ट्रेड यूनियन का अर्थ और कार्य

09 Jul 2024 • फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!

ट्रेड यूनियन यानी श्रमिक संघ मजदूरों का संगठन है। ढेर सारे मजदूर आपस में मिलकर ट्रेड यूनियन बनाते हैं, जिससे वे एकजुट होकर अपने हक के लिए लड़ सकें। अगर मजदूर ट्रेड यूनियन में शामिल नहीं होते तो उनकी एकता कमजोर बनी रहती है और मालिक के खिलाफ वे कोई भी लड़ाई जीत नहीं सकते। वे मालिक पूँजीपतियों के आगे असहाय होते हैं। उन्हें कभी भी नौकरी से निकाला जा सकता है। उनका वेतन रोका जा सकता है। उनके पीएफ में घोटाला करके उसे छीना जा सकता है। यानी मजदूरों को कमजोर समझकर उन्हें हर तरीके से सताया जा सकता है।

ट्रेड यूनियन में शामिल होने के बाद मजदूरों को ताकत मिलती है। वे एकता के सूत्र में बँधकर मजबूत बन जाते हैं। अलग–अलग मजदूरों को दबाना आसान होता है, लेकिन ट्रेड यूनियन के रहते किसी मजदूर को दबाना आसान नहीं होता। अगर मजदूरों के साथ अन्याय हो रहा हो, तो ट्रेड यूनियन उनके लिए लड़ती है। वह कानूनी तरीके से लड़ती है। वह श्रम विभाग यलेबर डिपार्टमेण्टद्ध में जाकर मजदूर के भले के लिए शिकायत दर्ज करा सकती है। वह मजदूरों को साथ लेकर हड़ताल, आन्दोलन, जुलूस या रैली निकाल सकती है। यही नहीं, मजदूरों के भले के लिए हर शान्तिपूर्ण उपाय आजमा सकती है।

मालिक पूँजीपति कभी भी मजदूरों से नहीं डरता, लेकिन वह ट्रेड यूनियन से डरता है। वह जानता है कि ट्रेड यूनियन से दुश्मनी उसे महँगी पड़ सकती है। इसीलिए वह पूरी कोशिश करता है कि उसकी फैक्ट्री या कम्पनी में ट्रेड यूनियन न बन पाये। इसके लिए वह मजदूरों पर निगरानी रखता है कि कहीं कोई मजदूर ट्रेड यूनियन से तो नहीं जुड़ रहा है। अगर उसे शक हो जाये कि फलाँ मजदूर ट्रेड यूनियन से जुड़ने जा रहा है, तो वह उस मजदूर को धमकाता है। धमकी के बाद भी ज्यादातर मजदूर यूनियन बनाना जारी रखते हैं क्योंकि वे धमकी से डरते नहीं और मालिक का एकजुट होकर मुकाबला करते हैं। वे इस मूलमंत्र पर विश्वास करते हैं कि ‘‘कोई भी कदम उठाओ, लोगों को अपने साथ लेकर उठाओ, पराजय का सामना नहीं करना पड़ेगा।’’

आज देशभर में मजदूरों की सैंकड़ों यूनियनें हैं जैसे बिजली विभाग, रेलवे, बैंक, कपड़ा उद्योग आदि में कार्यरत कर्मचारियों की यूनियनें। बढ़ई, टर्नर, सफाई कर्मचारी, रेल ड्रावर, ऑटो ड्राइवर, रिक्शा चालक, ठेले खोमचे वाले, पत्रकार, शिक्षक, इंजीनियर और डॉक्टर भी अपनी यूनियन बनाते हैं। उद्योगों में काम करने वाली यूनियनें अधिक ताकतवर होती हैं, क्योंकि उद्योग में एक साथ काम करने के चलते मजदूर एक–दूसरे के करीब आते हैं। एक–दूसरे के सुख–दु:ख में शामिल होते हैं। अपनापन बढ़ता है, एकजुटता मजबूत बनती है। वे स्वाभाविक रूप से संगठित होते हैं। मारुती–सुजुकी की यूनियन देशभर में चर्चा का विषय हमेशा बनी रही। इसके जुझारू संघर्ष ने देशभर के मजदूर आन्दोलन को रोशनी दी।

मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था मजदूरों के शोषण पर टिकी है। इसे बदलने के बजाय अगर कोई यूनियन पूँजीवादी व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए काम करती है और ऐसी राजनीतिक पार्टियों का समर्थन करती है, जो चुनाव जीतकर पूँजीपतियों की मदद करती हैं और मजदूरों को भूल जाती हंै, तो ऐसी यूनियनें मजदूरों के बजाय मालिकों के साथ खड़ी होती हैं। इन्हें सुधारवादी यूनियन कहा जाता है। वे मालिकों के विरोध में मजदूरों के साथ खड़ी होने का ढोंग करती हैं और मालिकों से सौदेबाजी का नाटक करके थोड़ी बहुत मजदूरी बढ़वा देती है, काम की स्थिति और जीवन की गुणवत्ता में छोटे–मोटे सुधार ला देती हैं, इससे मजदूरों का विश्वास जीतकर, इसके बदले, वे मजदूरों से अधिक उत्पादन कराने पर जोर देती हैं। वे कहती हैं कि मालिक का मुनाफा जितना बढ़ेगा, मजदूरों को उतना अधिक फायदा मिलेगा। उनकी यह बात सफेद झूठ होती है और मजदूरों को गुमराह करती है। जबकि मजदूर अपने अनुभव से देखते हैं कि मालिक का मुनाफा, जितना बढ़ता जाता है, वह अरबपति, खरबपति बनता जाता है, लेकिन उसकी मजदूरी में कोई बढ़ोतरी नहीं होती। उलटे महँगाई बढ़ने से उसे उतनी ही मजदूरी में कम सामान मिलता है यानी वास्तविक मजदूरी यमहँगाई को देखते हुएद्ध गिर गयी है।

क्रान्तिकारी यूनियनें मजदूरों की सच्ची हितैषी होती हैं। वे हर तरीके से मजदूर वर्ग का भला करती हैं। ये यूनियनें मौजूदा अन्यायपूर्ण व्यवस्था में विश्वास नहीं करती और इसकी जगह एक न्यायपूर्ण और बेहतर समाज व्यवस्था को लाना चाहती हैं। इनका उद्देश्य शोषण पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था को बदलकर समानता पर आधारित समाजवादी और साम्यवादी व्यवस्था का निर्माण करना होता है। ये यूनियनें मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए हड़ताल, बहिष्कार धरना–प्रदर्शन, घेराव आदि संघर्षों के तरीकों का इस्तेमाल करती हैं। इनके नेता सच्चे और ईमानदार होते हैं और साधारण जीवन जीते हैं। न कोई अÕयासी और न कोई दिखावा। उनका जीवन आदर्श होता है।

ट्रेड यूनियन से मजदूरों को मिलने वाले लाभ

यूनियनें मजदूरों को सुरक्षा प्रदान करती हैं। इसके चलते मजदूर बेरोजगार नहीं होते। जब मालिक मजदूरों की छण्टनी करता है, या फैक्ट्री में ताला लगा देता है, तो यूनियनें विरोध करके उसके इस फैसले को रोक देती हैं। यूनियनें फैक्ट्री या कार्यस्थल पर सुरक्षा के पुख्ता इन्तजाम कराती हैं ताकि कोई मजदूर दुर्घटना का शिकार न हो। अगर कोई मजदूर दुर्घटना में घायल हो जाये या बीमार हो जाये तो यूनियनें उसके इलाज का प्रबन्ध करती हैं और मालिक से इलाज का खर्च दिलवाती हैं।

यूनियनें मजदूरों को बेहतर आर्थिक लाभ दिलवाती हैं। मजदूरी बढाने, बोनस और भत्ता दिलवाने, सस्ती दर पर कैंटीन की सुविधा और आने–जाने के लिए परिवहन के साधन उपलब्ध कराने के लिए यूनियनें संघर्ष करती हैं।

