ब्रांडेड कपड़ों, जूतों आदि के दाम हमें चैंका देते हैं। हमारा मकसद इन ब्रांडेड चीजों के दामों की लिस्ट बताना नहीं है। फिर भी क्या आपने कभी 5 लाख 24 हजार रुपये की जिन्स या 2 लाख 19 हजार रुपये की जैकेट या 2 लाख 50 हजार रुपये के बैग के बारे में सोचा है? जी हाँ, इन बड़े ब्रांडों–– जारा जिन्स, राल्फ लारेन जैकेट और हरमेस बैग जैसी चीजों की कीमत इतनी ही होती है जिनका इस्तेमाल पैसेवाले लोग करते हैं, लेकिन इन्हें बनानेवाले मजदूरों को न के बराबर मजदूरी मिलता है।
अंग्रेजी दौर में असेम्बली बम काण्ड पर चल रहे मुकदमें के दौरान भगत सिंह और वटुकेश्वर दत्त ने बयान दिया था कि “समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके बुनियादी अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं।–––– दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने और अपने बच्चों के तन ढँकने–भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार और बढ़ई खुद गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन–लीला समाप्त कर जाते हैं।” ये बातें उन्होंने 90 साल पहले कही थी, लेकिन आज हालात उससे भी खराब हो गये हैं।
इण्टरनेशनल ब्रांड के कपड़े बनाने वाले मजदूरों के बारे में––एक्शन एड की रिपोर्ट बताती है कि इन कपड़ों को तैयार करने के लिए भारत में डेढ़ करोड़ लोग फैक्ट्रियों और लाखों लोग घरों में काम करते हैं। यह काम अधिकतर महिलाएँ करती हैं, जो दिन भर बच्चों को पालती हैं और घर का काम भी करती हैं। कढ़ाई करना, सिलाई करना, टाँका लगाना, मोती पिरोना आदि तरह–तरह के काम होते हैं। महिलाएँ छोटे–छोटे अंधेरे और सीलन भरे कमरों में इन कामों को करती हैं, जिससे वे अन्धेपन और साँस की बीमारी से ग्रस्त हो जाती हैं। अच्छा और पौष्टिक खाना न मिलने के चलते वे उम्र से पहले ही बूढ़ी हो जाती हैं। यही हाल ऐसा काम करनेवाले पुरुष मजदूर और बच्चों के भी हैं।
गाँव में रोजगार न होने के चलते गरीब महिलाएँ लेबर ठेकेदारों के साथ शहर आ जाती हैं। वहाँ उन्हें दड़बे नुमा घरों में रखा जाता है। ओवर टाइम दिये बिना ही उन्हें देर रात तक काम कराया जाता है और बहुत ही कम मजदूरी दी जाती है।
देश की राजधानी दिल्ली में इन महँगे ब्रांड के कपड़े बनानेवालों को आठ घण्टे की औसतन मजदूरी 80 रुपये मिलती है। जयपुर में यह 78 रुपये, शाहजहाँपुर में 73 रुपये और मेरठ में सबसे कम 51 रुपये है। सोचने वाली बात है कि लाखों का सामान बनानेवाले मजदूरों को कितना कम मिलता है! इन महिला मजदूरों की भर्ती करते समय ठेकेदार इस बात का ध्यान रखते हैं कि महिला का परिवार कर्ज में डूबा होना चाहिए और उस महिला के पास रोजगार का कोई दूसरा साधन न हो। ठेकेदारों ने ऐसा जाल बिछा रखा है कि अगर कोई भी महिला मजदूर अपने ऊपर हो रहे अन्याय का विरोध करेगी तो उसे इस क्षेत्र में कहीं भी काम नहीं मिलेगा।
इन सारे मामले में ब्रांडेड कम्पनी का मालिक बिलकुल अलग होता है क्योंकि इन महँगे उत्पादों को जिन नामों से बेचा जाता है, उस नाम से उनकी कोई फैक्ट्री होती ही नहीं। इनकी सप्लाई चेन में कुछ फैक्ट्री मालिक और ठेकेदार का ही रोल होता है। अधिकतर मजदूरों को पता ही नहीं होता है कि वे किस ब्रांड के लिए काम कर रहे हैं और उनके बनाये सामान की बाजार में क्या कीमत है।
इन सबके चलते ब्रांड के मालिक हर तरह की कानूनी कार्रवाई से बचे रहते हैं और अकूत मुनाफा कमाते हैं। मजदूरों की मेहनत की लूट के चलते ही एक ओर हर रोज नये–नये अरबपति पैदा हो रहे हैं और दूसरी ओर करोड़ों मजदूर कंगाल होते जा रहे हैं।
भगत सिंह ने सवाल किया था कि यह भेदभाव आखिर कब तक चलेगा? यह सवाल आज भी जिन्दा है।
अंधविश्वास एक खतरनाक बीमारी की तरह समाज में फैला हुआ है। इसकी चपेट में सिर्फ अनपढ़ और गरीब लोग ही नहीं, बड़े–बड़े डिग्रीधारी, मध्यम वर्गीय लोग, नेता, अभिनेता और क्रिकेटर भी आ रहे हैं। आध्यात्मिक गुरु जीवन में आयी मुसीबतों को हल करने के नाम पर अपने भक्तों को ठगते हैं और ........
