फरीदाबाद के ऑटोमोबाइल उद्योग के मजदूरों की हालत
फरीदाबाद नेशनल इन्डस्ट्रीअल टेरिटोरी (एनआईटी) में स्थित बहुत से कारखानों में एक प्रमुख हिस्सा ऑटोमोबाइल उद्योगों का है। यहाँ एस्कॉर्ट, मारूती सुजुकी, टाटा मोटर्स, सोनालिका ट्रैक्टर्स, हुण्डई मोटर्स, महिन्द्र एण्ड महिन्द्रा, यामहा मोटर्स, ऑटोमोटिव मैन्युफैक्चरर्स, होण्डा, हीरो, बजाज, सुजुकी, जेसीबी, वॉल्वो जैसी बड़ी कम्पनियों और दर्जनों छोटी–छोटी कम्पनियों के सैकड़ों प्लांट हैं। एक–एक कम्पनी के चार या पाँच प्लांट पूरे इलाके में फैले हुए हैं। ये कम्पनियाँ कार, ट्रैक्टर, ट्रक, बस, बाइक और इनके पार्ट्स बनाती हैं। इनमें लाखों मजदूर काम करते हैं।
हम सभी जानते हैं कि इस समय ऑटोमोबाइल क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है और वह उसे चलाने वाले इंजन की तरह काम कर रहा है। जीडीपी में इसका कुल योगदान 7 प्रतिशत है। लेकिन पूरे देश में ऑटोमोबाइल कम्पनियों में काम करने वाले 320 लाख मजदूरों और उनके परिवारों की जिन्दगी किसी अभिशाप से कम नहीं है।
फरीदाबाद की ऑटोमोबाइल कम्पनियों में काम करने वाले मजदूर देश के तमाम हिस्सों से आते हैं। कुछ इंजीनियर की डिग्री या डिप्लोमा लेकर आते हैं तो कोई आईटीआई का सर्टिफिकेट लेकर या कोई इनके बिना ही किसी कारखाने में काम करने का अनुभव लेकर आता है।
वे इन कारखानों में थोड़ा ज्यादा कमाने की आस में काम ढूँढते हैं। यहाँ नौकरी पाने में बहुत से लोग सफल होते हैं और बहुत से नौजवान अपने किसी दोस्त या रिश्तेदार जो पहले से यहाँ काम पर लगे हैं उनके पास एक–आध महीना रुककर काम न मिले तो वापस अपने गाँव चले जाते हैं या किसी दूसरे औद्योगिक शहर में जाकर नौकरी तलाशना शुरू करते हैं। दूर–दराज के इलाकों से आये हुए नौजवान मजदूर यहाँ आसपास के गाँवों में किराये पर मकान लेकर रहते हैं। ज्यादातर मजदूरों की स्थिति अकेले के दम पर एक कमरा लेने की नहीं है। इसका कारण है मजदूरों को मिलने वाली अपर्याप्त तनख्वाह। आज किसी भी कम्पनी में स्थायी कर्मचारियों की संख्या बहुत कम है जिन्हें लाख रुपये तक तनख्वाह मिलती है। ज्यादातर मजदूर अस्थायी हैं लेकिन ऑटोमोबाइल उद्योग की परिभाषा में उनकी श्रेणियाँ क्या–क्या हैं और उस मुताबिक उनकी स्थिति कैसी है इसकी झलक––
इस उद्योग में काम करने वाले मजदूरों को 4 श्रेणियों में बाँटा जा सकता है–– 1. स्थायी कर्मचारी, 2. ऑन रोल कर्मचारी, 3. ट्रेनी मजदूर और 4. थर्ड पार्टी मजदूर। एक–एक करके सभी श्रेणी के मजदूरों की स्थिति का ब्योरा यहाँ दे रहे हैं।
स्थायी कर्मचारी
