सिलक्यारा सुरंग हादसे में फँसे 41 मजदूर
12 नवम्बर, दिवाली की रात। उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी जिले में चल रहे चारधाम सड़क परियोजना में सिलक्यारा से बड़कोट तक सुरंग बनाने के दौरान पहाड़ धँसने से 41 मजदूर सुरंग के अन्दर फँस गये। सरकार और प्रशासन ने पहले तो इस मामले को बहुत हल्के में लिया क्योंकि उन्हें मजदूरों की कोई परवाह नहीं थी। लेकिन बाद में जब यह मामला तूल पकड़ने लगा, सरकार और प्रशासन से सवाल किये जाने लगे तब जाकर वे हरकत में आये।
देशभर से प्रगतिशील लोगों और मजदूर संगठनों ने सुरंग के अन्दर फँसे 41 मजदूरों को बचाने के लिए जोर लगाया। उन्होंने सरकार और प्रशासन पर दवाब बनाया और साथ ही चारधाम सड़क परियोजना पर भी सवाल खड़े किये। लेकिन मजदूरों की जान से खेलने वाले देश के शासक और उनके मन्त्री–सन्त्री यहाँ भी बाज नहीं आये। वे इस आपदा में भी अवसर तलाश रहे थे और पूरा बिकाऊ मीडिया तंत्र उनकी सेवा में लगा हुआ था।
41 मजदूर और उन पर आश्रित 41 परिवार यह आस लगाये हुए थे कि किसी भी तरह वे जिन्दा सुरंग से बाहर निकल आये। लेकिन आपदा को अवसर में बदल कर बिकाऊ मीडिया ने इसे पूरे देश के सामने ऐसे पेश किया कि मानो देश के प्रधानमन्त्री, प्रदेश के मुख्य मुख्यमन्त्री, उनके चेले–चपाटे और बिकाऊ गोदी मीडिया ने ही सुरंग में घुसकर मजदूरों को वहाँ से निकाला हो। हद तो तब हो गयी जब इनके नेता यह बोलने लगे कि फ्मोदी ने कर दिखाया”। वहीं बचाव कार्य में दिन–रात, पूरी मेहनत और लगन से लगे हुए मजदूरों, छोटे कर्मचारियों और मुस्लिम समुदाय के रैट माईनर्स (जिस मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने से ये कभी बाज नहीं आते) को पर्दे के पीछे धकेल दिया, जिन्होंने अपनी मेहनत और चन्द औजारों की मदद से सुरंग में फँसे हुए मजदूरों को 17 दिन बाद बाहर निकाला।
यह चारधाम सड़क परियोजना प्रधानमन्त्री की ड्रीम परियोजना है जिसका गोदी मीडिया द्वारा खूब प्रचार–प्रसार किया जा रहा है। इसे 2016 में “आल वेदर रोड” के नाम से शुरू किया गया था, बाद में इसका नाम बदलकर फ्चारधाम सड़क परियोजना” कर दिया गया। इस परियोजना से हो रहे नुकसान की भयावहता को देखते हुए स्थानीय लोगों, पर्यावरणविदों, भू–वैज्ञानिकों, प्रगतिशील लोगों और जनता के हित में काम कर रही कई संस्थाओं ने इसका पुरजोर विरोध किया। स्थानीय लोगों ने बताया कि इसके चलते हमारा रोजगार और आय के साधन खत्म हो जायेंगे, उन्होंने बताया कि यात्रा आज से नहीं, सदियों से जारी है। इस यात्रा का जो रास्ता पहले से बना हुआ है, उस पर यात्रियों के ठहरने के लिए पड़ाव बने हुए हैं, जहाँ यात्री रुकते हैं और इसी से स्थानीय लोगों का रोजगार चलता है। यह सब खत्म हो जायेगा। ऐसे में बेरोजगारी के चलते पलायन की मार झेल रहे स्थानीय लोगों की मुसीबतें और बढ़ जायेंगी। उन लोगों ने यह भी बताया कि यह भूकम्प प्रभावित क्षेत्र है यहाँ कम तीव्रता वाले भूकम्प अक्सर आते हैं। अभी कुछ दिन पहले आये भूकम्प की वजह से इस सुरंग में दरारें पड़ गयी हैं। इसकी जानकारी सरकार, प्रशासन और सुरंग बनाने वाली कम्पनी को भी थी, लेकिन फिर भी काम नहीं रोका गया। इससे साफ पता चलता है कि इन्हें मजदूरों की जान और पहाड़ की तबाही की कोई परवाह नहीं है। वहीं पर्यावरणविदों और भू–वैज्ञानिकों ने भी सरकार को बार–बार चेतावनी दी है कि पूरा हिमालय कच्चा पहाड़ है, यहाँ की मिट्टी भुरभुरी है। इससे छेड़छाड़ के भयानक नतीजे सामने आयेंगे और हुआ भी वैसा ही।
