किताब, पेन–––– दुकानों पर बिकने के लिए सजाकर रखे गये सारे सामान माल हैं। पैसे से भी महत्वपूर्ण चीज ‘माल’ है। क्यों? क्योंकि पैसा हम खा नहीं सकते, ओढ़ नहीं सकते, उस पर बैठ या चल नहीं सकते। पैसा तो खरीदने–बेचने का जरिया है। तरह–तरह के जितने भी माल हैं–– हम उनका कोई न कोई इस्तेमाल जरूर करते हैं। बाजार में कोई भी ऐसा सामान नहीं बिक सकता, जो किसी के इस्तेमाल का न हो। कोई यह सवाल पूछ सकता है कि बिजली से हमारे बल्ब जलते हैं और पंखा–टीवी चलता है। वह तार के जरिये हमारे पास पहुँचती है। क्या आँख से दिखाई न देने वाली बिजली भी माल है। हाँ। बिजली भी माल है। उसे भी बिजली विभाग के मजदूरों ने पैदा किया है और उसे खरीदने के लिए हमें बिल देना पड़ता है। सभी तरह के मालों को मजदूर ही बनाते हैं और पूँजीपति उन मालों को बाजार में बेचकर मुनाफा कमाते हैं।
दुनिया का सबसे खतरनाक शब्द क्या है? आप बताओ। आप में से कुछ लोग मौत को सबसे खतरनाक बतायेंगे। जो बेचारे प्यार में धोखा खा चुके हैं, वे धोखे को सबसे खतरनाक बतायेंगे। इसी तरह कुछ लोग गुलामी को तो कुछ बेइज्जती को खतरनाक बतायेंगे। लेकिन एक ऐसा शब्द है, जिसमें ये सारी चीजें आ जायेंगी और वह इन सबसे भी खतरनाक है। वह शब्द है–– मुनाफा। कैसे यह सबसे खतरनाक शब्द है? यह मैं आपको बाद में बताऊँगा। सबसे पहले मुनाफा कहाँ से पैदा होता है, उसे बताता हूँ। मजदूर जो सामान बनाता है, पूँजीपति उसे बेचकर ही मुनाफा कमाता है। यूँ समझें, मालिक ने सामान बनाने के लिए 100 रुपये खर्च किये, और सामान को 150 रुपये में बेच दिया तो उसे कुल 50 रुपये का मुनाफा हुआ। मुनाफा मजदूरों की मेहनत से पैदा होता है। पूँजीपति के लिए मुनाफा ही सबकुछ है। यह उसका ईश्वर–अल्ला, पीर–पैगम्बर और देवी–देवता सब है। वह रोज उसकी पूजा करता है, इबादत करता है।
पूँजीपति फैक्ट्री चलाता है, क्योंकि उसे मुनाफा चाहिए। लेकिन उसका मुनाफा बहुत शराफत से पैदा नहीं होता। वह कच्चे माल के लिए लोहे–कोयले की खदान और लकड़ी के लिए जंगल पर कब्जा जमा लेता है। जैसे हमारे देश में अम्बानी ने तेल के कुँओं पर, अडानी और रेड्डी भाइयों ने कोयले पर तथा पास्को जैसी विदेशी कम्पनी ने अल्युमिनियम के पहाड़ पर कब्जा कर लिया है। यह कब्जा किसकी मदद से किया गया है? सरकार की मदद से। इसे ही भ्रष्टाचार कहते हैं। पूँजीपति सरकार से मिलकर कच्चे माल को लूटने के लिए अपने मन–माफिक कानून बनवाता है। वह मुनाफे के लिए जंगल कटवाता है, पहाड़ उजाड़ देता है। नदियों में फैक्ट्री का गन्दा कचरा बहाता है। फैक्ट्री के धुएँ से हवा को दूषित करता है। इन सबसे जल, जमीन और हवा इतनी गन्दी हो जाती है, जिससे हर साल केवल भारत में लाखों लोग बीमार होकर मर जाते हैं। कैंसर, टीवी, दमा, मलेरिया, और अब कोरोना महामारी–––– आने वाली पीढ़ी के लिए पूँजीपति क्या दे रहे हैं? जलती धरती, कचरे से भरी नदियाँ और जहरीली हवा। पूँजीपति यही नहीं रुकता, वह मुनाफे के लिए हथियार बनवाता है, युद्ध करवाता है, जिससे लाखों माँओं की गोद सूनी हो जाती हैं और औरतों के सुहाग उजड़ जाते हैं। पिछले सौ सालों में सैकड़ों युद्ध को मिला दें तो इनमें करोड़ों लोग मारे जा चुके हैं। वे युु( किसने करवाये? पूँजीपतियों ने मुनाफे के लिए करवाये। क्या एक मजदूर चाहेगा कि युु( हो? युु( से मजदूरों को क्या लाभ होगा? मुनाफा मजदूरों के खून–पसीने से निचोड़ा जाता है, जो हमारे समाज के लिए तबाही और बर्बादी लाता है। बताइए, है न मुनाफा सबसे खतरनाक शब्द। अंत में, मुख्य बात यह है कि मुनाफा ही पूँजीपति को एक इनसान से एक जल्लाद में बदल देता है। वह समाज का दुश्मन बन जाता है। वह मजदूरों का भी दुश्मन बन जाता है।