भूखों की रोटी हड़प ली गयी है भूल चुका है आदमी मांस की शिनाख्त.........
हजारों सालों से अमानवीय जाति–प्रथा की सबसे निचली पायदान पर जी रही जातियों से आने वाले सफाईकर्मियों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। हाथ से मैला साफ करने की प्रथा पर बड़ी–बड़ी बातें करनेवाले लोग पीढ़ी–दर–पीढ़ी दरअसल जिस विशेषाधिकार का सुख भोगते आ रहे हैं, उसे वे क्यों खोना चाहेंगे?........
आज से लगभग सौ साल पहले, 1926 में खड़गपुर के रेलवे मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए एक शानदार संघर्ष किया था। उनके इस संघर्ष ने पूरी दुनिया को बता दिया था कि भारत का मजदूर वर्ग एक बड़ी ताकत बन चुका है और अब उसे जानवरों की तरह नहीं हाँका जा सकता।........
आपने बच्चों को बॉल (गेंद) से तो खेलते देखा ही होगा, वे या तो क्रिकेट की या फिर टेनिस की बॉल से खेलते हैं। टेनिस की बाल से खेलकर कई खिलाड़ी अपने साथ ही देश का भी नाम रोशन करते हैं। उनके मैच को देखते हुए शायद ही किसी के मन में उन बॉल को बनानेवालों की जिन्दगी का खयाल आता हो। क्या आपने कभी सोचा है कि ये बॉल आखिर बनती कैसे होगी?........
मजदूरों के लिए फैक्ट्री में काम करना बेहद खतरनाक होता जा रहा है। देश भर में फैक्ट्रियों में होने वाली दुर्घटनाएँ इस बात की गवाह हैं। इन दुर्घटनाओं में मजदूर घायल हो जाते हैं, या अपना कोई अंग खो बैठते हैं, यहाँ तक कि कई बार उनकी मौत भी हो जाती है। आइये, पिछले दिनों घटी कुछ घटनाओं पर नजर डालते हैं।.......
जेराशिम ऐसे समय मास्को शहर में लौटकर आया जब कोई नौकरी मिलना बहुत कठिन था। क्रिसमस–त्योहार का केवल एक महीना रह गया था। इस समय कुछ इनाम पाने की उम्मीद से सब अपनी–अपनी नौकरी पर लगे रहते हैं, चाहे वह नौकरी कितनी ही खराब हो। इसीलिए यह किसान का लड़का जेराशिम तीन सप्ताह तक मारा–मारा फिरा, मगर .........
.....अगर मजदूर वर्ग अपनी गुलामी से छुटकारा पाना चाहता है तो इस अन्यायपूर्ण पूँजीवादी व्यवस्था को बदलकर एक न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना करना लाजिमी है। इस काम के लिए हर मजदूर का जागरूक होना जरूरी है और उसे अपने कर्त्तव्य की पहचान करनी चाहिए। इस लेख में हम इसी बात का जिक्र करेंगे कि मजदूर जागरूक कैसे हों?.......
दुनिया का सबसे खतरनाक शब्द क्या है? आप बताओ। आप में से कुछ लोग मौत को सबसे खतरनाक बतायेंगे। जो बेचारे प्यार में धोखा खा चुके हैं, वे धोखे को सबसे खतरनाक बतायेंगे। इसी तरह कुछ लोग गुलामी को तो कुछ बेइज्जती को खतरनाक बतायेंगे। लेकिन एक ऐसा शब्द है, जिसमें ये सारी चीजें आ जायेंगी और वह इन सबसे भी खतरनाक है। वह शब्द है.......
नवीनतम अंक और लेख सीधे अपने ईमेल में प्राप्त करें