सफाईकर्मियों की बदतर हालत

01 Oct 2022 • मजदूर एकता पुस्तिका- ४ • 4 बार पढ़ा गया

–– 30 मार्च 2022 को संजय गांधी ट्रांसपोर्ट नगर के एक सीवर में उतरे चार लोगों की दम घुटने से मौत हो गयी। मरने वालों में एक ठेकेदार, दो मजदूर और एक ई–रिक्शा चालक था। मजदूर एमटीएनएल सीवर लाइन में तार बिछाने का काम करते थे। ई–रिक्शा चालक की मजदूरों को बचाने में जान चली गई थी।

–– 27 अप्रैल 2022 को बवाना औद्योगिक क्षेत्र के सीवर में उतरे दो युवकों की जहरीली गैस की चपेट में आने से मौत। एक युवक सीवर से कचरा निकालने के लिए घुसा था, जबकि दूसरा युवक उसे निकालने के दौरान सीवर में अचेत हो गया।

–– 9 सितम्बर 2022 को दिल्ली, मुंडका के लोकनायक पुरम कॉलोनी में शुक्रवार की शाम सीवर की सफाई के दौरान दो लोगों की दम घुटने से मौत हो गयी। इनमें से एक कॉलोनी का सफाई कर्मी था और दूसरा गार्ड था। सीवर लाइन में भरी जहरीली गैस की चपेट में आने से जब सफाई कर्मी बेहोश हो कर गिर गया तो उसे बचाने के लिए सोसाइटी में तैनात सुरक्षा गार्ड भी मेन होल में उतर गया। इससे वह भी जहरीली गैस के प्रभाव में आ गया और फिर दोनों की दम घुटने से मौत हो गई।

हजारों सालों से अमानवीय जाति–प्रथा की सबसे निचली पायदान पर जी रही जातियों से आने वाले सफाईकर्मियों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। हाथ से मैला साफ करने की प्रथा पर बड़ी–बड़ी बातें करनेवाले लोग पीढ़ी–दर–पीढ़ी दरअसल जिस विशेषाधिकार का सुख भोगते आ रहे हैं, उसे वे क्यों खोना चाहेंगे? आज भी हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई, सभी धर्मों की कुछ खास जातियाँ ही मैला ढोने और सफाई करने के लिए निर्धारित कर दी गयी हैं जो नरक से भी बदतर हालात में जिन्दगी बसर करती हैं।

सिर पर मैला ढोनेवाले मेहनतकश लोगों के प्रति सरकार की उपेक्षा का हाल ये है कि देश के विभिन्न हिस्सों में उनकी कुल संख्या और सामाजिक–आर्थिक स्थिति के बारे में कोई सर्वे या अध्ययन नहीं कराया गया। 2015 में भारत सरकार ने लोकसभा में यह जानकारी दी थी कि 2011 की जनगणना के आँकड़े के मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकों में 1,80,657 परिवार मैला सफाई का काम कर रहे थे। इनमें से सबसे ज्यादा 63,713 परिवार महाराष्ट्र में थे। इसके बाद मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, त्रिपुरा और कर्नाटक का स्थान है। यह संख्या परिवारों द्वारा दी गयी जानकारी पर आधारित है। दूसरी ओर, 2011 की जनगणना के अनुसार देश में हाथ से मैला सफाई करनेवाले कर्मियों की कुल संख्या 7,94,000 थी। राज्य सरकारें सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों के बारे में केन्द्र को सही–सही सूचना नहीं देतीं। 2017 में 6 राज्यों ने केवल 268 मौतों की जानकारी दी। गजब तो यह कि एक सरकारी सर्वे के अनुसार 13 राज्यों में सिर्फ 13,657 सफाईकर्मी हैं। 19 सितम्बर 2018 को द गार्डियन की एक रिपोर्ट में बताया गया कि राज्य सरकारें हाथों से मैला सफाई करने वाले मजदूरों के अस्तित्व से ही इनकार करती हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार जब राज्य सरकारों से हाथों से मैला सफाई करने और ढोने वाले सफाईकर्मियों की संख्या पूछी गयी तो तत्कालीन छत्तीसगढ़ सरकार ने 3 और गुजरात सरकार ने 2 बतायी। उन राज्यों में सफाईकर्मियों की अक्सर होने वाली मौत की खबरें इस गलतबयानी का पर्दाफाश करती हैं, जिनमें से एक इस लेख की शुरुआत में ही दी गयी है।

राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अनुसार 2017 से हर पाँचवें दिन कोई न कोई अभागा सीवर या सेफ्टी टैंक की सफाई के दौरान मौत का शिकार बन जाता है। हैरत की बात यह कि इस तरह की मृत्यु के बारे में यह पहला आधिकारिक आँकड़ा था। सीवर सफाई के दौरान हुई मृत्यु के बारे में आयोग द्वारा दिये गये आँकड़े के मुताबिक देशभर में तामिलनाडु का पहला और गुजरात का दूसरा स्थान है। आयोग के अध्यक्ष ने स्वीकार किया था कि यह आँकड़ा अंतिम और पूर्ण नहीं है क्योंकि ज्यादातर राज्यों में इस तरह की मृत्यु की रिपोर्ट दर्ज ही नहीं होती। इसलिए इनको हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों में छपी खबरों तथा 29 राज्यों और 7 केन्द्र शासित प्रदेशों में से सिर्फ 13 द्वारा दी गयी जानकारी के आधार पर तैयार किया गया था। इनमें सफाई के काम में लगी जातियों के स्त्री–पुरुषों की विभिन्न रोगों से होनेवाली मौत के आँकड़े भी शामिल नहीं थे। सुरक्षा साधनों के बिना ही हाथ से मैला और गन्दगी उठाने के चलते उन्हें तरह–तरह के संक्रामक रोग हो जाते हैं और इनकी औसत आयु बेहद कम हो जाती है।

हमरे देश में जब कोई समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है और सरकार के लिए उस पर पर्दा डालना कठिन हो जाता है तो वह उस पर कोई आयोग बैठाकर या कानून बनाकर अपने कर्तव्यों का इतिश्री कर लेती है। इस समस्या पर भी सरकारों का यही रवैया रहा है। 1993 में 6 राज्यों ने केन्द्र सरकार से मैला ढोने की प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए कानून का निर्माण करने का अनुरोध किया। तब ‘द एम्प्लॉयमेण्ट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन ऑफ ड्राई लैट्रिन्स (प्रोहिबिशन) एक्ट 1993” नरसिम्हा राव सरकार द्वारा पारित किया गया। इस कानून के बनने के बाद से सीवर सफाई के दौरान जहरीली गैसों के कारण हुई 1800 सफाईकर्मियों की मौत की तथ्यपरक जानकारी सफाई कर्मचारी आन्दोलन के समन्वयक और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता बेजवाड़ा विल्सन और उनके साथियों के पास मौजूद हैं। यह संख्या केवल उन मामलों की है जिनके विषय में दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं। वास्तविक संख्या तो इससे कई गुना अधिक है क्योंकि इस तरह की अधिकांश मौतों के मामले दबा दिये जाते हैं। मृतक के परिजन अशिक्षा और गरीबी के कारण कानूनी लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं होते। मृत्यु के लिए जिम्मेदार ठेकेदार और अधिकारी अपने रसूख के बल पर अक्सर ऐसे मामले को रफा–दफा कर देते हैं।

सितम्बर 2013 में सरकार ने इस सम्बन्ध में एक और नया कानून बनाया–– फ्प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेण्ट एज मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन रूल्स 2013” जिसे दिसम्बर 2013 में लागू किया गया। लेकिन कानून बनाने से किसी समस्या का समाधान कैसे होगा, जब न तो समाज में उसे लागू किये जाने की परिस्थिति है और न ही शासन–प्रशासन उसे मुस्तैदी से लागू करने में कोई रुचि लेता हो। निजीकरण के मौजूदा दौर में ज्यादातर सफाईकर्मी निजी ठेकेदारों के अधीन काम करते हैं–– कोई सम्मानजनक वेतन नहीं, कोई सेवा शर्त नहीं, बीमा नहीं, पेन्शन नहीं। पुलिस, अधिकारी और ठेकेदार का गठजोड़ मृत्यु के कारण को बदलने का कार्य करता है। एक नाममात्र की राशि मृतक के परिजनों को ठेकेदार द्वारा दे दी जाती है। सरकारी काम करने के बावजूद सरकारें इन्हें अपना कर्मचारी नहीं मानती हैं, इसीलिए इन्हें मुआवजा देने से भी इनकार कर देती हैं।

जहरीली गैसों की जाँच के लिए एक विशेषज्ञ इंजीनियर की उपस्थिति जरूरी होती है। एम्बुलेंस की और डॉक्टर का मौजूद होना भी जरूरी होता है। सीवेज टैंक में उतरने वाले मजदूर को गैस मास्क, हेलमेट, गम बूट, ग्लव्स, सेफ्टी बेल्ट आदि से सुसज्जित पोशाक पहनना होता है। इसके बाद मौके पर मौजूद किसी जिम्मेदार अधिकारी द्वारा यह प्रमाणित करने पर कि सभी सुरक्षा नियमों का पूरी तरह पालन कर लिया गया है, मजदूर को सीवर में उतारा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने 2014 में निर्णय दिया था कि आपातस्थितियों में भी बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर लाइन्स में प्रवेश अपराध की श्रेणी में आएगा।

जमीनी सच्चाई यह है कि ठेकेदार बिना किसी सुरक्षा उपकरण के 200–250 रुपये की दिहाड़ी पर काम कर रहे सफाई मजदूरों को रस्से के सहारे मैनहोल से नीचे उतार देते हैं। ये मौतें प्राय: सेफ्टी टैंक के भीतर मौजूद मीथेन, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि जहरीली गैसों के कारण होती हैं। इन गैसों की जाँच के लिए ठेकेदार के पास माचिस की तीली जलाकर देखना और जीवित कॉकरोच डालकर जाँच करने जैसे आदिम तरीके ही होते हैं।

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