अगर ट्रैकमैन को भारतीय रेलवे की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है तो ठीक ही कहा जाता है क्योंकि ट्रैकमैन सर्दी–गर्मी, धूप–बरसात हर तरह के मौसम में खुले आसमान के नीचे काम करता है। दिन हो चाहे रात, हर समय कोई न कोई ट्रैकमैन ट्रैक की देखरेख के काम में जुटा रहता है। उसका मुख्य काम रेलवे ट्रैक की मरम्मत और हिफाजत करना होता है, ताकि रेलवे का परिचालन बिना रुकावट के चलता रहे। वह बुनियादी तौर पर अकुशल मजदूर होता है जिस पर अपने सीनियर अधिकारियों के निर्देशों का आँख मूँदकर पालन करने का दबाव होता है। लेकिन अफसोस की बात है कि इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कर्मचारियों की रेलवे प्रशासन द्वारा कोई सुध नहीं ली जाती है। रेलवे में ट्रैकमैन और अधिकारियों के बीच का रिश्ता मजदूर–मलिक जैसा ही है। रेलवे में ट्रैकमैन की संख्या अधिक है और वह सबसे शोषित–पीड़ित कैडर भी है।...
वे इन कारखानों में थोड़ा ज्यादा कमाने की आस में काम ढूँढते हैं। यहाँ नौकरी पाने में बहुत से लोग सफल होते हैं और बहुत से नौजवान अपने किसी दोस्त या रिश्तेदार जो पहले से यहाँ काम पर लगे हैं उनके पास एक–आध महीना रुककर काम न मिले तो वापस अपने गाँव चले जाते हैं या किसी दूसरे औद्योगिक शहर में जाकर नौकरी तलाशना शुरू करते हैं। दूर–दराज के इलाकों से आये हुए नौजवान मजदूर यहाँ आसपास के गाँवों में किराये पर मकान लेकर रहते हैं। ज्यादातर मजदूरों की स्थिति अकेले के दम पर एक कमरा लेने की नहीं है। इसका कारण है मजदूरों को मिलने वाली अपर्याप्त तनख्वाह। आज किसी भी कम्पनी में स्थायी कर्मचारियों की संख्या बहुत कम है जिन्हें लाख रुपये तक तनख्वाह मिलती है।......
देश के मजदूरों के संघर्ष का इतिहास बेमिसाल रहा है। अलग–अलग दौर में उन्होंने जबरदस्त संघर्षों के दम पर अपनी माँगों को मनवाया और अपने हितों के हिसाब से कानून में संशोधन करने के लिए शासक वर्ग को मजबूर कर दिया। आज हम इसी सिलसिले में यहाँ 100 साल पुराने मजदूर आन्दोलन का जिक्र करेंगे। यह आन्दोलन है–– सन 1920 का ‘टाटा स्टील’ कम्पनी के खिलाफ मजदूरों का ऐतिहासिक संघर्ष।...
गंगो की जब नौकरी छूटी तो बरसात का पहला छींटा पड़ रहा था। पिछले तीन दिन से गहरे नीले बादलों के पुंज आकाश में करवटें ले रहे थे, जिनकी छाया में गरमी से अलसाई हुई पृथ्वी अपने पहले ठण्डे उच्छ्वास छोड़ रही थी, और शहर–भर के बच्चे–बूढ़े बरसात की पहली बारिश का नंगे बदन स्वागत करने के लिए उतावले हो रहे थे। यह दिन नौकरी से निकाले जाने का न था। मजदूरी की नौकरी थी बेशक, पर बनी रहती, तो इसकी स्थिरता में गंगो भी बरसात के छींटे का शीतल स्पर्श ले लेती। पर हर शगुन के अपने चिन्ह होते हैं। गंगो ने बादलों की पहली गर्जन में ही जैसे अपने भाग्य की आवाज सुन ली थी।...
पूछने लगे मजदूर पूछने लगे मजदूर भवन बनाने वाले भैया हमसे क्यों घिन खाते भवन में रहने वाले हम ही इसे उठाते ऊँचा हम ही इसे रंग पोत चमकाने वाले काम हुआ खत्म हम पर ही लग जाते ताले...
कोरोना महामारी का कहर अभी खत्म नहीं हुआ है। कोरोना फैलने के तुरन्त बाद से दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने इसे जानने–समझने का प्रयास शुरू कर दिया। तमाम प्रयोगों के बाद कुछ सफलता हासिल हुई। आज कोरोना महामारी......
मेरठ में मलियाना के उत्तरी इलाके में ज्यादातर मजदूर अस्थाई और खुली मजदूरी करते हैं। यह मुख्य सड़क से 200–300 मीटर अन्दर की ओर है। रेलवे स्टेशन यहाँ से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ के रास्ते......
(अक्सर किसी कारखाने या दफ्तर में काम करने वाले मजदूर से बात करो तो वे यह कहते हैं कि उन्हें काम देकर उनका मालिक उन पर कृपा करता है, क्योंकि अगर उन्हें काम न मिले तो उनका जीना मुश्किल हो जायेगा। समाज म......
कोरोना महामारी ने मजदूरों के सामने दोहरा संकट पैदा कर दिया है। एक तरफ तो कोरोना वायरस से जान का खतरा, वहीं दूसरी ओर रोजी–रोटी का संकट। पिछले साल कोरोना महामारी के दौरान देश में लगे लॉकडाउन ने मजदूरों ......
आज शहरों में बड़े प्राइवेट अस्पताल हैं जिसमें हजारों की फीस देकर इलाज करा पाना मजदूरों के लिये सम्भव नहीं है। आज प्राइवेट मॉडल पर आधारित चिकित्सा मजदूरों की पहुँच से दूर होती जा रही है। कई शहरों में स......
ट्रेड यूनियन यानी श्रमिक संघ मजदूरों का संगठन है। ढेर सारे मजदूर आपस में मिलकर ट्रेड यूनियन बनाते हैं, जिससे वे एकजुट होकर अपने हक के लिए लड़ सकें। अगर मजदूर ट्रेड यूनियन में शामिल नहीं होते तो उनकी ए......
आज से सौ साल पहले 1920 में भारत में मजदूर आन्दोलन की जबरदस्त लहर उठी थी। उस समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था। हालाँकि छिटपुट आन्दोलन और हड़तालें 1830 से ही शुरू हो गयी थीं, लेकिन 1920 की लहर कमोबेश देश ......
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