टेनिस बॉल बनाने वाले मजदूर का सर्वे

01 Oct 2022 • मजदूर एकता पुस्तिका- ४ • 4 बार पढ़ा गया

आपने बच्चों को बॉल (गेंद) से तो खेलते देखा ही होगा, वे या तो क्रिकेट की या फिर टेनिस की बॉल से खेलते हैं। टेनिस की बाल से खेलकर कई खिलाड़ी अपने साथ ही देश का भी नाम रोशन करते हैं। उनके मैच को देखते हुए शायद ही किसी के मन में उन बॉल को बनानेवालों की जिन्दगी का खयाल आता हो। क्या आपने कभी सोचा है कि ये बॉल आखिर बनती कैसे होगी? इस विषय पर हमें सर्वे करके जानकारी हासिल करने का मौका मिला। इसके बाद हमें इन सवालों के जवाब मिल गये कि आखिर ये बॉल बनायी कैसे जाती हैं? बॉल बनाने वाले मजदूरों की हालत कैसी होती है? वे कैसी जिन्दगी जीते हैं?

मेरठ की झुग्गी–झोपड़ियों और किराये पर रहनेवाले मजदूर पीस रेट पर बॉल बनाते हैं। हमने जिन बॉल बनानेवाले मजदूरों का सर्वे किया, वे मेरठ के मलियाना क्षेत्र के उत्तर में रहते हैं। जहाँ ज्यादातर मजदूर अस्थायी और खुली मजदूरी करते हैं। यह मुख्य सड़क से दो से तीन सौ मीटर अन्दर और रेलवे स्टेशन से दो किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ न तो कोई प्राथमिक स्कूल है और न ही कोई चिकित्सा परामर्श केन्द्र। यहाँ पर रहने वाले लोग पीलिया, टीवी तथा पेट की विभिन्न बीमारियों से पीड़ित हैं। एक सर्वे के दौरान यह भी पता चला कि बच्चे से लेकर बूढ़े तक ज्यादातर लोगों को खुजली, खासी–बुखार, एलर्जी जैसी बीमारियाँ हैं और कम उम्र के ज्यादातर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।

इस इलाके में कई मजदूर बॉल बनाने का काम करते हैं। वहाँ लगभग बीस घर हैं जो यह काम करते हैं। एक लड़का जो यह काम बचपन से कर रहा था और उसे यह काम करते हुए दस साल हो चुके हैं। हम उसके घर गये। उसका घर एक पतली–सी तंग गली में था जहाँ न तो रोशनी आने की जगह थी और न ही हवा आने की। लगभग पैतालिस गज का उसका मकान था। जिसमें न तो पक्की फर्श थी और न ही दीवारों पर प्लास्टर और पुताई थी। घर में बहुत सीमित समान के साथ कुल छ: सदस्य रहते हैं। परिवार में उसके माता–पिता, पाँच भाई और एक छोटी बहन है। शादी–शुदा भाई अलग रहते हैं। पिता दिहाड़ी मजदूरी करते हैं और एक भाई जिसकी उम्र बत्तीस साल है, वह पीतल पॉलिश का काम करता है और बाकी भाइयों में कोई ट्रैक्टर का काम करता है तो कोई दिहाड़ी मजदूरी करता है। माँ और बहन आलू गोदाम में काम करती हैं। सभी सदस्यों की हाड़–तोड़ मेहनत करने के बाद भी घर की हालत बहुत खराब है। इसी के चलते सभी भाई–बहन हाई स्कूल तक भी नहीं पढ़ सके। उससे यह पूछने पर कि उसने आगे पढ़ाई क्यों नहीं की? उसका जवाब था कि बचपन में पढ़ने का शौक था लेकिन काम के चलते पढ़ाई छूट गयी। हमने पूछा आगे पढ़ोगे? उसका जवाब था कि आगे मौका मिला तो जरूर पढूँगा।

