इस अंक के लेख

मजदूर एकता पुस्तिका-6

मजदूर वर्ग के सच्चे कलाकार उत्पल दत्त

उत्पल दत्त एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने मजदूर वर्ग की सेवा में अपनी पूरी जिन्दगी लगा दी। वे चुप रहकर हालात का तमाशा देखनेवालों में से नहीं थे। उन्होंने विषम परिस्थितियों से घबराना नहीं सीखा था। जो स......

भूमिका

मजदूर हकों पर हमला

आज मजदूरों के हकों पर चौतरफा हमला किया जा रहा है। सरकार ने चार श्रम संहिता पास करके मजदूरों पर हमला बोल दिया है। वह मजदूरों से सभी सरकारी संरक्षण छीन लेने पर आमादा है। न्यूनतम वेतन, यूनियन गठन, कार्यस......

आग उगलती गरमी में खटते–मरते मजदूर

इस साल मई–जून के महीने में आग उगलती गरमी ने सबको हलकान–परेशान किया। ऐसी हालत में जब मध्यम वर्ग के लोग एसी–कूलर की ढंडी हवा में राहत के मजे ले रहे थे, मजदूर जलती लू में सड़कों, फैक्टरियों और खेतों में दो जून की रोटी के लिए अपना शरीर जला रहे थे। ...

लोकसभा चुनाव और मजदूर वर्ग

मजदूर वर्ग सभी मेहनतकश वर्गों का अगुआ है, बेशक आज भी वह सबसे ज्यादा संघर्ष करता है लेकिन..........

इतिहास

1974 की रेलवे मजदूरों की ऐतिहासिक हड़ताल

“हड़ताल कौन करेगा?, मैं करूँगा, हम करेंगे।” यह नारा 1974 के ऐतिहासिक आन्दोलन में मजदूरों ने बुलन्द किया था। इस नारे के साथ लाखों मजदूरों ने 20 दिन तक रेलवे की देशव्यापी हड़ताल की थी।.... केवल भारत ही नहीं दुनिया भर में इस आन्दोलन की गूँज सुनाई दी। कई देशों की मजदूर यूनियनों ने इस संघर्ष की प्रशंसा की।...

अंधविश्वास और तर्कशीलता

बुनकर कबीर दास का संघर्ष और जीवन

सन्त कबीर को कौन नहीं जानता? कबीर मेहनत–मजदूरी करके जिन्दगी बिताने वाले इनसान थे। वे कपड़े की बुनाई किया करते थे। समाज में फैली बुराइयों को दूर करने के लिए अपने पद और दोहे लोगों को सुनाया करते थे। वे हमें प्रेरणा देते हैं कि हम मालिक की गुलामी से आजाद हो जायें। वे खुद स्वीकार करते हैं कि उनके विचार इनसान की स्वतंत्रता के लिए जरूरी हैं।...

सर्वे

देवी की चुनरी और रुबीना

गाँव के एक छोर पर जोहड़ के किनारे बसे मुस्लिम और दलित मजदूरों के मोहल्ले में हमारे चाचा और दोस्त रोजूदीन का घर है। चाचा अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन परिवार के साथ आज भी हमारा रिश्ता उतना ही गहरा है। चाचा नयी सोच के मजदूर थे, किताबें पढ़ते थे और हमने उनके घर में आम परिवारों की तरह औरतों को परदे में छिपे हुए नहीं देखा। उनका घर एक बन्द गली के छोर पर है। गली इतनी संकरी है कि.......

मजदूर वर्ग

महिला मजदूरों की हालत और संघर्ष

पिछले तीस साल के दौरान महिला मजदूर नयी गुलामी की चक्की में पिसती रहीं। उनकी हालत लगातार खराब होती गयी है। उनका शोषण–उत्पीड़न भी लगातार बढ़ता गया है। जहाँ पहले महिलाओं को सम्पत्ति के अधिकार से, उत्पादन......

अंधविश्वास और तर्कशीलता

मजदूरों में फैली साम्प्रदायिकता पर बातचीत

मैं एक मजदूर हूँ और ‘मजदूर सहायता समिति’ से जुड़ा हूँ। हमारी समिति मजदूरों की राजनीतिक चेतना बढ़ाने पर बहुत जोर देती है। एक प्लांट में काम करने वाले अपने मजदूर दोस्तों के साथ बातचीत में मैंने खुद इस जरूरत को बहुत शिद्दत से महसूस किया है। अपने उसी अनुभव को आपके साथ साझा कर रहा हूँ।...

अंधविश्वास और तर्कशीलता

मजदूर वर्ग की दुश्मन है साम्प्रदायिक राजनीति

1990 में नवउदारवादी नीतियों में उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण को लागू करने का मकसद था–– देश को फिर एक बार गुलामी की बेड़ियों में जकड़ देना, मजदूरों और किसानों के निर्मम शोषण का रास्ता साफ करना और देशी–विदेशी पूँजीपतियों–धन्ना सेठों की दिल खोलकर मदद करना। अमरीका के द्वारा आईएमएफ, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन के जरिये लागू इन नीतियों ने पिछले 30 सालों में देश के मजदूरों को गरीबी में धकेल दिया, नौजवानों को बेरोजगार कर दिया और किसानों को कर्ज के जाल में फँसा दिया। अपनी बदहाल हालत के प्रति मजदूर, किसान और नौजवान जागरूक न हो जायें, इसके लिए इन नीतियों के साथ साम्प्रदायिक और धार्मिक राजनीति को बढ़ावा दिया गया। शासक वर्ग ने जनता को मन्दिर–मस्जिद और हिन्दू–मुस्लिम के दंगों में उलझा दिया।...

अंधविश्वास और तर्कशीलता

मजदूरों में फैले अन्धविश्वास को कैसे दूर करें?

हमारे समाज में ढोंग–पाखंड, जादू–टोना, बाबा–ओझा और अन्धविश्वास का बहुत बोलबाला है। मजदूर वर्ग भी इनसे मुक्त नहीं है। हम देखते हैं कि अन्धविश्वास के चलते ही छोटे बच्चों की बलि चढ़ा दी जाती है, इनसान की जानवरों से शादी करायी जाती है, गम्भीर बीमारी या साँप काटने के बाद झाड–फूँक से मरीज की मौत हो जाती है। अन्धविश्वास से मजदूरों का इससे भी बड़ा नुकसान होता है। अन्धविश्वासी मजदूर अपने शोषण–उत्पीड़न से लड़ने के लिए सही संगठन नहीं बना पाते हैं। मजदूरों की समझदारी कुन्द होने का एक कारण अन्धविश्वास भी है, इसी के चलते वे अपनी समस्याओं के सही कारणों को समझ नहीं पाते हैं और उनकी एकता कमजोर पड़ जाती है। सही विचारों पर आधारित मजदूरों का जुझारू संगठन बनाने के लिए उनके बीच फैले ढोंग–पाखंड और अन्धविश्वास को दूर करना जरूरी है। मजदूरों में फैले अन्धविश्वास को किस तरह समझें और इसे कैसे दूर करें?...

कविता

हमारी जिन्दगी

हमारी जिन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं। हमेशा काम करते हैं, मगर.........

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