2016 में शुरू हुए इस परियोजना में अब तक भारी नुकसान हुआ है। इसमें 150 से ज्यादा जगहों पर भूस्खलन और भूधँसाव हुए, जिसमें जान–माल का भारी नुकसान हुआ। इसी साल जोशीमठ में हुआ भूधँसाव पहाड़ छेड़छाड़ का ही नतीजा है, जिससे पूरा जोशीमठ शहर बुरी तरह प्रभावित हुआ। इससे पहले 2013 मेंे आयी केदारनाथ आपदा और 2020 में नन्दादेवी गिलेशियर (चमौली) के पिघलने से हुई तबाही को अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं। सिर्फ इतना ही नहीं इन परियोजनाओं के चलते पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान हो रहा है। इसका नतीजा पूरे देश की जनता को भुगतना पड़ रहा है। उसके बारे में भी पर्यावरणविदों और भू–वैज्ञानिकों ने सरकार को बार–बार चेताया है। वे अपनी बात को उच्चतम न्यायालय तक लेकर गये जिसके बाद एक समिति का गठन किया गया। लेकिन यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि सरकार देश की सर्वोपरी न्याय संस्थान को अपनी जेब में रखती है और अपनी मर्जी के मुताबिक फैसले करवाती है। उच्चतम न्यायालय ने चारधाम सड़क परियोजना के लिए जो समिति गठित की थी उसमें ज्यादातर सरकार के ही नुमाइन्दे थे। जाहिर है कि नतीजा सरकार के पक्ष में ही निकलना था, और हुआ भी वैसा ही।
आखिर इस परियोजना में ऐसी क्या खास बात है जिसके कारण प्रधानमन्त्री किसी भी कीमत पर अपनी इस ड्रीम परियोजना को पास करवाना चाहते थे? क्योंकि चारधाम परियोजना के नाम पर एक तरफ वे अपनी पार्टी के स्वार्थ में हिन्दू धार्मिक तीर्थस्थलों का इस्तेमाल वोटबैंक की राजनीति में कर रहे हैं, दूसरी तरफ उनकी पार्टी को चन्दा देने वाले बड़े–बड़े कार्पोरेट घरानों के स्वार्थ पूरे हो रहे हैं। सिर्फ उत्तराखण्ड और हिमालयी रेंज ही नहीं बल्कि वे पूरे देश के प्राकृतिक संसाधनों, पहाड़, जल, जंगल, जमीन को बड़ी–बड़ी कम्पनियों और कार्पोरेट घरानों को बेच कर उन्हें लूट की खुली छूट दे रहे हैं।
चारधाम सड़क परियोजना पर इतने विरोध और नुकसान के बाद भी इतनी तेजी से काम क्यों हो रहा है। इसके पीछे एक कारण और भी है। इस परियोजना के तहत पूरे उत्तराखण्ड में करीब 900 किलोमीटर सड़क का चौड़ीकरण और सुरंगों का निर्माण किया जाना है जिसके लिए 12 हजार करोड़ रुपये का बजट अनुमानित है। इसी बजट पर देश के सड़क परिवहन मन्त्री और निर्माण क्षेत्र में लगी ‘नवयुग इंजीनियर्स कम्पनी लीमिटेड’ जैसी निजी कम्पनी के मालिक अपनी गि( जैसी नजर गड़ाये हुए हैं।
पूरे देश में पर्यावरण नियमों को ताक पर रखकर सड़कों और पुलों का बेरोकटोक जाल बिछाया जा रहा है। नदियों को सुखाया जा रहा है, पहाड़ों, जंगलों को काटा जा रहा है, खेतों को उजाड़ कर उपजाऊ भूमि को बंजर बनाया जा रहा है। विकास के नाम पर हो रहे इस विनाश के लिए अरबों–खरबों रुपये बहाया जाता है, जो हमारे देश की कुल आय का बहुत बड़ा हिस्सा है। इसी बजट पर सरकार में बैठे मन्त्री और सड़क निर्माण में लगी कम्पनियाँ लार टपका रही हैं। सरकार इन योजनाओं में रोजगार देने की ढकोसलेबाजी करती है जबकि हकीकत इससे बिलकुल इतर होती है।