थोड़ी व्यक्तिगत बातचीत के बाद हमने उससे उसके काम के बारे में पूछा कि इलाके में बॉल बनाने वाली कितनी फैक्ट्रियाँ होंगी? उसका यह कहना था कि इस इलाके में बॉल बनाने वाली दो किस्म की फैक्ट्रियाँ हैं जिसको वे छोटी फैक्ट्री और बड़ी फैक्ट्री बोलते हैं। इन दोनों में क्या अंतर हैं? उसने बताया कि बड़ी फैक्ट्री में बड़े ऑर्डर आते हैं और अच्छी क्वालिटी की बॉल बनती है, वहीं छोटी फैक्ट्री में कम ऑर्डर आते हैं और सस्ते किस्म की बॉल बनती है। उसने यह भी बताया कि इलाके में दस छोटी फैक्ट्रियाँ और पाँच बड़ी फैक्ट्रियाँ हैं।

हमने पूछा कि फैक्ट्री में किस प्रकार के मजदूर काम करते हैं और उनकी उम्रें क्या–क्या हैं। उसने बताया कि चौदह साल की उम्र से लेकर पैंतालिस साल के पुरुष और महिलाएँ यह काम करते हैं। हालाँकि महिलाओं की संख्या पुरुषों से कम है। महिलाएँ घर पर बच्चों को अकेले छोड़कर आती हैं। उसने यह भी बताया कि यहाँ कुछ लोग ठेके पर काम करते हैं और कुछ दिहाड़ी पर। हमने पूछा कि यहाँ कितने ठेकेदार हैं? उसने बताया कि यहाँ ठेकेदार नहीं मलिक ही सबको काम देते हैं।

यह बॉल बनती कैसे हैं? उसने बताया कि बॉल बानने के लिए रबड़ पंजाब से आती है, जिसे कुछ मजदूर मशीन में डालकर मिक्स करते हैं और इसके अन्दर केमिकल डालकर मिलते हैं। इस रबड़ को हाइड्रोलिक मशीन की मदद से पत्ते में बदला जाता है। एक मशीन से एक बार में तीन पत्ते निकलते हैं। एक पत्ते में सोलह कटोरियाँ होती हैं। फिर इसे पंचिंग मशीन पर ले जाया जाता है। जहाँ इन कटोरियों को पंच करके उन्हें अलग निकाल लिया जाता है। लगभग तीन सौ पत्तों की कटोरी काटने के बाद इसे उन मजदूरों को दिया जाता है जो इन कटोरियों को रेगमाल से घिसने का काम करते हैं ताकि दो कटोरियों को गोंद से चिपकाने पर मजबूती से चिपक जाये। फिर सलोचन जो एक प्रकार का गोंद है वह तैयार करना पड़ता है।

उसने बताया कि यह गोंद वे खुद बनाते हैं। दो कटोरियों में नमक जैसा केमिकल डालते हैं जो बाद में बॉल के अन्दर गैस बन जाती है, उनको डालकर दोनों कटोरियों को गोंद की मदद से जोड़ दिया जाता है। फिर इन सारी बॉलों को गोंद में डूबा दिया जाता है, जिससे इन पर हरे, लाल और कई सारे रंगों के कपड़े चिपकाकर अलग–अलग रंगों के बॉल बन सकें। फिर इन बॉलों के ऊपर ब्रांड का नाम डालकर भट्ठी पर सेकने के लिए ले जाया जाता है। इन बॉलों को सोलह पीस के डाई पर डालकर भट्ठी पर सेकने के लिए ले जाया जाता है। और कुछ समय बाद उनको भट्ठी से अलग कर ठंडा करते हैं। आखिर में इनकी फिनिशिंग करके पैक कर दिया जाता है।