कम्पनियों में अब स्थायी कर्मचारियों की संख्या लगातार घट कर नाममात्र बची हुई है। बीते तीन दशक से स्थायी मजदूरों की कोई भर्ती नहीं हुई है। आजादी से पहले और बाद के मजदूर आन्दोलनों से हासिल अधिकार इन्हें मिले हुए हैं। इनके काम के घण्टे निर्धारित हैं। साल में 29 छुट्टियाँ मिलती हैं। इनकी तनख्वाह 26 हजार रुपये महीना से शुरू होकर रिटाइर होने तक एक लाख रुपये तक पहुँच जाती है। ऐसे कर्मचारियों को बोनस, अपने और परिवार के लिए बीमा, काम के दौरान अगर चोट लग जाये तो मुफ्त इलाज और जितने दिन आराम की जरूरत है उस दौरान सवेतन छुट्टी मिलती है। ईएसआई कार्ड की सुविधा भी इन्हें मिलती है। अगर परिवार का कोई सदस्य बीमार पड़ जाये तो उसके इलाज का सारा खर्च कम्पनी वहन करती है। तात्कालिक जरूरत होने पर स्थायी कर्मचारी कम्पनी से कर्ज भी ले सकते हैं। काम के दौरान अगर किसी की मौत हो जाये तो परिवार के एक सदस्य को नौकरी मिल जाती है।
ऐसे कर्मचारियों की एक यूनियन भी है जो अब खत्म होने के कगार पर है। कम्पनी में हर दो साल बाद यूनियन के पदाधिकारियों का चुनाव होता है। हर दो या तीन साल में मैनेजमेंट के साथ यूनियन का करार होता है तनख्वाह और प्रोडक्शन को लेकर। प्रोडक्शन बढ़ाने की शर्त पर तनख्वाह बढ़ाई जाती है। समय के साथ इनकी पदोन्नति नहीं होती है। अगर किसी कारणवश इन्हें कम्पनी छँटनी करे तो बचे सर्विस टाइम का सारा पैसा कम्पनी को देना होता है।
ऑन रोल कर्मचारी
कम्पनी में ट्रेनिंग के बाद सीधा कम्पनी का कर्मचारी नियुक्त किया गया व्यक्ति ऑन रोल कर्मचारी कहलाता है। कम्पनी प्लांट के लाइन लीडर और सुपरवाइजर पर निर्भर करता है कि किसी ट्रेनी को वे ऑन रोल नियुक्ति के लिए सिफारिश करेंगे या नहीं। नियुक्ति मिलने पर इन्हें नियमित वेतन और अन्य सुविधाएँ मिलती है। पदोन्नति होने पर इनकी तनख्वाह बढ़ती है। ऐसे कर्मचारियों को 7 सिक लीव, 7 कैजुअल लीव के साथ निर्धारित ईएल और पर्सनल लोन भी मिलता है। इनकी तनख्वाह में मकान का किराया भी शामिल होता है तथा इन्हें स्वास्थ्य बीमा का लाभ भी मिलता है। लेकिन चूँकि ज्यादातर ट्रेनी की सिफारिश ऑफ रोल यानी थर्ड पार्टी के लिए की जाती है, इसलिए कम्पनियों में ऑन रोल कर्मचारी बहुत ही कम हैं। इनकी छँटनी करने के लिए कम्पनी को 3 महीने की नोटिस देनी पड़ती है। ऐसे में इन्हें तीन महीने की तनख्वाह पहले ही देने का नियम है।
प्रबन्धन का सारा काम ही ऑन रोल कर्मचारी सम्भालते हैं। स्थायी कर्मचारियों को इसकी जिम्मेदारी नहीं दी जाती है। लाइन लीडर सबसे निचला पद है और इस क्रम में आगे बढ़ते हुए कोई सीईओ तक पहुँच सकता है। इसलिए इनका कोई यूनियन नहीं होता है।
ट्रेनी (प्रशिक्षु) मजदूर
डिग्री, डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स पास करने के तुरन्त बाद कम्पनी नौजवान मजदूरों को ट्रेनी या प्रशिक्षु पद पर भर्ती करती है। इनमें भी कई श्रेणियाँ हैं–– 1. ग्रैजुएट इंजीनियरिंग ट्रेनी (बीटेक डिग्री धारकों के लिए), 2. डिप्लोमा अप्रेन्टिस ट्रेनी और डिप्लोमा इंजीनियरिंग ट्रेनी (डिप्लोमा यानी पॉलीटेक्नीक पास के लिए), 3. नीम ट्रेनी (आईटीआई सर्टिफिकेट धारकों के लिए)। ऐसे प्रशिक्षुओं की ट्रेनिंग की समय–सीमा एक से चार साल तक की होती है। इनकी ट्रेनिंग पूरी होने के बाद इन्हें कम्पनी में नौकरी देने के बजाय कम्पनी इन्हें बाहर कर देती