नारायण मूर्ति एक बार फिर बड़ा बयान देकर विवादों में घिर गये हैं। वे 1990 के बाद, नंगे पूँजीवादी, नव–उदारवादी दौर के नौबढ़ पूँजीपति हैं। उन्होंने यह बयान माँ–बाप के कर्त्तव्यों को लेकर दिया है। उन्होंने कहा है कि बच्चों की पढ़ाई के लिए घर में अनुशासित माहौल बनाना माता–पिता की जिम्मेदारी है।........
हुत पुरानी कहानी है, कछुआ और खरगोश के बीच दौड़ प्रतियोगिता की। हम सभी जानते हैं कि दोनों में दौड़ जीतने को लेकर शर्त लगी। दौड़ शुरू हुई, खरगोश तेज दौड़कर आगे निकल गया और बीच रास्ते में सो गया। कछुआ एक चाल से लगातार चलता गया और दौड़ जीत गया। इससे सबक निकाला जाता है कि लगातार मेहनत करना सफलता की कुंजी है।.......
हम गन्ना छिलाई करने वाले खेत मजदूरों से बातचीत करने के लिए निकले और एक खेत मजदूर के पास जाकर बैठ गये। उसका लड़का हमारी मजदूर पुस्तिका लगातार पढ़ता है। लड़का तो घर पर मिला नहीं, लेकिन उसके पिताजी खाट पर बैठकर बीड़ी पी रहे थे। उनके कहने पर हम भी बैठ गये, काफी देर तक हम बातचीत करते रहे, इनका नाम सुभाष है। उम्र 43 साल, लेकिन देखने में लगते हैं 55 से 60 साल के बीच, चेहरे की एक–एक हड्डी दिखायी दे रही थी। माँस तो चेहरे पर है ही नहीं सिर्फ हड्डी और खाल है। फिर हम उनसे उनके काम पर बातचीत करने लगे।.........
बीते अगस्त महीने में हजारों की संख्या में सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) अपनी माँगों को लेकर लखनऊ में एकजुट हुए। लम्बे समय से वे शासन–प्रशासन के सामने अपनी जायज माँगें रख रहे थे। इन्हीं माँगों को लेकर सीएचओ और राज्य स्तर के अधिकारियों में टकराव चल रहा था। 14 सितम्बर को यह टकराव तेज हो गया।.........
1. हम आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों में पूरी निष्ठा के साथ भाग लेते हैं। हम उत्पीड़न, शोषण और हर प्रकार के गलत कार्यों के खिलाफ स्वत:स्फूर्त संघर्षों में पूरे जुझारूपन के साथ भाग लेते हैं। हम मजदूरों की इच्छाओं के खिलाफ जाकर उनके संघर्षों को अवरुद्ध नहीं करते।........
गंगो की जब नौकरी छूटी तो बरसात का पहला छींटा पड़ रहा था। पिछले तीन दिन से गहरे नीले बादलों के पुंज आकाश में करवटें ले रहे थे, जिनकी छाया में गरमी से अलसाई हुई पृथ्वी अपने पहले ठण्डे उच्छ्वास छोड़ रही थी, और शहर–भर के बच्चे–बूढ़े बरसात की पहली बारिश का नंगे बदन स्वागत करने के लिए उतावले हो रहे थे। यह दिन नौकरी से निकाले जाने का न था। मजदूरी की नौकरी थी बेशक, पर बनी रहती, तो इसकी स्थिरता में गंगो भी बरसात के छींटे का शीतल स्पर्श ले लेती। पर हर शगुन के अपने चिन्ह होते हैं। गंगो ने बादलों की पहली गर्जन में ही जैसे अपने भाग्य की आवाज सुन ली थी।.......
देश के मजदूरों के संघर्ष का इतिहास बेमिसाल रहा है। अलग–अलग दौर में उन्होंने जबरदस्त संघर्षों के दम पर अपनी माँगों को मनवाया और अपने हितों के हिसाब से कानून में संशोधन करने के लिए शासक वर्ग को मजबूर कर दिया। आज हम इसी सिलसिले में यहाँ 100 साल पुराने मजदूर आन्दोलन का जिक्र करेंगे। यह आन्दोलन है........
हम सभी जानते हैं कि इस समय ऑटोमोबाइल क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है और वह उसे चलाने वाले इंजन की तरह काम कर रहा है। जीडीपी में इसका कुल योगदान 7 प्रतिशत है। लेकिन पूरे देश में ऑटोमोबाइल कम्पनियों में काम करने वाले 320 लाख मजदूरों और उनके परिवारों की जिन्दगी किसी अभिशाप से कम नहीं है।........
अगर ट्रैकमैन को भारतीय रेलवे की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है तो ठीक ही कहा जाता है क्योंकि ट्रैकमैन सर्दी–गर्मी, धूप–बरसात हर तरह के मौसम में खुले आसमान के नीचे काम करता है। दिन हो चाहे रात, हर समय कोई न कोई ट्रैकमैन ट्रैक की देखरेख के काम में जुटा रहता है। उसका मुख्य काम ........
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