क्या पूँजीपति मजदूरों की भलाई के लिए फैक्ट्री लगाता है? नहीं, वह मुनाफा कमाकर अपनी तिजोरी भरने के लिए फैक्ट्री लगता है, जिससे वह इन पैसों से नेताओं को खरीद ले, जज–कलेक्टर और पुलिस को खरीदकर अपनी ओर मिला ले, नयी फैक्ट्री लगाये और अधिक मजदूरों को काम पर रखे। उनका और अधिक शोषण करके और अमीर बनता चला जाए। सब पर अपनी अमीरी का रोब दिखाये। कुछ लोग कहते हैं कि मुनाफा नहीं मिलेगा तो काम कैसे होगा? वे आगे कहते हैं कि सारा काम मुनाफे के लिए ही तो होता है। यह एकदम गलत और झूठी बात है। इस तरह की बातें पूँजीपतियों ने ही फैलायी हैं, जिससे उनके ‘मुनाफे’ पर कोई ऊँगली न उठाये। क्या माँ अपने बच्चे का लालन–पालन मुनाफे के लिए करती है? क्या एक कवि मुनाफे के लिए कविता लिखता है? क्या कोरोना के समय लॉकडाउन में मजदूरों की सहायता करनेवाले साथियों ने मुनाफे की लालच में दर–दर भटकते हुए लोगों के घर–घर राशन पहुँचाया था? इन सभी का जवाब है–– ‘नहीं’। इसलिए यह बात साफ हो जाती है कि किसी भी काम के लिए मुनाफा जरूरी नहीं है, इसे हमारे ऊपर थोप दिया गया है, जिससे अमीरों की जेबें भरती रहें और गरीब और गरीब होते चले जायें।
अब तक हमने दो शब्दों–– माल और मुनाफा का महत्व समझ लिया। बाजार में माल बिकता है और पूँजीपति मुनाफा कमाता है। मुनाफा मजदूरों के खून और पसीने से पैदा होता है और बदले में समाज को कीचड़, गन्दगी, बीमारी, गरीबी और मौत देता है। अब आइये देखें, श्रम और श्रमशक्ति का इससे क्या रिश्ता है? अगर आप जमीन की मिट्टी खोदकर दुकान में रखकर बेचो, तो क्या कोई खरीदेगा? नहीं। (नींव भरने के लिए ट्रैक्टर–ट्रोली से मिट्टी बेची–खरीदी जाती है, वह अलग बात है।) लेकिन उसी मिट्टी की ईंट बनाकर बेचो, तो जो भी घर बनाने वाले हैं, वे सभी खरीद लेते हैं। यहाँ ईंट माल है, ईंट–भट्ठे के मालिक को पूँजीपति कहेंगे। ईंट बनाने में तीन चीजें लगी हैं––कच्चा माल, मशीन और मजदूर का श्रम। कच्चा माल यानी मिट्टी, पानी, कोयला। अब अगर मालिक सबका सही से भुगतान कर दे और खुद अपनी भी मजदूरी ले ले, तो उसे कोई मुनाफा नहीं होगा। जो उसके पास बचेगा, वह उसकी कमाई या मजदूरी होगी। लेकिन वह मजदूरों को पूरी मजदूरी नहीं देता, उनकी मजदूरी का एक हिस्सा खुद मार लेता है। मजदूरों के श्रम की चोरी ही वह मुनाफे के रूप में वसूल कर लेता है।
पूँजीपति मजदूरों के श्रम की चोरी कैसे कर लेता है? पूँजीपति मजदूरों को नौकरी पर रखकर उसके श्रम को चुराता है। अगर मजदूरों को रखने से पूँजीपति को कोई फायदा न हो तो वह उसे नौकरी पर क्यों रखेगा? मजदूर मजबूरी में पूँजीपति की गुलामी करता है क्योंकि पूँजीपति के पास उत्पादन के साधन होते हैं जैसे–– ईंट–भट्ठा, फैक्ट्री, कॉलेज, पेट्रोल पंप, मशीन, आदि। यही सब चीजें उसकी पूँजी हैं। वह पूँजी का मालिक है, इसलिए उसे पूँजीपति कहते हैं। अपनी पूँजी के दम पर वह मजदूर को काम पर रखता है। लेकिन मजदूर के पास उसकी श्रम–शक्ति के अलावा कुछ नहीं होता, जो उसके बाजुओं की ताकत में भरी रहती है। इसलिए चन्द पैसों के बदले मजदूर अपने मालिक को अपनी श्रम–शक्ति बेचता है। यानी मजदूर अपनी श्रम–शक्ति या अपने बाजुओं की ताकत का भी स्वामी नहीं रह जाता है। उसके पास अपना जो सबसे कीमती चीज है, उसे भी वह बेच देता है। वह उसे छोटे–छोटे टुकड़ों में बेचता है। वह घंटे, दिन, महीने और साल के हिसाब से बेचता है। जितने लम्बे समय के लिए बेचता है, उतनी लम्बी गुलामी करनी पड़ती है।