हमने उससे पूछा कि आपका मालिक कैसा आदमी है? वह बोला मालिक बड़े से मकान में रहता है, उसके पास चार पहिया और दो पहिया गाड़ी है। समय पर पैसा नहीं देता और बहुत मुसीबत आने पर भी एडवांस नहीं देता। इस काम से तुम कितना कमा लेते हो? यह पूछने पर उसने बताया कि मैं आज से आठ–दस साल पहले जब काम करना शुरू किया था तब पन्द्रह सौ रुपये मिलते थे। कुछ साल बाद दूसरी फैक्ट्री में काम किया, वहाँ चौबीस सौ रुपये मिलने लगे। आज के दिन अगर सब ठीक रहा और आठ से नौ घंटे पूरा काम मिला, तब कही दस से ग्यारह हजार मिल पाते हैं। हमने पूछा कि महिलाएँ भी यह काम करती हैं, उनको कितना पैसा मिलता है? उसने बताया कि उन्हें चार से पाँच हजार रुपये मिलते हैं। महिलाओं को इतना कम क्यों मिलता है? यह पूछने पर उसने बताया कि वे कभी बोलती ही नहीं। उनसे कई बार हमने बोला भी कि मिलकर जाओ और मालिक से बोलो, लेकिन आपस में एकता न होने के कारण उनका कुछ नहीं हो पाता।

इस काम में क्या कोई परेशानी होती है? उसने बताया कि मशीन के काम जैसे कि पंचिंग मशीन, हाइड्रोलिक मशीन में काम करते समय खतरा बना रहता है। पंचिंग मशीन चलाते–चलाते हथेली पर छाले पड़ जाते हैं, कई बार तो पंचिंग मशीन से उँगलियाँ भी कट जाती हैं। हमने पूछा कि क्या मालिक उसका इलाज करवाता है या इलाज का पैसा देता है? उसने बताया कि नहीं, इन सब में मालिक नहीं पड़ता। हमने पूछा कि फैक्ट्री में तुम केमिकलों के बीच कम करते हो, क्या मालिक हाथ के दस्ताने या मँुह पर लगाने के लिए मास्क वगैरहा भी देता है? वह बोला नहीं जी। हमने पूछा कि आपने कभी मालिक से इसकी माँग की? उसने आश्चर्य के साथ जवाब दिया, नहीं जी। हमें तो पता भी नहीं था कि मालिक को ये सब भी देना चाहिए।

हमने पूछा कि मालिक दिन में कितनी बार चाय और बिस्किट देता है? इस पर वह थोड़ा गुस्से में आकर बोला, जी बिलकुल नहीं देता। मालिक का बस चले तो वह हमें एक पैसा भी न दे और सारा काम करवा ले। हमने पूछा कि चाय, दस्ताने, मास्क के लिए आगे बात करोगे? उसने कहा कि जरूर बात करेंगे।

हमने उससे बात जारी रखी और पूछा कि क्या यह मकान आपका है? या आप लोग यहाँ किराये पर रहते हो। उसने कहा कि यह मकान उसके पिता का है। हमारे यह पूछने पर कि यह मकान कब बना? उसका जवाब था कि यह मकान आज से दस साल पहले कमेटी से पैसे लेकर बनाया था। क्या कभी किसी भी कारण के चलते आपने या आपके परिवार ने कोई कर्ज लिया है? हाँ, पहले लिया था। एक बार भाई की शादी में कर्ज लेना पड़ा और एक बार काम करते समय एक भाई की आँत फट गयी थी, तो उसके इलाज के लिए 5 लाख रुपये कर्ज लिये थे। सभी ने मिलकर यह छ: सालों में चुकाया था। क्या अभी आप लोगों पर कोई कर्ज है? अभी नहीं है जी।

उससे बात करते हुए लगा कि हमारे देश के जो मालों के उत्पादक मजदूर हैं, उनकी जिन्दगी के बारे में, उनकी पीड़ा के बारे में मीडिया चुप क्यों रहता है? क्या मीडिया की फैक्ट्री मालिकों से मिली–भगत है? आज के कहानीकार, उपन्यासकार और दूसरे साहित्यकार भी इन मजदूरों की जिन्दगी की तरफ कभी निगाह नहीं डालते। यहाँ तो हर घर की एक कहानी है और हर घर का एक उपन्यास है। काश, हमारा समाज इससे परिचित हो पाता!

← अंक में अन्य लेख देखें

पत्रिका प्राप्त करें

नवीनतम अंक और लेख सीधे अपने ईमेल में प्राप्त करें