आज से सौ साल पहले 1920 में भारत में मजदूर आन्दोलन की जबरदस्त लहर उठी थी। उस समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था। हालाँकि छिटपुट आन्दोलन और हड़तालें 1830 से ही शुरू हो गयी थीं, लेकिन 1920 की लहर कमोबेश देश ......
मजदूर एकता पुस्तिका के पहले अंक का हर जगह लोगों ने और खास तौर से मजदूरों ने स्वागत किया। इससे हमारा उत्साह बहुत बढ़ गया है। उनके बीच से कई तरह की बातें सामने आयीं। कुछ लोगों ने इससे पूरी सहमति जतायी औ......
चौधरी पीरबख्श के दादा चुंगी के महकमे में दारोगा थे। आमदनी अच्छी थी। एक छोटा, पर पक्का मकान भी उन्होंने बनवा लिया। लड़कों को पूरी तालीम दी। दोनों लड़के एण्ट्रेन्स पास कर रेलवे में और डाकखाने में बाबू ह......
1– हम आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों में पूरी निष्ठा के साथ भाग लेते हैं। हम उत्पीड़न, शोषण और हर प्रकार के गलत कार्यों के खिलाफ स्वत-स्फूर्त संघर्षों में पूरे जुझारूपन के साथ भाग लेते हैं। हम मजदूरों की इच्छाओं के खिलाफ जाकर उनके संघर्षों को अवरुद्ध नहीं करते। 2– हम ट्रेड यूनियन मामलों में नौकरशाही तौर–तरीकों के जरिये मजदूर–कार्यकर्ताओं के उत्साह को कुन्द नहीं करते। हम मजदूरों के विचारों का दमन करने की नीति की न सिर्फ भर्त्सना करते हैं, बल्कि उसके खिलाफ संघर्ष भी करते हैं।...
‘हम अपना अधिकार माँगते हैं, नहीं किसी से भीख माँगते हैं’ आदि नारों से आन्दोलन गूँज उठा। प्रदेश के विभिन्न जिलों से हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके भी सीएचओ सुबह–सुबह ही इस आन्दोलन के लिए लखनऊ पहुँच गये। सीएचओ की भारी एकजुटता से अधिकारियों के कान खड़े हो गये। उन्होंने बड़ी संख्या में पुलिस बुलाकर आन्दोलन को इकोगार्डेन की तरफ विस्थापित कर दिया। सभी सीएचओ सड़कों पर मार्च करते हुए इकोगार्डेन की तरफ बढ़े। वहाँ मंच लगाया गया और अगले 5 दिन तक वहीं पर धरना दिया गया। वहाँ का नजारा देखने लायक था। भाषण, गीत और नारों से माहौल सराबोर था। अलग–अलग जिलों की टोलियाँ बनायी गयीं जो समय–समय पर कार्यक्रम करतीं और उपस्थित लोगों का मनोरंजन और उत्साह बढ़ातीं।...
हम गन्ना छिलाई करने वाले खेत मजदूरों से बातचीत करने के लिए निकले और एक खेत मजदूर के पास जाकर बैठ गये। उसका लड़का हमारी मजदूर पुस्तिका लगातार पढ़ता है। लड़का तो घर पर मिला नहीं, लेकिन उसके पिताजी खाट पर बैठकर बीड़ी पी रहे थे। उनके कहने पर हम भी बैठ गये, काफी देर तक हम बातचीत करते रहे, इनका नाम सुभाष है। उम्र 43 साल, लेकिन देखने में लगते हैं 55 से 60 साल के बीच, चेहरे की एक–एक हड्डी दिखायी दे रही थी। माँस तो चेहरे पर है ही नहीं सिर्फ हड्डी और खाल है।...
बहुत पुरानी कहानी है, कछुआ और खरगोश के बीच दौड़ प्रतियोगिता की। हम सभी जानते हैं कि दोनों में दौड़ जीतने को लेकर शर्त लगी। दौड़ शुरू हुई, खरगोश तेज दौड़कर आगे निकल गया और बीच रास्ते में सो गया। कछुआ एक चाल से लगातार चलता गया और दौड़ जीत गया। इससे सबक निकाला जाता है कि लगातार मेहनत करना सफलता की कुंजी है। कॉर्पोरेट ने इस कहानी को बदल दिया है।.......
नारायण मूर्ति एक बार फिर बड़ा बयान देकर विवादों में घिर गये हैं। वे 1990 के बाद, नंगे पूँजीवादी, नव–उदारवादी दौर के नौबढ़ पूँजीपति हैं। उन्होंने यह बयान माँ–बाप के कर्त्तव्यों को लेकर दिया है। उन्होंने कहा है कि बच्चों की पढ़ाई के लिए घर में अनुशासित माहौल बनाना माता–पिता की जिम्मेदारी है। माँ–बाप यह उम्मीद करते हुए फिल्में नहीं देख सकते कि बच्चे अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगाएँगे। यानी माँ–बाप को अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए समय निकालना चाहिए। इसके जवाब में सोशल मीडिया के एक यूजर ने लिखा, "आपकी सलाह के अनुसार अगर माँ–बाप 72 घण्टे काम करेंगे तो वे बच्चों को समय कब देंगे?”यह मूर्ति के नसीहत वाले बयान पर करारा तमाचा ही है।...
आज फासीवादी शक्तियाँ मजदूर वर्ग और अन्य मेहनतकश जनता पर बर्बर हमले कर रही हैं। उन्होंने मजदूरों पर श्रम संहिता, ठेका प्रथा, हायर और फायर, थोड़े समय का रोजगार जैसी नीतियों को थोप दिया है। वे मजदूरों की रोजी–रोटी छीनकर पूँजीपतियों का मुनाफा बढ़ाने पर ही आमादा नहीं हैं, बल्कि मेहनतकश जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन भी कर रही हैं। यूनियन बनाने, हड़ताल करने, अपना प्रतिनिधि चुनने और न्याय पाने के अधिकार को खत्म करने की पुरजोर कोशिश चल रही है।...
सादगी और विनम्रता ट्रैकमैन का आभूषण है ये कमजोरी का संकेत नहीं जो कठोर हाथ देश के सीने में पिघला हुआ लोहा उतार सकते हैं वे उनका गुरूर भी तोड़ सकते हैं जो आज सत्ता के नशे में चूर हैं..............
नहीं बनती है जनता की पत्रिका केवल कागज, कलम और स्याही से उसमें लगते हैं–– दिन और रातें सुबहों और शामें अनगिनत कार्यकर्ताओं के जो सड़कों पर आवारागर्दी कर सकते थे, मौज–मस्ती और सैर–सपाटे में दिन गुजार सकते थे लेकिन उन्होंने अपना हर पल उस तरह खर्च किया..........
दिल्ली भारत की राजधानी है। जहाँ हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को देश के प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं। जहाँ हमारे देश का संविधान बनाया गया है। जहाँ बड़ी–बड़ी मीटिंग होती हैं कि देश को कैसे चलाना है, व्यापार कैसे करना है? दिल्ली एक चमचमाता शहर है। पर इसी चमचमाते शहर में न जाने कितने मेहनतकश मजदूर दिन–रात मेहनत करते–करते भूख और गरीबी में दम तोड़ रहे हैं। जिन्दगी की जंग हार रहे हैं।...
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