है। ताजा डिग्री/डिप्लोमा पाने वालों को ट्रेनी के रूप में मजदूरी करवाना कम्पनियों के लिए बेहद फायदेमन्द है। इन्हें काम पर रखने के लिए कौशल विकास योजना के तहत सरकार कम्पनी को भत्ता देती है जिसके चलते कम्पनी की भारी कमाई होती है। यानी अगर किसी डिप्लोमा इंजीनियरिंग ट्रेनी को 12 हजार रुपये तनख्वाह दी जाता है तो कम्पनी उसमें 8 हजार रुपये देती है और सरकार देती है 4 हजार रुपये। अक्सर ट्रेनिंग का समय 10–12 घण्टा होता है। ओवरटाइम काम करवाने के बावजूद उसके लिए अलग से पैसे नहीं दिये जाते हैं। इन्हें साल में 25 छुट्टियाँ मिलती हैं। काम के लम्बे घण्टे और ओवरटाइम के पैसे को लेकर अगर कोई मजदूर विरोध करता है तो उसे तुरन्त नौकरी से बाहर कर दिया जाता है। किसी–किसी कम्पनी में ओवर टाइम करने पर दोगुनी दिहाड़ी मिलती है। किसी में 4 घण्टे ओवरटाइम के बदले आधे दिन की छुट्टी और 8 घण्टे के बदले एक दिन की छुट्टी मिलती है। ट्रेनी मजदूर अलग–अलग मैनेजर के अधीन काम करते हैं। इनसे काम तो पूरा लिया जाता है लेकिन, ट्रेनिंग का समय खत्म होने पर उन्हें ऑन रोल नियुक्ति देने के बजाय यह कहा जाता है कि “तुम्हें कोई काम नहीं आता है। तुम्हें हम नहीं रख पायेंगे।”
थर्ड पार्टी मजदूर
ऑटोमोबाइल कम्पनी अक्सर सीधे भर्ती करने के बजाय अलग–अलग ठेकेदार (थर्ड पार्टी) कम्पनियों के जरिये मजदूर भर्ती करती है। ठेकेदार कम्पनियाँ दरअसल मजदूर सप्लाई करने का काम करती हैं। उन्हें उद्योग की परिभाषा में थर्ड पार्टी मजदूर कहा जाता है। ऑटोमोबाइल कम्पनियों में ऐसे मजदूरों की संख्या सबसे ज्यादा है। आजकल ऑटोमोबाइल कम्पनियों में लगभग 90 प्रतिशत थर्ड पार्टी मजदूर काम करते हैं।
थर्ड पार्टी कम्पनियाँ पहले ही तनख्वाह और काम की कठिन शर्तें बताकर मजदूरों को नौकरी पर रखती हैं। इसलिए वे कम तनख्वाह या काम की खराब स्थिति का जिम्मा खुद नहीं लेती हैं। ऐसे में मजदूर अपने कम्पनी मालिक को तनख्वाह बढ़ाने के लिए बोल नहीं पाता। महीना खत्म होने पर तनख्वाह सीधे मजदूरों के खाते में डालने के बजाय ऑटोमोबाइल कम्पनी थर्ड पार्टी को देती है। थर्ड पार्टी कम्पनियाँ अपने मजदूरों से वर्दी, जूते और अन्य सुरक्षा उपकरणों के लिए भी पैसे काट लेती हैं। आम तौर पर ऐसे मजदूरों की दिहाड़ी 420 रुपये के आस–पास ही हो पाती है। इनमें से अगर किसी ने आईटीआई की है या वह ज्यादा अनुभवी है तो दिहाड़ी 500 से 600 रुपये तक पहुँच जाती है।
थर्ड पार्टी मजदूरों को कोई भी छुट्टी उपलब्ध नहीं होती है। रविवार या किसी त्योहार के दिन कम्पनी में छुट्टी होने पर दिहाड़ी काट ली जाती है। कम्पनी का प्रोडक्शन विभाग अकसर कॅनवेयर बेल्ट की स्पीड बढ़ाकर ज्यादा काम करवाते हैं और महीने में 3 से 6 रुपये मजदूरी बढ़ाकर खानापूर्ति कर देते हैं। अक्सर प्लांट में नॉन–प्रोडक्शन डे (एनपीडी) घोषित करके भी इनकी दिहाड़ी काट ली जाती है। ओवरटाइम करने पर दिहाड़ी के अनुपात में पैसे मिलते हैं।
कैन्टीन के खाने में भेदभाव