सरकार ने इस योजना को लागू करने का काम सरकारी संस्थाओं एनएचआइडीसीएल, यूकेपीडबल्यूडी, बीआरओ, एनएचएआइ को सौंपा था। इन संस्थाओं ने बजट से अपना हिस्सा निकाल कर आगे इसे निजी कम्पनी को सौंप दिया। इन कम्पनी मालिकों की पहले ही सरकार के मन्त्रियों के साथ साँठ–गाँठ है। ये निजी कम्पनी बचे हुए बजट का ज्यादातर हिस्सा खुद हड़पकर इस काम को ठेकेदारों को सौंप देती है और अन्त में इन ठेकेदारों के नीचे भी छोटे–छोटे ठेकेदार होते हैं जो खुद दिहाड़ी मजदूर की तरह काम करते हैं जिन्हें दिहाड़ी के बराबर ही कमीशन पर रखा जाता है। ऐसे छोटे–छोटे ठेकेदारों का पूरे देश में जाल बिछा हुआ है, जो इस तरह की निर्माण परियोजाओं के लिए मजदूर जुटाने का काम करते हैं। ये छोटे–छोटे ठेकेदार कहीं पंजीकृत नहीं होते और न ही कम्पनी के साथ इनका कोई लिखित अनुबन्ध होता है। यही प्रक्रिया ये अपने नीचे काम करने वाले मजदूरों के साथ अपनाते हैं। ऐसा जानबूझ किया जाता है और ऊपर से नीचे तक सभी को इस बात की जानकारी होती है। इसका सीधा फायदा कम्पनी मालिकों और सरकार को होता है।
कोई दुर्घटना होने पर सरकार, कम्पनी मालिक अपना पल्ला झाड़ लेते हैं और ठेकेदार यह कह कर बच जाता है कि इस नाम का कोई मजदूर यहाँ काम ही नहीं करता। इसी साल )षिकेश से कर्णप्रयाग रेल परियोजना में नवयुग इजीनियर्स कम्पनी लिमिटेड की लापरवाही के चलते 20 लोगों की मौत हो गयी जिनमें वहाँ काम कर रहे 10 मजदूर थे। कम्पनी की पहुँच इतनी अधिक है कि उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। नामचारे के लिए दो स्थानीय ठेकेदारों पर मुकदमा दर्ज हुआ लेकिन अभी तक इसका कोई नतीजा नहीं निकला है।
निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले सभी मजदूरों को दूरदराज के इलाकों से लाया जाता है, खासकर बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, झारखण्ड, पूर्वी उत्तरप्रदेश और देश के उन राज्यों से जहाँ गरीबी, बेरोगारी ज्यादा है। इन मजदूरों से तमाम श्रम कानूनों को ताक पर रख कर बहुत कम दिहाड़ी में 12 से 16 घण्टे, महीने में तीस दिन और बेहद जोखिम भरे हालात में काम करवाया जाता है। सरकार, कम्पनी मालिक और ठेकेदार सुरक्षा उपकरण तक मुहैया नहीं कराते, क्योंकि सुरक्षा उपकरण बहुत महँगे हैं। इतने महँगे कि मजदूरों की जान उनसे सस्ती है। इन जानलेवा हालात में आये दिन मजदूरों के साथ दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। इनमें अक्सर मजदूरों की मौत हो जाती है, शरीर के अंग कट जाते हैं और वे जिन्दगी भर काम करने लायक नहीं रह जाते।
उत्तरकाशी सुरंग हादसे से यह साबित हो चुका है कि एक तरफ देश के रहनुमाओं के पास ऐसी तकनीक मौजूद है कि वे चाँद पर पहुँच गये हैं जहाँ देश के धन्नासेठ जमीन खरीदने का सपना देख रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ हमारे देश में इन रहनुमाओं के पास ऐसी कोई तकनीक नहीं है जो सिर्फ 130 मीटर गहरी सुरंग से मजदूरों को बाहर निकाल सके या फिर इनकी नीयत में ही खोट है। आखिरकार चूहे की तरह बिल खोदकर कोयला निकालने वाले रैट माइनर मजदूरों ने ही वह कमाल कर दिखाया और अपने साथी मजदूरों को सुरंग से बाहर निकाला।