कछुआ–खरगोश की कहानी और कॉर्पोरेट पूँजीवाद 

01 Nov 2024 • मजदूर एकता पुस्तिका- ८ • 5 बार पढ़ा गया

बहुत पुरानी कहानी है, कछुआ और खरगोश के बीच दौड़ प्रतियोगिता की। हम सभी जानते हैं कि दोनों में दौड़ जीतने को लेकर शर्त लगी। दौड़ शुरू हुई, खरगोश तेज दौड़कर आगे निकल गया और बीच रास्ते में सो गया। कछुआ एक चाल से लगातार चलता गया और दौड़ जीत गया। इससे सबक निकाला जाता है कि लगातार मेहनत करना सफलता की कुंजी है।

कॉर्पोरेट ने इस कहानी को बदल दिया है। आज कॉर्पोरेट ऑफिस में कर्मचारियों को प्रेरित करने के लिए बताया जाता है कि कछुआ–खरगोश के बीच में दौड़ फिर से शुरू हुई। दौड़ शुरू हुई, खरगोश तेज दौड़कर आगे निकल गया और बीच रास्ते में सो गया। कछुआ मेहनत से लगातार चलता गया, लेकिन फिर भी वह दौड़ हार गया। कछुआ समझ गया कि रास्ता जमीनी था और वह जमीन पर तेज नहीं दौड़ सकता। अबकी बार रास्ते को बदल दिया गया और ऐसा रास्ता चुना गया जिसमें नदी भी पड़ती है। खरगोश ने सोने और सुस्ताने वाली गलती बीच में नहीं दुहरायी और दौड़कर नदी के पास पहुँच गया, लेकिन वहीं रुक गया क्योंकि वह नदी पार नहीं कर सकता। बाद में खरगोश और कछुआ ने बैठकर निचोड़ निकाला कि जमीन पर दौड़ते समय खरगोश कछुए को अपनी पीठ पर बैठा लेगा और नदी में कछुआ खरगोश के साथ यही काम करेगा। दौड़ हुई, नतीजा यह निकला कि दोनों मंजिल तक साथ–साथ पहुँचे। कॉर्पोरेट ऑफिस में बताया जाता है कि इसी तरह आपसी सहयोग और टीम भावना से हम बड़े से बड़ा काम कर लेंगे। नतीजा निकाला गया कि सहभागिता से कोई भी काम अम्भव नहीं।

दूसरी कहानी अधिक रोचक और मनभावन है, लेकिन है काल्पनिक, क्योंकि कॉर्पोरेट का आधार प्रतियोगिता है, न कि सहभागिता। हम देखते हैं कि न केवल कॉपोरेट ऑफिस में, बल्कि स्कूल–कॉलेज के अध्यापकों और शोध–विध्यार्थियों में, कम्पनियों के कर्मचारियों में और छोटी–बड़ी कम्पनियों में भी एक–दूसरे से प्रतियोगिता की तीखी भावना काम करती है। हर कोई एक–दूसरे के सिर पर पैर रखकर ऊपर चढ़ जाना चाहता है। पूँजीवाद का आधार ही अपने स्वार्थ के लिए गलाकाट प्रतियोगिता है। इसमें सहभागिता के लिए जगह नहीं। कहीं सहभागिता है तो मजबूरी के चलते और बेमन से या अपने स्वार्थ को साधने के लिए एक–दूसरे का सहयोग किया जाता है। अगर पूँजीवाद में प्रतियोगिता की जगह सहभागिता ले ले तो वह पूँजीवाद नहीं रहेगा, कुछ और हो जायेगा।

दरअसल, पहली कहानी ज्यादा वास्तविक है। इस कहानी में हमें समझने की जरूरत है कि कछुआ कौन है और खरगोश कौन? कछुआ मजदूर है जो लगातार कड़ी मेहनत करके समाज की सारी सम्पदा निर्मित कर रहा है और खरगोश मालिक पूँजीपति है जो मजदूरों   के श्रम से निर्मित सम्पदा को हथिया कर मौज उड़ा रहा है। दोनों में मेल–मिलाप असम्भव है। दोनों में संघर्ष ही इस समाज की सच्चाई है।

पूँजीवादी समाज में मुख्य रूप से तीन तरह की प्रतियोगिताएँ काम करती हैं। पहली, दो पूँजीपतियों के बीच अपने–अपने माल की बिक्री, कच्चे माल के स्रोत पर कब्जा और तैयार माल की बिक्री के लिए बाजार पर कब्जा जमाने को लेकर गलाकाट प्रतियोगिता चलती है। दूसरी, पूँजीपति और मजदूर के बीच इस बात को लेकर प्रतिस्पर्धा होती है कि मजदूर अपनी श्रम–शक्ति उचित दाम पर बेचना चाहता है, जबकि पूँजीपति उसे सस्ते में खरीदना चाहता है। दोनों के बीच का यह संघर्ष पूँजीवादी व्यवस्था में हल नहीं हो सकता। इसलिए दोनों का सम्बन्ध शत्रुतापूर्ण बन गया है। तीसरा, मजदूरों की एक–दूसरे के साथ भी प्रतियोगिता चलती है। इस संघर्ष का समाधान मित्रतापूर्ण तरीके से ही निकाला जा सकता है। मजदूरों के बीच सहभागिता पनप सकती है। यह सहभागिता मजदूरों के बीच एकता का आधार पैदा करती है। संगठनों में एकजुट मजदूर जुझारू संघर्षों के दम पर पूँजीपतियों से अपना हिसाब–किताब बराबर कर लेंगे और आपसी सहयोग के जरिये एक नये लोकतंत्र की नींव रखेंगे।

कछुआ खरगोश की कहानी को नये नजरिये से समझने की जरूरत है। इतिहास यह बताता है कि दोनों के बीच संघर्ष में न तो कछुआ और न ही खरगोश अकेले–अकेले हैं। कछुआ यह लड़ाई तभी जीत सकता है जब वह अपने जैसे तमाम दूसरे साथियों के साथ एका कायम कर ले। पूँजीपति की मुख्य चिन्ता यही है कि मजदूरों के बीच एका कायम न होने दे और उन्हें भरमाये रखे। उन्हें जाति, धर्म और क्षेत्र में बाँटकर रखे और उनका फायदा उठाता रहे। दूसरी कहानी इसीलिए गढ़ी गयी है।

–– कुलदीप

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