कारखाने में दिहाड़ी मजदूरों और मैनेजर तथा ट्रेनी के लिए अलग कैन्टीन होती हैं। थर्ड पार्टी मजदूरों का खाना अक्सर खराब किस्म का होता है जिसके लिए उनसे रोज 25 रुपये भी काट लिया जाता है। खाने की गुणवत्ता के अलावा इन्तजाम भी बहुत खराब होता है। 30 मिनट का लंच टाइम होता है लेकिन इन्तेजाम खराब होने के चलते लम्बी लाइन लग जाती है। कई बार खाने में कीड़े भी निकलते हैं जिसका वीडियो बनाकर अधिकारियों के पास शिकायत करने पर भी कोई सुधार नहीं होता है।
काम के हालात और जिन्दगी की स्थिति
मजदूरों की दिहाड़ी कम तो है ही, इसके साथ ही कम्पनी उनकी कोई भी परेशानी दूर करने का जिम्मा नहीं लेती। काम के दौरान किसी को चोट लग जाये तो उसका इलाज या जरूरी छुट्टी का प्रावधान नहीं है। ऐसे में इलाज के लिए छुट्टी लेने पर भी दिहाड़ी काट ली जाती है। इसके चलते मजदूरों के परिवार के लिए रोटी का संकट पैदा हो जाता है।
अगर काम के दौरान दुर्घटना के चलते किसी मजदूर की मौत हो जाती है तो कम्पनी वाले इसे छिपा देते हैं। उसकी हाजिरी की पंचिंग डिलीट कर दी जाती है और उसे गैर–हाजिर दिखा दिया जाता है। ऐसा अमानवीय व्यवहार आये दिन कम्पनी में देखने को मिलता है।
जिस समय ज्यादा उत्पादन की जरूरत होती है तब इन्हें भर्ती किया जाता है और उत्पादन की माँग कम होने पर तुरन्त निकाल दिया जाता है। ट्रैक्टर बनाने वाली तमाम कम्पनियों में अक्सर जुलाई से लेकर दिवाली से पहले तक हर महीने साढ़े पाँच या छ: हजार ट्रैक्टर बनते हैं। उससे पहले ऐसे मजदूरों की ज्यादा भर्ती की जाती है। दिवाली के एक हफ्ता पहले इन्हें निकाल दिया जाता है। फिर तीन महीने बाद इनकी भर्ती शुरू की जाती है।
कम तनख्वाह और आसमान छूती महँगाई का असर मजदूरों के रहन–सहन और खान–पान पर पड़ता है। मजदूर जहाँ रहते हैं वहाँ की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं होती है। मजदूरों की स्थिति एक कमरा और रसोई का किराया देने लायक ही होती है। ऐसे में साफ पानी और साफ–सुथरा टॉयलेट मिलना असम्भव ही है। आम तौर पर 8 या 10 कमरे के लिए एक ही टॉयलेट होता है वह भी गंदगी से भरा। कमरा अकसर हवादार नहीं होता है। सभी के स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर होता है। एक छोटे से कमरे में 3–4 लोग एक साथ रहते हैं। उसमें भी काम के शिफ्ट ऐसे होते हैं कि छुट्टी के दिन भी कमरे में रहने वाले सभी लोग एक साथ मिलकर खाना नहीं खा सकते। बहुत से मजदूर कम्पनी का शिफ्ट खत्म होने के बाद कहीं और आधी तनख्वाह पर दूसरी नौकरी करने चले जाते हैं।
इन सबके बावजूद ज्यादातर मजदूरों में किसी तरह का आक्रोश नहीं दिखता है। उनसे बात करने पर समझ आया कि अपने अधिकारों को वे जानते ही नहीं है, उनके लिए लड़ना तो दूर की बात है। इसलिए भगवान या अपना भाग्य मानकर, या पिछले जन्मों के पाप का फल मानकर चुप–चाप सहते रहते हैं। इसके अलावा जाति, धर्म, क्षेत्र के आधार पर भी मजदूर बँटे हुए हैं।
- अमित इकबाल, दिनेश यादव