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि मजदूर खुद को नहीं बेचता है बल्कि वह अपनी श्रम–शक्ति बेचता है और मालिक उसकी श्रम–शक्ति खरीदता है। यानी श्रम–शक्ति भी माल बन गयी है जो खरीदी बेची जा रही है। यह मजदूर के लिए सबसे खराब स्थिति है। पुराने जमाने में गुलाम लोगों को खरीदा–बेचा जाता था और उस समय लोग किसी एक मालिक के गुलाम होते थे। (जैसे–– रोम में गुलामी की व्यवस्था और स्पार्टकस का विद्रोह) लेकिन अब ऐसा नहीं होता है। अब मजदूरों की मेहनत को ही खरीदा–बेचा जाता है, मजदूर को नहीं। इसलिए मजदूर किसी एक मालिक का गुलाम नहीं होता। बल्कि पूरी व्यवस्था का गुलाम होता है। ऐसी व्यवस्था, जिसमें मजदूरों को गुलाम बनाया जाता है, उनकी श्रमशक्ति को खरीदा–बेचा जाता है, और माल बेचकर पूँजीपति मुनाफा कमाता है, उसे मुनाफाखोर पूँजीवादी व्यवस्था कहते हैं। क्या हमारे देश में ऐसा नहीं होता है? अब भारत में चारों ओर ऐसा ही हो रहा है, इसलिए भारतीय समाज पूँजीवादी है। भारत एक पूँजीवादी देश है। किसी भी पूँजीवादी देश की तरह भारत में हर जगह मजदूरों का शोषण हो रहा है, मजदूरों को कोई खास आजादी नहीं होती है। उन्हें हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है और मजदूरी की मामूली रकम से किसी तरह दिन काटना पड़ता है।
मजदूरों के पास बेचने के लिए एक ही माल होता है–– उसकी अपनी श्रम–शक्ति। लेकिन मालिक मजदूरों की श्रम–शक्ति की कीमत बहुत कम लगाता है। उसकी पूरी कोशिश होती है कि मजदूर को कम से कम देना पड़े। वह कई उपाय करके इसे इतना कम कर देता है कि मजदूर मुश्किल से जिन्दा रह सके। मान लिया कि एक मजदूर दिन भर में 1000 रुपये का सामान पैदा करता है और उसे 250 रुपये मिलते हैं। यानी मालिक 750 रुपये खुद रख लेता है। इसे इस तरह समझते हैं, दिन भर के 8 घंटे में मजदूर मालिक के लिए 6 घंटे और खुद के लिए 2 घंटे खटता है। 750 रुपये या 6 घंटे ही मजदूरों का शोषण है। मालिक काम की रफ्तार बढ़ाकर (चार्ली चैपलिन की फिल्म ‘मॉडर्न टाइम्स’ देखिए।), काम के घंटे बढ़ाकर और तकनीक के जरिये उत्पादकता बढ़ाकर (उदाहरण–– कपड़े की हथकरघे और आधुनिक मशीन पर बुनाई का फर्क) मजदूरों के शोषण को बढ़ाता जाता है। इस तरह मजदूर धीरे–धीरे और बदहाली–तंगहाली का शिकार बनता जाता है।
हमने देखा कि मजदूर किसी एक पूँजीपति का गुलाम नहीं होता, बल्कि वह पूरी पूँजीवादी व्यवस्था का गुलाम होता है क्योंकि वह चाहे किसी शहर में, किसी फैक्ट्री में, कहीं भी काम करे, उसे गुलामी करनी ही पड़ती है। इसलिए अगर मजदूर अपनी गुलामी से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे गुलाम बनानेवाली पूँजीवादी व्यवस्था को बदलना होगा। उसे इस अन्यायपूर्ण, खून पीनेवाली और दुनिया को नरक बनानेवाली व्यवस्था को बदलकर एक बेहतर व्यवस्था की नींव रखनी होगी जो मुनाफे पर न टिकी हो, बल्कि वह सभी इनसानों के कल्याण के लिए चलायी जाये। तभी मजदूर को शोषण और गुलामी से मुक्ति मिलेगी। यही आज के मजदूर वर्ग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।