यूनियनें मजदूरों को शिक्षित करने के लिए साप्ताहिक पाठशालाएँ चलाती हैं। इन पाठशालाओं में मजदूरों को वर्ग–चेतना दी जाती है। उन्हें पूँजीवादी उत्पादन और शोषण को समझने के लिए पढ़ाया जाता है। इसे समझने के बाद मजदूर अधिक जागरूक हो जाते हैं। वे पूँजीवादी सरकार, मीडिया और पुलिस–प्रशासन की असलियत समझने लगते हैं, ये सभी मजदूरों के साथ नहीं, बल्कि पूंजपतियों के साथ खड़े होते हैं और तरह–तरह से मजदूरों पर जुल्म ढाते हैं। इन बातों को समझने के बाद मजदूरों की एकता मजबूत बनती है। अगर कोई यूनियन मजदूरों की नियमित कक्षाएँ नहीं चलाती, तो वह ‘‘सच्ची यूनियन’’ कहलाने की हकदार नहीं है।

यूनियनें फैक्ट्री या कम्पनी के प्रबंधन कार्य में मजदूरों की भागीदारी सुनिशिचित करती हैं। यूनियन के बिना कोई भी मालिक किसी मजदूर की बात नहीं सुनता, लेकिन यूनियन के जरिये मजदूर फैक्ट्री के फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं, जैसे कितना माल पैदा करना चाहिए, मालों के दाम, उसकी पैकिंग, उत्पादन, मशीनों की खरीदारी। हर जगह मजदूर अपनी राय देकर फैक्ट्री को सुचारू रूप से चलाने में अपना योगदान दे सकते हैं और अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं। जैसे अगर कम्पनी का मालिक नयी मशीनें लाकर मजदूरों की छंटनी का फैसला करता है तो यूनियन इसका विरोध करके इस पर रोक लगा सकती है।

यूनियन अपना अखबार, पर्चा, पत्रिका, पुस्तिका, और किताब निकालकर अपनी आवाज को दूर तक पहुँचा सकती है। कोई आदमी मौत की पीड़ा में तड़प रहा हो, चीख रहा हो, उसकी आवाज नहीं सुनी जायेगी। आवाज उसकी सुनी जायेगी, जिसके पास अपना मीडिया हो। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सच्ची और जुझारू यूनियनें मजदूरों की आवाज उठाने के लिए अपना मीडिया शुरू करती हैं।

यूनियनें मजदूरों की अलग पहचान कायम करने में मदद करती है। क्षेत्र, धर्म और जाति आधारित नकली पहचान मजदूरों में फूट डालने का काम करती है। इनकी जगह यूनियन असली पहचान पर आधारित मजदूर–वर्ग को आगे बढ़ाती हैं। खुद को मजदूर के रूप में पहचानने के बाद ही कोई व्यक्ति दूसरे मजदूर से नजदीकी और अपनापन महसूस करता है। यहीं से मजदूरों को एकजुट करने का सही आधार पैदा होता है।

यूनियनें मजदूर–वर्ग की राजनीतिक ताकत को इस्तेमाल करने का औजार हैं। अकेले–अकेले मजदूर न तो सरकार पर और न ही पुलिस–प्रशासन पर कोई दवाब बना सकता है, जबकि ट्रेड यूनियन के जरिये मजदूर न केवल सरकार पर दवाब डाल सकते हैं, अपने हित में नीतियाँ पारित करा सकते हैं, बल्कि अपनी मनचाही सरकार भी बनावा सकते हैं।

इन बातों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि ट्रेड यूनियन में शामिल होना मजदूर का न केवल अधिकार है, बल्कि उसका कर्त्तव्य भी है। ट्रेड यूनियन के बिना मजदूर मिमियाती हुई बिल्ली के समान है और ट्रेड यूनियन में शामिल मजदूर दहड़ता हुआ बाघ है।

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